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मैं पूरी तरह से बिखर गई थी, हम टुकड़ों में टूट गए थे : वेदा

भारतीय बल्लेबाज़ ने कोविड-19 से परिवार के दो सदस्यों को गंवाने का दर्द साझा किया

Veda Krishnamurthy (left) with her sister Vatsala

वेदा कृष्णमूर्ति (बायें) अपनी बहन वत्सला (दायें) के साथ, जिनकी मई में कोरोना से मौत हो गई  •  Veda Krishnamurthy

मैं यह साक्षात्कार इसलिए कर रही हूं क्योंकि बहुत से लोग अभी भी यह नहीं जानते हैं कि कोविड-19 संक्रमण से कैसे निपटा जाए। मैं बस इतना चाहती हूं कि लोग खुद को शिक्षित करें, ताकि वे इंटरनेट पर लिखी गई बातों पर न जाएं। समय रहते इस संक्रमण के संदर्भ में लोगों को हमेशा पेशेवर डॉक्टर से बिना किसी देरी के परामर्श लेना चाहिए।
मुझे इस बात का कोई इल्म नहीं है कि मेरा परिवार कैसे संक्रमित हुआ। यहां तक कि बेंगलुरु में मेरे कुछ साथियों को कोविड संक्रमण हुआ है। आप कह सकते हैं कि यह पूरी तरह से किस्मत थी कि मैं इस वायरस का शिकार नहीं हुई या हो सकता है कि मुझे संक्रमण इस कारण से नहीं हुआ क्योंकि मुझे बार-बार हाथ धोने की आदत है।
इस बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक मजबूती जरूरी है। मेरी सबसे बड़ी बहन वत्सला को मृत्यु से पहले पैनिक अटैक आया था। मेरी मां भी घबरा गई होगी क्योंकि एक रात पहले बेंगलुरु से लगभग 230 किमी दूर मेरे गृह नगर कदुर में परिवार के बाकी और सदस्यों का भी कोविड टेस्ट पॉजिटिव आया था। मुझे ठीक से तो नहीं पता लेकिन इसके कारण वो परेशान जरूर हुई होंगी।
मेरा उन लोगों के प्रति सहानुभूति है, जो इस जानलेवा वायरस से पीड़ित हैं। मैंने वायरस के कारण पूरे के पूरे परिवार के नष्ट होने की कहानियां सुनी हैं। इसलिए मेरा पूरा परिवार ईश्वर का बहुत शुक्रगुजार है कि अब हम ठीक हो गए।
हम सभी इस त्रासदी के बाद वापस सामान्य होने की कोशिश कर रहे हैं। वास्तविकता को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं और खुद को याद दिला रहे हैं कि जो कुछ भी हुआ है, वह बीत चुका है। मुझे लगता है कि एक तरह से मेरी मां भाग्यशाली लोगों में से थीं क्योंकि जब उनका निधन हुआ तो उनका परिवार उनके साथ था। कई लोगों के लिए यह संभव नहीं हो पा रहा है कि जब उनका निधन हो, तो उनका पूरा परिवार पास रहे।
मेरी मां और बहन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थीं और वे हमेशा ऐसे ही रहेंगे। मैं जो कुछ भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं। मेरी मां मुझसे कहती थी कि तुम पहले देश की बेटी हो और बाद में मेरी बेटी हो। मैं सोच नहीं सकती कि मैं उन दोनों के प्रति अपना आभार व्यक्त करने के लिए क्या खास कर सकती हूं। मैंने शतक बनाया या पहली गेंद पर आउट हो गई, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था, मैं उनकी पसंदीदा क्रिकेटर थी। मैं हमेशा घर में एक लाड़ प्यार करने वाला बच्ची रही हूं।
मेरी बड़ी बहन वत्सला मेरे से 14 साल बड़ी थी और वह मेरे लिए मेरी मां की तरह ही थी। जब मैं बच्ची थी तो वह मेरा ध्यान रखती थी। कई बार तो लोग उलझन में हो जाते थे कि वह मेरी मां है या बहन। बचपन में मैं उसे कभी कहीं नहीं जाने देना चाहती थी। जब उसकी शादी हुई और वह अपने पति के घर चली गई, मैं तब एक कोने में बैठकर बहुत रोयी थी। इसके बाद मेरे जीजा जी मेरी बहन को अगली सुबह अपने साथ वापस ले आए और उससे कहा कि तुम अपनी बहन के साथ यहां रहो और ससुराल तब आ जाना जब तुम चाहती हों। ऐसा कुछ रिश्ता मेरा अपनी बहन के साथ था।
