गायकी से गेंदबाज़ी तक: मयंक मिश्रा के संघर्ष, सब्र और 50 विकेटों वाले सीज़न का सफ़र

उत्तराखंड के बाएं हाथ के स्पिनर इस रणजी सीज़न 50 से अधिक विकेट लेने वाले इकलौते गेंदबाज़ हैं और उनकी टीम पहली बार सेमीफ़ाइनल में पहुंची है

मयंक मिश्रा ने मौजूदा रणजी सीज़न में अब तक सबसे अधिक विकेट लिया है © Saurabh Somani/ESPNcricinfo

कुछ कहानियां आंकड़ों से नहीं, धैर्य से लिखी जाती हैं। यह कहानी भी वैसी ही है, जहां एक रणजी ट्रॉफ़ी सीज़न में 50+ विकेट सिर्फ़ उपलब्धि नहीं, बल्कि एक दशक लंबे संघर्ष, टूटने-जुड़ने और फिर से उठ खड़े होने का सबूत हैं।

यह सफ़र है उत्तराखंड के बाएं हाथ के स्पिनर मयंक मिश्रा का, जिन्होंने सुरों की दुनिया छोड़ी, सिस्टम की ठोकरें खाईं, क्रिकेट से दूर चला गया और फिर उसी क्रिकेट में लौटकर अब बुलंदियों को छू रहा है। वह वर्तमान रणजी सीज़न के सात मैचों में 15.42 की औसत से 52 विकेट लेकर इस सीज़न पचास से अधिक विकेट लेने वाले इकलौते गेंदबाज़ हैं। उनकी टीम उत्तराखंड ने भी इस साल शानदार प्रदर्शन किया है और रणजी ट्रॉफ़ी में पहली बार सेमीफ़ाइनल में पहुंची है।

इस बेहतरीन सीज़न के बारे में बात करते हुए मयंक ने ESPNcricinfo से कहा, "सीज़न से पहले मैंने सबसे पहली चीज़ यही कि ख़ुद को फ़िट रख सकूं। मैंने लगभग सात किलो वजन घटाया। मैं 35 साल का हूं, लेकिन यदि आप सामने से देखेंगे तो आप कहेंगे कि मैं 31-32 का ही लगता हूं। फ़िट रहने के कारण अब मैं अधिक ओवर डाल सकता हूं। यदि आप फ़िट नहीं होंगे तो 30-40 ओवर के बाद आप थक जाएंगे। अब मैं अधिक ओवर डालकर विकेट निकालने के अधिक मौक़े बना सकता हूं।"

लेकिन आज मयंक के जिन हाथों में आप गेंद देखते हैं, वह कभी मंच पर माइक थामे हुए नज़र आते थे। 2012 तक मयंक प्रोफ़ेशनल सिंगिंग में सक्रिय थे। टैलेंट शो, ऑडिशन, लोकल मंच सब आज़माया, लेकिन मेहनत के अनुपात में आगे बढ़ने की गुंजाइश कम दिखी। उसी दौरान क्रिकेट भी चलता रहा और वह पूरी गंभीरता के साथ लोकल टूर्नामेंट खेलते रहे। फिर उनकी ज़िंदगी में एक मोड़ आया। क्रिकेट में तारीफ़ें मिलने लगीं, प्रदर्शन नोटिस होने लगा, जबकि गायकी में कुछ अधिक हो नहीं रहा था। यहीं से फ़ैसला साफ़ हुआ कि अब रास्ता क्रिकेट का ही होगा।

क्रिकेट से दूर होने के कारण मेरी फ़िटनेस ख़राब हो गई थी और मेरा वजन भी 94 किलो हो चुका था। हालांकि, मेरे पिताजी लगातार कह रहे थे कि एक बार कोशिश कर लो। मेरा मन तो नहीं था, लेकिन उनके लगातार कहने के कारण मैंने एक बार प्रयास करने का निर्णय लिया। मैंने दो साल से क्रिकेट खेला भी नहीं था। अच्छी ट्रेनिंग और डाइट में बदलाव से दो महीने के अंदर ही मैंने अपना वजन 74 किलो कर लिया था।
मयंक

