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फ़ीचर्स

बीसीसीआई के लिए सुप्रीम कोर्ट के फै़सले के क्या मायने हैं

सचिव को अधिक शक्ति देना, कूलिंग-ऑफ़ पीरियड और अपात्रता मानदंड के नियमों में प्रमुख बदलाव

पहले की तुलना में बीसीसीआई सचिव के पास बोर्ड और भारतीय क्रिकेट पर अधिक अधिकार होंगे  •  BCCI

पहले की तुलना में बीसीसीआई सचिव के पास बोर्ड और भारतीय क्रिकेट पर अधिक अधिकार होंगे  •  BCCI

दिसंबर 2019 में बीसीसीआई ने 2018 के फ़ैसले को संशोधित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 2018 के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में कई संशोधन करने को कहा था। बीते 14 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और हेमा कोहली ने उन संशोधनों में से अधिकांश को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार 2016 में आरएम लोढ़ा समिति द्वारा अनुशंसित सुधारों को काफ़ी हद तक वापस ले लिया गया। आरएम लोढ़ा समिति के सुझावों का मक़सद बीसीसीआई के कामकाज और ढांचे में सुधार करना था।
यहां हम इस नवीनतम अपडेट के बाद प्रभावी होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या करने के लिए अदालत के फ़ैसले को देखेंगे।
नोट: संशोधनों का सुझाव सीनियर कानून सलाहकार मनिंदर सिंह ने दिया था, जो इस मामले के न्याय मित्र (एक निष्पक्ष सलाहकार) थे।

कूलिंग-ऑफ़ पीरियड

संविधान कहता है कि कोई पदाधिकारी जिसने राज्य संघ या बीसीसीआई या दोनों के संयोजन में लगातार दो कार्यकाल (तीन साल प्रति कार्यकाल) के लिए कोई पद धारण किया हो, वह तीन साल की कूलिंग-ऑफ पीरियड पूरा किए बिना चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं होगा। कूलिंग-ऑफ पीरियड के दौरान वह व्यक्ति बीसीसीआई या राज्य स्तर पर किसी भी प्रकार से कार्य नहीं कर सकता है।
बीसीसीआई ने प्रस्ताव दिया कि उसके दो सबसे ताक़तवर पदाधिकारियों- अध्यक्ष और सचिव को कूलिंग-ऑफ़ पीरियड शुरू होने से पहले केवल बीसीसीआई में लगातार दो कार्यकाल पूरा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। और बाक़ी बचे पदाधिकारियों (तीन) को एक बार में अधिकतम नौ वर्ष का कार्यकाल (तीन लगातार कार्यकाल) पूरा करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
संशोधन: कोई पदाधिकारी जिसने बीसीसीआई में लगातार दो कार्यकाल के लिए कोई पद संभाला है, वह तीन साल की कूलिंग-ऑफ़ पीरियड पूरे किए बिना बीसीसीआई में कोई और चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं होगा। इसके अलावा यदि किसी व्यक्ति ने राज्य संघ और बीसीसीआई में लगातार दो कार्यकाल पूरे किए हैं, या इसके विपरीत, बिना किसी ब्रेक के (कुल 12 वर्ष) कार्य किए हैं, तो ऐसा व्यक्ति राज्य संघ या बीसीसीसआई में कूलिंग-ऑफ़ पीरियड पूरे किए बिना कोई और चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं होगा। कूलिंग-ऑफ़ पीरियड पूरा करते समय वह व्यक्ति बीसीसीआई या राज्य संघ की किसी भी समिति का सदस्य नहीं होगा।
कोर्ट का तर्क: यदि बीसीसीआई या राज्य संघ में एक ही स्तर पर पदाधिकारी के लगातार दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीन साल का ब्रेक प्रभावी हो जाता है, तो कूलिंग-ऑफ़ पीरियड "निरस्त" नहीं होता है।

