एक मुक़म्मल पारी और एक अधूरी जीत: कोहली का वह अंदाज़ जिसे भुलाना थोड़ा कठिन है

वे या तो ज़िंदादिल अंदाज़ में खुश होते हैं या फिर ग़ुस्से में, लेकिन कभी बेबस नहीं दिखते; और यही बात उन्हें तेंदुलकर जैसे दिग्गजों से अलग बनाती है

एक बार फिर लक्ष्य का सारा बोझ विराट कोहली के कंधों पर था © BCCI

भारत को ट्रेजिक हीरो कुछ ज़्यादा ही रास आते हैं। बॉलीवुड को अपना पहला 'सुपरस्टार' मिलने से बहुत पहले, यहां एक 'ट्रेजेडी किंग' का जादू चलता था। यहां तक कि उस पहले सुपरस्टार की भी सबसे यादगार भूमिका एक ऐसे ही ट्रेजिक हीरो की थी, जो कैंसर से लड़ते हुए दम तोड़ देता है। ग़ज़ल, जो एक बेहद व्यापक कला है और जिसका शाब्दिक अर्थ 'महबूब से गुफ़्तगू' करना है; भारत में लंबे समय तक उसका मतलब सिर्फ़ अधूरी मोहब्बत और जुदाई के ग़मगीन नग़मे ही रहा। यहां के कुछ ग़ज़ल गायक पश्चिम के रॉकस्टार्स जितने लोकप्रिय थे। सच तो यह है कि भारत ने 'बीटलमेनिया' का जुनून उतना नहीं देखा, जितना 'ग़ज़लमेनिया' का दीवानापन महसूस किया है।

आज के दौर में भी बॉलीवुड का सबसे चहेता गायक वही है, जिसकी आवाज़ में दर्द भरे नग़मे रूह तक उतर जाते हैं। दिलचस्प इत्तिफ़ाक़ देखिए कि यही कलाकार विराट कोहली के भी पसंदीदा हैं। वैसे कोहली को हम उस 'ट्रेजिक हीरो' के खांचे में नहीं रख सकते, लेकिन भारतीय क्रिकेट का इतिहास ऐसे किरदारों से भरा पड़ा है। कोहली के आदर्श सचिन तेंदुलकर लंबे समय तक एक ऐसे ही अकेले योद्धा की भूमिका निभाते रहे। वे एक ऐसे जांबाज़ की तरह थे जो चारों तरफ़ से घिरने के बावजूद मैदान नहीं छोड़ता। तेंदुलकर की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक 1999 के बॉक्सिंग डे टेस्ट की है। आउट होकर पवेलियन की ओर लौटते सचिन का वह मंज़र, जहां वे दर्शकों का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं और उनके पीछे सीगल्स का एक झुंड उड़ रहा है। खुद उस फ़ोटोग्राफ़र की नज़र में वह तस्वीर उनकी तन्हा जंग की सबसे बड़ी गवाह थी।

एम एस धोनी, जिन्हें कोहली अपना अगला आदर्श मानते थे, उन किरदारों को निभाने से कभी पीछे नहीं हटे जहां उन्हें 'ग़लत समझा गया' या शिकार की तरह पेश किया गया हो। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहते वक़्त भी उनका अंदाज़ बिल्कुल फ़िल्मी था। संन्यास का एलान उन्होंने एक मुकम्मल बॉलीवुडिया दुख भरे नग़मे के साथ किया। दूसरी ओर कोहली की कहानी जुदा है; उन्होंने टेस्ट क्रिकेट को 'आई डिड इट माई वे' के तेवर के साथ छोड़ा। वहीं वनडे फ़ॉर्मैट में वे आज भी अपनी शर्तों और अपनी ही शैली में खेल रहे हैं।

विराट कोहली कभी 'ट्रेजिक हीरो' वाली छवि में फ़िट नहीं बैठ पाएंगे और इसकी बड़ी वजह उनका मिज़ाज और मैदान पर उनकी ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धी भावना है। वे दिल से एक ज़िंदादिल इंसान हैं। वे या तो बेइंतहा खुश होते हैं या फिर बेहद ग़ुस्से में। उनके चेहरे पर कभी बेबसी नहीं दिखती। शायद ही कोई दूसरा खिलाड़ी हो जो मैदान पर जितनी बार विवादों में उलझा, उतनी ही बार उतनी ही शिद्दत से गहरी दोस्तियों को भी निभाया।

