अमन मोखाड़े का बेंच से मुख्य भूमिका निभाने तक का सफ़र
अमन मोखाड़े का स्वर्णिम सफ़र जारी है जिसका विदर्भ के 2025-26 विजय हजारे ट्रॉफ़ी में शानदार प्रदर्शन में अहम रोल रहा है। गुरुवार को होने वाले सेमीफ़ाइनल से पहले आठ पारियों में उन्होंने 643 रन बनाए जो देवदत्त पड़िक्कल के 721 रनों के बाद दूसरे सबसे ज़्यादा हैं।
उनके प्रदर्शन में आया ये सुधार निरंतरता का फल है जिसकी 2024-25 में उन्हें काफ़ी कमी खली थी। अथर्व तायड़े, यश राठौड़, करुण नायर और दानिश मालेवर की उपस्थिति वाले मजबूत शीर्षक्रम में मोखाड़े को लगातार इंतज़ार करना पड़ रहा था।
24 साल के मोखाड़े ने ESPNcricinfo से कहा, "पिछला सीज़न शायद मेरे लिए सबसे कठिन दौर था। अभ्यास मैचों में मैं ख़ूब रन बना रहा था, लेकिन टीम संयोजन और प्रतिस्पर्धा के कारण मुझे लगातार मौक़े नहीं मिल रहे थे।"
"जब आपको पता हो कि आप सक्षम हैं, लेकिन मौक़े नहीं मिल रहे तो यह निराशाजनक होता है। मैंने सीखा कि प्रभावशााली पारियां और मैच जिताने वाले प्रदर्शन केवल रन बनाते रहने से कहीं अधिक मायने रखते हैं।"
मजे की बात ये है कि जिस बल्लेबाज़ ने उनके लिए प्लेइंग इलेवन में आना मुश्किल किया था वही उनकी प्रेरणा का कारण बना। पिछले सीज़न विदर्भ को विजय हजारे ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल तक ले जाने और रणजी ट्रॉफ़ी जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले नायर से मोखाड़े ने काफ़ी कुछ सीखा।
मोखाड़े ने कहा, "टीम के अंदर की प्रतिस्पर्धा हमेशा कड़ी रही है। आप अपनी जगह को लेकर कभी भी आश्वस्त नहीं हो सकते हैं।"
"पिछले सीज़न करुण हमारे साथ थे और मैं उनसे कॉफ़ी या डिनर के समय में बल्लेबाज़ी और माइंडसेट को लेकर काफ़ी बात करता था। उन्होंने मुझसे एक बात कही थी जो मेरे साथ रह गई वो यह थी कि हर बल्लेबाज़ अलग है। जो उनके लिए काम कर रहा है वह शायद मेरे लिए नहीं करेगा और मुझे वह खोजना होगा जो मेरे खेल को सूट करे।"
वर्तमान सीज़न से पहले ही वह मौक़ा आया जब नायर वापस कर्नाटक लौट गए और मालेवर चोट के कारण बाहर हो गए।
मोखाड़े को सीधे विदर्भ की रणजी ट्रॉफ़ी इलेवन में जगह मिला और उन्होंने 96.16 की औसत से 577 रन बनाते हुए इसका पूरा लाभ भी लिया। सफ़ेद गेंद के टूर्नामेंट के लिए जब रणजी ब्रेक हुआ तब एलीट डिवीजन में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले शीर्ष पांच बल्लेबाज़ी की लिस्ट में शामिल थे।
उन्होंने कहा, "पहले मैं काफ़ी 50 और 60 के स्कोर बना रहा था और मेरे कोच उन स्कोर्स को बड़े शतक में तब्दील करने के लिए बोलते थे। मुझे एहसास हुआ कि मुझे मानसिक तौर पर विकसित होना होगा और अपने खेल के उन पहलुओं को अच्छा करना होगा जहां मैं आसानी से रन नहीं बना पा रहा था।"
"तीन या चार मैचों के बाद विपक्षी टीमों पता लगा लेती हैं कि आप कहां रन बनाते हैं और आपको किस तरह गेंदबाज़ी करनी है। मुझे लगता था कि गेंदबाज़ों ने मेरे ऊपर पकड़ बना ली है। इसीलिए इस ऑफ़ सीज़न में मैंने उन्हीं क्षेत्रों में अधिक काम किया जिसमें ख़ास तौर पर ऑफ़ साइड का मेरा खेल शामिल है। इससे मुझे शुरुआत को बड़े स्कोर में तब्दील करने में मदद मिली।"