वह मेरी नंबर वन फैन थी। वह मेरे लगभग हर मैच देखती थी। वह कई बार ग्राउंड पर आती थी और मेरे और मेरे दोस्तों के लिए बड़े डिब्बों में बिरयानी लाती थी। मुझे नहीं पता यह कैसे होगा जब मैं दोबारा मैदान पर जाऊंगी और मुझे पता होगा कि वह अब कभी यहां नहीं आएगी।
मेरी मां के मरने से एक या दो दिन पहले, हम अपनी बहन के लिए काफी चिंता में थे, क्योंकि उसे लगातार छह दिन से बुखार थे। वह कदुर में आइसोलेशन में थी और उनकी रिपोर्ट भी निगेटिव आ गई थी। लेकिन जब हम उन्हें अस्पताल लेकर गए और उनका सीटी स्कैन कराया, तो सामने आया कि उन्हें कोविड निमोनिया हो गया है। जब वह दोबारा पॉजिटिव आई तो मैं बेंगलुरु में अपने घर से दूर एक होटल में रहने लगी, क्योंकि मेरे सहित हमारा पूरा परिवार वत्सला के जन्मदिन और गुड़ी पड़वा के कारण कदुर से लौटे थे।
बेंगलुरु में टेस्टिंग हुई तो मेरा रिपोर्ट निगेटिव आया, लेकिन मेरे साथ शहर लौटने वाली मेरे भाई की पत्नी और उनकी बेटियां पॉजिटिव पाई गईं। हम सभी घबरा गए थे कि अगर हम में से किसी को अस्पताल ले जाना पड़ा तो यह बहुत मुश्किल होगा क्योंकि बेंगलुरु में अस्पताल में बेड मिलना आसान नहीं था। तो हमने सोचा कि भाई और उसके परिवार को कदुर ले जाएंगे। वे कदुर चले भी गए, लेकिन अगले ही दिन मेरी मां की मृत्यु हो गई।
जब बहन का ऑक्‍सीजन लेवल गिरना शुरू हुआ तो वे वत्सला को कुदर से चिकमगलुर स्थित अस्पताल में ले गए। उसके 80% लंग्स खराब हो चुके थे। डॉक्टरों ने कहा कि दवाईयों का असर होना जरूरी है और तभी वह बता सकते हैं कि क्या हो रहा था। अचानक से उसे दवाईयां असर करने लगी और वह चार से पांच दिन के बीच ठीक होने लगी। उसे थोड़ा सा कफ़ जरूर था लेकिन उसकी सेहत में सुधार हो रहा था और मरने से एक दिन पहले वह ठीक थी। वह आईसीयू से जनरल वार्ड में पहुंच गई थी।
मुझे याद है कि जब मैंने उसके मरने से एक दिन पहले उससे बात की तो वह ठीक से बात कर रही थी, बस उसे भूख ज्यादा नहीं लग रही थी, लेकिन अगले 24 घंटे में उसका ऑक्‍सीजन लेवल दोबारा से गिरने लगा और उसकी हालत बिगड़ने लगी। ऐसा लगा जैसे उसे कोई पैनिक अटैक आया है और चीजें दोबारा से खराब होने लगी। यह कहना मुश्किल है कि अचानक से क्या हुआ।
मेरी मां के मरने के बाद मेरा भाई मानसिक तौर पर परेशान हो गया। वह भी चिकमगलुर के अस्पताल में ए​डमिट हो गया क्योंकि उसे भी कोविड हो गया था, जबकि उसकी पत्नी श्रुति कदुर के अस्पताल में भर्ती थी। मेरे पिता का कोविड के लिए सीटी स्कैन हुआ और उसकी रिपोर्ट भी खराब थी, वह भी अस्पताल में थे। मेरे भाई की बेटियां, अपनी नानी के यहां बेंगलुरु में थी। मैं अकेली थी जिसको कोविड नहीं हुआ था। मैं बेंगलुरु के होटल में बैठी थी और सभी चीजों को लेकर कॉर्डिनेट कर रही थी। मुझे जरूरत का सामान उपलब्ध कराना था और डॉक्टरों से भी अस्पतालों में उपलब्ध बेड्स के बारे में पूछना था। वो सब कुछ करना था जो उस वक्त जरूरी था।