एक कारण यह भी है कि कोहली जिन टीमों का हिस्सा रहे हैं, वे तेंदुलकर के दौर की तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूत और संतुलित रही हैं। यही वजह है कि लक्ष्य का पीछा करने में उनका रिकॉर्ड इतना बेमिसाल है। इंदौर वनडे से पहले, चेज़ करते हुए 28 शतकों में से महज़ चार ही हार के साथ ख़त्म हुए थे। वे भले ही दुनिया के सबसे बड़े 'चेज़ मास्टर' हों, लेकिन उनके खाते में ऐसी जादुई पारियां कम हैं जहां वे अकेले निचले क्रम के साथ मिलकर टीम को जीत दिला ले जाएं। सच तो यह है कि वे इतने शानदार बल्लेबाज़ हैं कि हालात को कभी उस स्तर तक बिगड़ने या निराशाजनक होने ही नहीं देते।

एक और वनडे शतक के बाद विराट कोहली का शांत अंदाज़ में बल्ला उठाना © AFP/Getty Images

विराट कोहली की बल्लेबाज़ी की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि वे विकेट बचाते हुए या पारी को स्थिरता देते हुए भी बिना किसी दबाव के 'रन-प्रति-गेंद' की रफ़्तार से रन बना सकते हैं। तेंदुलकर के दौर के मुक़ाबले कोहली को हमेशा एक मज़बूत बल्लेबाज़ी क्रम का साथ मिला है, लिहाज़ा उन्हें पारी की शुरुआत में ही बहुत ज़्यादा जोखिम उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यहां तक कि जिस मुक़ाबले को कोहली का सबसे कठिन सफल रन-चेज़ माना जाता है -पुणे में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 63 रनों पर 4 विकेट गिरने के बाद की जीत। वहां भी केदार जाधव ने उनसे अधिक आक्रामक पारी खेलकर दबाव कम कर दिया था। उस मैच में भारत की गहराई का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हार्दिक पांड्या और रवींद्र जाडेजा जैसे खिलाड़ी सातवें और आठवें नंबर पर बल्लेबाज़ी के लिए मौजूद थे।

इंदौर वनडे एक ऐसा लम्हा था, जब कोहली उस अहसास के सबसे करीब खड़े थे, जिससे सचिन तेंदुलकर का करियर अक्सर दो-चार होता रहा। इसे ग़लत मत समझिए। भारत का टॉप-5 किसी भी लिहाज़ से कमज़ोर नहीं है, लेकिन छठे और सातवें नंबर पर नीतीश कुमार रेड्डी और रवींद्र जाडेजा की मौजूदगी उस बल्लेबाज़ी गहराई की कमी को साफ़ ज़ाहिर कर रही थी, जिसका आदी भारत पिछले लंबे वक़्त से नहीं रहा है। ऊपर से चुनौती थी सीरीज़ का फ़ैसला करने वाले 338 रनों के पहाड़ जैसे लक्ष्य की।

New Zealand भारत में पहली बार वनडे सीरीज़ जीतने की कगार पर था। एक विकेट जल्दी गिरता है और कोहली क्रीज़ पर आते हैं। वह पुराने जोखिम रहित रन बटोरने वाले और अपने नए आज़ाद अंदाज़ का खूबसूरत मेल दिखते हैं। वह थर्डमैन की ओर हल्के हाथों से शॉट खेलकर खाता खोलने की कोशिश करते हैं, ऐसा शॉट जिसका इस्तेमाल उन्होंने हाल में कम किया है। लेकिन वह अपनी सातवीं गेंद पर सिक्सर भी जड़ देते हैं। पिछले छह पारियों में तीसरी बार उन्होंने पहली 20 गेंदों में सिक्सर लगाया है। इससे पहले के दो साल में ऐसा उन्होंने सिर्फ़ एक बार किया था, वह भी फ्री हिट पर।

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भारत के विकेट लगातार गिरने का सिलसिला जारी रहता है, जिसकी वजह से कोहली को मजबूरन अपनी आक्रामक शैली पर लगाम लगानी पड़ती है। अभी 13 ओवर भी पूरे नहीं हुए थे कि वे नीतीश कुमार रेड्डी के साथ क्रीज़ पर संघर्ष कर रहे थे। यह भारतीय टीम के लिए सबसे मुश्किल दौर था। न्यूज़ीलैंड की टीम उन्हें आउट तो नहीं कर पाती, लेकिन एक सोची-समझी रणनीति के तहत उन्हें दूसरे छोर पर 'अलग-थलग' ज़रूर कर देती है। हालात ऐसे थे कि मैदान पर बिताई गई पहली 180 गेंदों में से कोहली को सिर्फ़ 75 गेंदें खेलने का मौक़ा मिलता है, और पहले 240 गेंदों में से महज़ 100।