मोखाड़े के खेल के पीछे मुंबई के रहने वाले कोच उमेश पटवल की अहम भूमिका रही है। जब पटवल उपलब्ध नहीं रहते हैं तो उन्होंने पूर्व भारतीय ओपनर वसीम जाफ़र से भी मदद ली है।
मोखाड़े ने कहा, "मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं अच्छे लोगों से मिलता रहा हूं। उमेश सर 2016 से मेरे साथ हैं। नागपुर में हम में से बहुत से लोग साथ में अभ्यास करते हैं, बातचीत करते हैं और उस माहौल से मदद मिलती है।"
मोखाड़े की अधिकतर क्रिकेट पढ़ाई के साथ हुई है। वह बताते हैं, "मेरे परिवार में डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और लेक्चरर्स हैं तो खेल मेरे लिए स्वाभाविक नहीं था। मेरे पिता ने पढ़ाई के साथ क्रिकेट खेलने की अनुमति दी थी।"
2019-20 में कूच बेहार ट्रॉफ़ी में विदर्भ की कप्तानी करने से पहले तक क्रिकेट उनके लिए स्थिर करियर विकल्प की तरह नहीं था। इसके बाद भी उन्होंने अपने माता-पिता से किया वादा निभाया और कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की। फिलहाल वह परास्तानक कर रहे हैं।
वह हंसते हुए कहते हैं, "अब क्रिकेट की वजह से मैं ज्यादातर परीक्षाओं से पहले ही पढ़ाई करता हूं।"
मोखाड़े अब फर्स्ट क्लास क्रिकेट में अपने चौथे सीज़न में हैं। उन्होंने 2022-23 में डेब्यू किया था। शुरुआत में उन्हें नहीं लगा कि वह यहां के लिए बने हैं। लेकिन तब के कप्तान फैज फजल से बातचीत ने उन्हें सहज महसूस कराया। फजल ने ही उन्हें उनकी पहली रणजी कैप दी थी।
मोखाड़े याद करते हैं, "उन्होंने मुझसे कहा कि मैं यहां होने का हकदार हूं। इससे मेरी घबराहट कम हो गई।"
बचपन में उमेश यादव भी उनके लिए प्रेरणा रहे। "एक कार्यक्रम में वह मुख्य अतिथि थे, जहां मैं प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट बना था। पता नहीं उन्हें अब याद है या नहीं, नौ साल हो गए हैं। लेकिन उन्होंने मुझे अलग ले जाकर कहा था कि सिर्फ शतक से संतुष्ट मत होना, बड़े शतक बनाना। अपने ही इलाके के किसी खिलाड़ी को सफल होते देखना कई खिलाड़ियों को प्रेरित करता है।"
लक्ष्यों को लेकर मोखाड़े कहते हैं कि तय आंकड़ों के पीछे भागना उनके लिए काम नहीं करता।
वह कहते हैं, "इस विजय हजारे ट्रॉफ़ी में मैंने कभी नहीं सोचा कि मुझे कितने शतक या कितने रन चाहिए। मैंने सिर्फ़ गेंद पर प्रतिक्रिया दी और टीम को जो चाहिए था, उस पर ध्यान दिया।"
"मुझे हैदराबाद के ख़िलाफ़ एक मैच याद है। मैं 80 रन पर था और गेंद बहुत अच्छी तरह मार रहा था। तभी मैंने आगे के बारे में सोचना शुरू किया। अगली ही गेंद पर मैं आउट हो गया।"
मोखाड़े के लिए मौजूदा पल में रहना और अपनी प्रक्रिया पर भरोसा करना सालों के इंतजार के बाद आया है। जैसे ही विदर्भ एक और नॉकआउट मैच की ओर बढ़ रहा है, उन्हें किसी उपलब्धि की चिंता नहीं है। वह वही करना पसंद करते हैं जो अब उनके लिए सबसे बेहतर काम करता है। एक गेंद पर ध्यान देना और उसी के हिसाब से खेलना।
शशांक किशोर ESPNcricinfo के वरिष्ठ संवाददाता हैं