अपात्रता मानदंड

संविधान कहता है कि किसी व्यक्ति को आईपीएल गवर्निंग काउंसिल या किसी अन्य बोर्ड समिति के पदाधिकारी या सदस्य होने से अपात्र ठहराया जा सकता है। और भी अपात्र होने के मानदंड हैं, जैसे - बीसीसीआई के प्रतिनिधि के रूप में आईसीसी भेजे गए हों, उम्र 70 वर्ष से अधिक हो; दिवालिया या विक्षिप्त दिमाग़ का हो; बीसीसीआई या राज्य संघ में पदाधिकारी के रूप में कुल मिलाकर नौ साल की कार्यकाल पूरा कर लिया हो; सरकारी मंत्री या सरकारी कर्मचारी हो या सार्वजनिक पद पर हो; किसी अन्य खेल के शासी निकाय का हिस्सा होने पर; कोर्ट द्वारा आपराधिक मामले का आरोपी हो।
बीसीसीआई ने प्रस्ताव दिया कि अपात्रता नियमों का अलग-अलग सेट - एक बोर्ड के शीर्ष परिषद के पदाधिकारियों और सदस्यों के लिए और दूसरा आईपीएल गवर्निंग काउंसिल और अन्य बोर्ड समितियों के सदस्यों के लिए रखा जाए।
पदाधिकारियों और शीर्ष परिषद के सदस्यों के संबंध में बीसीसीआई ने 70 साल की आयु सीमा सहित कुछ मूल नियमों को बरक़रार रखा है, लेकिन कुछ अन्य मानदंडों को हटा दिया है। इनमें सार्वजनिक पद पर रहना शामिल है, जिसे बीसीसीआई ने बहुत व्यापक परिभाषा बताया। यह भी प्रस्तावित किया गया है कि यदि किसी पदाधिकारी ने किसी राज्य संघ में कुल मिलाकर नौ साल पूरे कर लिए हैं तो वह अभी भी बीसीसीआई में काम करना जारी रख सकता है। साथ ही बीसीसीआई ने कहा, किसी अन्य खेल के प्रशासन का सदस्य होने के नाते कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। और यदि कोई व्यक्ति आपराधिक आरोप का सामना करता है, तो "दोषी ठहराए जाने पर और कम से कम तीन साल की अवधि के लिए कारावास की सजा" दी जाने पर ही उसे अपात्र ठहराया जा सकता है।
आईपीएल गवर्निंग काउंसिल और अन्य बोर्ड समितियों के सदस्यों के लिए समान नियम प्रस्तावित किए गए थे। बस उनको 70 साली की आयु सीमा में छूट दी गई थी।
संशोधन: किसी व्यक्ति को बीसीसीआई की शीर्ष परिषद, पदाधिकारी, आईपीएल गवर्निंग काउंसिल, या किसी अन्य बीसीसीआई समिति का सदस्य होने के लिए अपात्र घोषित किया जाएगा, यदि वह निम्नलिखित में से किसी भी मानदंड को पूरा करता है: भारत का नागरिक नहीं हो; 70 या उससे अधिक साल का हो; दिवालिया घोषित किया गया हो; मंत्री या सरकारी कर्मचारी हो; नौ साल तक बीसीसीआई के पदाधिकारी रहे हों; आपराधिक मामले में कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया हो और कारावास की सजा सुनाई गई हो।
कोर्ट का तर्क: कोर्ट ने अधिकांश संशोधनों पर सहमति व्यक्त की, जिसमें कटघरे में खड़े व्यक्ति को अपात्र घोषित किया जाना शामिल है, यदि उसे अपराध का दोषी ठहराया गया हो, लेकिन इस शर्त को स्वीकार नहीं किया कि आरोप को तीन साल के कारावास से जोड़ा जाना है।

सचिव को सशक्त बनाना

संविधान कहता है कि संयुक्त सचिव को अन्य कार्य सौंपते समय बीसीसीआई सचिव अनिवार्य रूप से बीसीसीआई की प्रमुख बैठकों का लिखित रिकॉर्ड रखेगा।
बीसीसीआई ने प्रस्ताव दिया कि उसके सचिव क्रिकेट सहित सभी मामलों में सर्वोच्च शक्तियों को हासिल करेंगे। यह संविधान में वर्णित "प्रतिबंधित" शक्तियों के साथ "मामूली कार्यकर्ता" होने का सीधा उल्टा है। बीसीसीआई ने कहा, "प्रबंधन कर्मी, कर्मचारी और सीईओ, सचिव के सीधे पर्यवेक्षण, नियंत्रण और निर्देशन में काम करेंगे।"
संशोधन: सचिव के पास "क्रिकेटिंग और गैर-क्रिकेटिंग मामलों के संबंध में सभी शक्तियां" होंगी और सीईओ सहित बीसीसीआई प्रबंधन उनके "प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण, नियंत्रण और निर्देशन" में काम करेगा।

नागराज गोलापुड़ी ESPNcricinfo में न्यूज़ एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के एडिटोरियल फ़्रीलांसर कुणाल किशोर ने किया है।