पुराने दिनों को याद करते हुए मयंक कहते हैं, "गायकी को तो लंबा समय हो गया। अंतिम बार मैंने 2012 में सिंगिंग की थी। गाने गाता था और क्रिकेट भी खेलते था, लेकिन गंभीरता नहीं थी। फिर क्रिकेट में अधिक तारीफ़ होने लगी और उधर गायकी में कुछ अधिक हो नहीं रहा था तो फिर ठान लिया कि क्रिकेट ही खेलना है।"

बात 2014 के आस-पास की है जब उस दौर में उत्तराखंड को BCCI से पूर्ण मान्यता नहीं थी। घरेलू क्रिकेट का दरवाज़ा बंद था। विकल्प के तौर पर मयंक ने झारखंड का रुख़ किया। वहां पहले से उनके एक दोस्त खेल रहे थे और उन्होंने ही मयंक को झारखंड आने का न्यौता दिया था। मयंक के दोस्त को पूरी उम्मीद थी कि उनके खेल के हिसाब से उन्हें मौक़ा मिल जाएगा। मयंक ने वहां जाकर जामताड़ा जिले से क्रिकेट खेलना शुरू किया। पहले साल उन्होंने पूरी मेहनत की, लेकिन उन्हें भी पता था कि इतनी आसानी से राज्य की टीम में जगह नहीं मिलने वाली है।

ब्रॉडकास्टर्स से बात करते मयंक मिश्रा © Mayank Mishra

झारखंड में दूसरा साल मयंक के लिए ब्रेकथ्रू साबित हुआ। जिला क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन करके उन्होंने अपने जिले की टीम को प्लेट से एलीट ग्रुप तक पहुंचाया। मयंक टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ बने। इस प्रदर्शन के बाद मयंक का नाम राज्य रणजी कैंप के लिए आया। लेकिन यहीं पर सिस्टम की सख़्ती सामने आई। मयंक को कैंप ज्वाइन तक नहीं करने दिया गया। मयंक इस वाक़ये के बाद टूट गए और उन्होंने तुरंत झारखंड छोड़ने का निर्णय ले लिया। उन्होंने क्रिकेट से भी दूरी बना ली और वापस नैनीताल जाकर शेरवुड कॉलेज में क्रिकेट कोचिंग की नौकरी करने लगे।

मयंक उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे पहले साल तो पूरा एहसास था कि आसानी से राज्य की टीम में जगह नहीं मिलेगी। हालांकि, दूसरे साल जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसके बाद कैंप में नाम आने पर बहुत ख़ुशी हुई था। लेकिन फिर मुझे कैंप जॉइन नहीं करने दिया गया। मेरे साथ बदसलूकी भी की गई। इसके बाद ही मैंने ठान लिया कि अब यहां रुकने का कोई मतलब नहीं है।"

झारखंड से वापस आने के बाद मयंक ने क्रिकेट कोचिंग शुरू कर दी और क्रिकेट से लगभग दूर ही हो गए। इसके बाद 2018 में ख़बरें आने लगीं कि उत्तराखंड को पूर्ण मान्यता मिलने वाली है। इस ख़बर के आते ही मयंक के परिवार में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मयंक के पिता ने उन्हें एक और बार कोशिश करने के लिए प्रेरित किया। मयंक ने फिर ट्रायल दिए और उनका चयन पहली बार में ही उत्तराखंड की टीम में हो गया।

मयंक के पिता के पास कोई स्थायी व्यवयास नहीं था। वह परिवार चलाने के लिए कई तरह के काम करते रहे जिसमें कॉन्ट्रैक्ट पर बस चलवाना भी शामिल रहा। कोविड के समय में वह काम भी बंद हो गया था।