यह कोहली का एक अलग ही अवतार था। शायद उनकी बल्लेबाज़ी का सबसे परिपक्व और बेहतरीन संस्करण। पूरी सीरीज़ में 352 रन कूटने वाले डैरिल मिचेल बेशक 'प्लेयर ऑफ़ द सीरीज़' के असली हक़दार हैं, लेकिन कोहली के खेल में एक ऐसी दृढ़ता थी जैसे उन्हें आउट करना नामुमकिन हो। वे मिचेल की तुलना में थोड़े धीमे ज़रूर थे, लेकिन उनका नियंत्रण बेमिसाल था। उन्होंने रेड्डी और हर्षित राणा का हाथ थामकर उन्हें उनके पहले अर्धशतक तक पहुंचाया। क्रीज़ पर वे पूरी तरह एकाग्र थे, मगर साथ ही बेहद शांत और बड़े भाई जैसी उदारता भी दिखा रहे थे। कम से कम दो मौक़ों पर इन युवा खिलाड़ियों ने कोहली की कॉल पर रन लेने से मना कर दिया, फिर भी कोहली मुस्कुराते हुए वापस नॉन-स्ट्राइकर एंड तक पहुंचे। अगर यही वाक़या आठ साल पहले हुआ होता, तो कोहली का अंदाज़ कुछ और ही होता।

राणा के साथ साझेदारी के दौरान कुछ वक़्त के लिए लगा कि पुराने दिन वापस आ गए हैं। कोहली के वे तेज़ दौड़कर लिए गए दो रन, उनके सिग्नेचर सिक्सर और राणा के बड़े शॉट्स पर उनका वह संक्रामक उत्साह। स्टेडियम में गूंजते 'कोहली-कोहली' के शोर ने न्यूज़ीलैंड को दबाव में ला दिया था। काइल जेमीसन को निशाना बनाकर दोनों ने तेज़ी से रन बटोरे और समीकरण को सात ओवर में 68 रन तक ले आए। आठ ओवरों के भीतर ही ज़रूरी रन-रेट दस से नीचे आ चुका था।

विराट कोहली ने 91 गेंदों में अपना शतक पूरा किया © BCCI

अब लक्ष्य पहुंच के भीतर लग रहा था, लेकिन तभी भारत ने राणा और मोहम्मद सिराज के विकेट लगातार गेंदों पर गंवा दिए। यहां से सारा दारोमदार कोहली के कंधों पर आ गया। उन्होंने स्ट्राइक अपने पास रखनी शुरू की और अकेले दम पर भारत की उम्मीदों को ज़िंदा रखा। क्रिस्टियन क्लार्क के ओवर में जड़े गए लगातार चौकों ने समीकरण को 28 गेंदों में 46 रन तक ला दिया। कोहली अब तक 22 बार बाउंड्री के लिए प्रहार कर चुके थे, जिनमें से 11 बार वे सफल रहे। अगर वे बची हुई गेंदों में से ज़्यादातर खुद खेल जाते, तो शायद उनके करियर की वह एक कमी आज पूरी हो जाती।

लेकिन तभी बाउंड्री की तलाश में उनसे पहली चूक हुई। 108 गेंदों के संघर्ष में यह उनकी महज़ आठवीं ग़लत कोशिश थी। वे लांग ऑफ़ पर कैच थमा बैठे। लक्ष्य का पीछा करते हुए यह उनके बल्ले से निकली सबसे गहरी और भावुक पारी थी, जो जीत की दहलीज़ पार नहीं कर सकी। हालांकि, वे किसी 'ट्रेजिक हीरो' की तरह मैदान पर रुके नहीं और न ही पस्त कदमों से वापस लौटे। बेशक यह एक ऐसी पारी थी, जिस पर उनके पसंदीदा गायक के किसी दर्द भरे नग़मे के साथ 'एडिट' बनाया जा सकता है; बशर्ते कॉपीराइट स्ट्राइक का ख़तरा न हो।

मैच ख़त्म होने के कुछ ही देर बाद कोहली अपने साथियों और विपक्षी खिलाड़ियों के साथ हंसी-मज़ाक करते नज़र आए। वे अपने फ़ोन में कुछ देखते हुए खुद ही मुस्कुरा रहे थे। लगभग दो दशकों के अपने करियर में उन्होंने पहली बार ऐसा अनुभव किया था, जहां इतनी नफ़ासत से खेलने और आख़िरी सांस तक लड़ने के बावजूद उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इसे त्रासदी कतई नहीं कहा जा सकता।

सिद्धार्थ मोंगा ESPNcricinfo के वरिष्ठ लेखक हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर राजन राज ने किया है

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