मयंक ने बताया, "क्रिकेट से दूर होने के कारण मेरी फ़िटनेस ख़राब हो गई थी और मेरा वजन भी 94 किलो हो चुका था। हालांकि, मेरे पिताजी लगातार कह रहे थे कि एक बार कोशिश कर लो। मेरा मन तो नहीं था, लेकिन उनके लगातार कहने के कारण मैंने एक बार प्रयास करने का निर्णय लिया। मैंने दो साल से क्रिकेट खेला भी नहीं था। अच्छी ट्रेनिंग और डाइट में बदलाव से दो महीने के अंदर ही मैंने अपना वजन 74 किलो कर लिया था। मेरे परिवार या खानदान में पहले किसी ने किसी तरह का खेल नहीं खेला था, लेकिन मेरे पिता को क्रिकेट बहुत पसंद था। वह रेडियो पर कॉमेंट्री सुनते रहते थे और मुझसे पुराने खिलाड़ियों के बारे में बात करते थे।"

उत्तराखंड ने मान्यता मिलने के बाद अपने पहले ही सीज़न में रणजी ट्रॉफ़ी के क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बना ली थी। इस सीज़न पहली बार सेमीफ़ाइनल में पहुंचने से पहले चार बार उन्होंने क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई। मयंक, जो एक समय क्रिकेट से दूर हो चुके थे, हर बार टीम के साथ रहे और एक सीनियर खिलाड़ी के रूप में टीम को अच्छा करने के लिए पुश करते रहे।

इस बारे में वह बताते हैं, "मुझे बस यह पता है कि सबकुछ भगवान के हाथ में है। यदि मैंने खेलना छोड़ दिया होता तो मैं मानता कि भगवान ने यही लिखा था। हर किसी को मुझ पर भरोसा था कि मेरे पास टैलेंट है, लेकिन प्लेटफ़ॉर्म नहीं है। मैं इस बात से काफ़ी ख़ुश हूं कि मेरे आस-पास ऐसे लोग हैं जिन्होंने हमेशा मेरे ऊपर भरोसा जताया और मुझे प्रेरित करते रहे। किसी ने मुझसे यह नहीं कहा कि अब 27-28 के हो चुके हो, तो कुछ ढंग का काम करो। हर किसी ने मुझे प्रेरित ही किया तो ऐसे लोगों को आस-पास पाकर मैं ख़ुद को सौभाग्यशाली महसूस करता हूं।"

2019 में सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफ़ी में मयंक ने गोवा के ख़िलाफ़ पारी के तीसरे ही ओवर में हैट्रिक ले ली थी। लिस्ट ए और T20 दोनों फ़ॉर्मेट में भी मयंक के आंकड़े अच्छे हैं। इसके बावजूद अब तक उन्हें किसी IPL टीम के साथ जुड़ने का मौक़ा नहीं मिला है। मयंक के हिसाब से ऐसा केवल इसलिए हुआ है कि टीमों को नए एसोसिएशन के खिलाड़ियों पर भरोसा नहीं है।

उन्होंने कहा, "वनडे में मेरी इकॉनमी चार की और T20 में सात की है। गोवा के ख़िलाफ़ T20 में हैट्रिक और दिल्ली के ख़िलाफ़ चार ओवर में केवल 10 रन ख़र्च करने के बाद भी किसी ने मेरे ऊपर भरोसा नहीं जताया। मुझे किसी IPL फ़्रेंचाइज़ी ने ट्रॉयल पर भी नहीं बुलाया। यदि किसी 70 साल पुराने एसोसिएशन की टीम के ख़िलाफ़ कोई गेंदबाज़ हैट्रिक ले सकता है तो उसके अनुभव या स्किल पर शक नहीं होना चाहिए। शायद यह मानसिकता की बात है कि लोगों को नए एसोसिएशन के खिलाड़ियों पर भरोसा नहीं है।"

ख़ैर, जैसे जीवन की तमाम कठिनाईयों और असफलता को भुलाकर मयंक आगे बढ़ते गए, वैसे उन्होंने IPL ना खेलने की निराशा को भी भुलाकर आगे बढ़ने का फ़ैसला किया। 35 साल की उम्र में अब उनका एकमात्र लक्ष्य उत्तराखंड को रणजी ट्रॉफ़ी जिताना है।

नीरज पाण्डेय ESPNcricinfo हिंदी में एसोसिएट सब-एडिटर हैं। @Messikafan

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