हम इससे पहले कोविड के बारे में जानते थे कि आपको घर में रहना है, आइसोलेशन पूरा करना है और एहतियात बरतनी है, यह सब सही था। लेकिन मेरे परिवार के साथ ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि हमें इतना ज्ञान नहीं था कि कैसे जल्द से जल्द एहतियात बरती जाए। मुझे लगता है कि हमने शुरुआत में घर पर ही आइसोलेट रहकर दो से तीन दिन गंवा दिए। क्या होता अगर हम अपनी बहन को एक या दो दिन पहले अस्पताल में भर्ती करा देते, लेकिन हम बस वही कर रहे थे जो हमें पता था।
यह वह समय था जब मैंने लोगों को कोविड को लेकर जागरूक करना शुरू कर दिया। आपको इसमें जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए। उन 20 दिनों तक मैं लगाकर कॉल कर रही थी, चीजों को कार्डिनेट करने का प्रयास कर रही थी, सभी परिवार के सदस्यों से उनका हाल पूछ रही थी और उनका आत्मविश्वास बढ़ा रही थी। इन प्रयासों पर मैंने अपनी पूरी एनर्जी लगा दी थी, यह मुश्किल समय था। मैंने महसूस किया कि कई लोग हैं जो इसी तरह से जूझ रहे हैं।
मैंने सोचा था कि मेरे परिवार के लिए मेडिकल केयर मिलना दूसरे लोगों से आसान था जो बेंगलुरु या कहीं ओर रह रहे थे, क्योंकि यह कदुर था, एक छोटा सा शहर जहां हर कोई एक दूसरे को जानता है। मेरे पापा ने सीधा डॉक्टर को कॉल किया और मेरी मां और बहन के लिए बेड उपलब्ध करा लिए।
जब मैं अपना टि्वटर अकाउंट देख रही थी तो लगा कि कई लोग इसी तरह की परेशानी का सामना कर रहे हैं, उन्हें डॉक्टर तक सलाह लेने वाला नहीं मिल रहा था कि उन्हें क्या करना चाहिए। क्या उन्हें घर पर ही आइसोलेट होना चाहिए या कुछ और करना चाहिए। जब मैंने लोगों की मदद के ट्वीट को रिट्वीट करना शुरू किया, तो मैं जानती थी कि इससे थोड़ा फर्क जरूर पड़ेगा। मैंने उन ट्वीट पर ध्यान देना शुरू कर दिया क्योंकि मैं जानती थी कि इस परिस्थिति में रहकर कैसा महसूस होता है।
मेरी मां की हालत जब खराब थी, तो तब भी मैं उन ट्वीट को रिट्वीट कर रही थी ​क्योंकि मैंने सोचा कि सोशल मीडिया पर मेरी पकड़ होने के कारण मुझे यह करना चाहिए। मुझे याद है मेरे एक दोस्त ने मुझे कॉल किया और कहा कि आपको अपनी पूरी एनर्जी अपने परिवार पर लगानी चाहिए और आपको वह सब बंद कर देना चाहिए जो आप सोशल मीडिया पर कर रही हैं। मैंने सोचा कि क्योंकि मुझे दूसरे लोगों की मदद करना रोक देना चाहिए? मैं खुश हूं कि लोगों की मदद करने के लिए हमारे पास ऐसा प्लेटफॉर्म है।
उस समय पर मैंने अपने दोस्तों और उनके परिवार को भी शिक्षित करना शुरू कर दिया जो संक्रमित थे। दवाई कैसे ली जाए, बेड के लिए क्या नियम मानें जाएं और ऑक्सीजन लेवल गिरने पर क्या किया जाए। मेरे परिवार के नौ सदस्य अलग-अलग तरह के संक्रमण से ग्रसित थे, तो मैंने लोगों से अपना अनुभव साझा करना शुरू कर दिया, जिससे की उन्हें मदद मिल सके और वे सही फैसला ले पाएं। मैं बस यही सोच रही थी कि अगर मैं 20 लोगों से अनुभव साझा करती हूं तो अगर एक इंसान भी सीखें तो यह अच्छा रहेगा।
मैंने यह भी सीखा कि एक विशेषाधिकार काम का है जब केवल आप मुसीबत में हों और बाकी दुनिया ठीक हो, लेकिन इस तरह के संकट में क्योंकि सप्लाई कम है और मांग ज्यादा है, सभी लोग वह सब करेंगे जिसकी उन्हें जरूरत है। मैंने अपनी बहन के लिए इंजेक्शन की मांग करते हुए ट्वीट किया। उसे जल्द इसकी जरूरत नहीं थी, डॉक्टर आखिर में ही इसका इस्तेमाल करना चाहते थे। तब मेरे दिमाग में आया कि क्या मुझे यह इंजेक्शन मिल सकता है। मैंने तब सोचा कि अगर मैं अपनी बहन के लिए तब इंजेक्शन ले लूं तो यह उसे नहीं मिल पाएगा जिसे इसकी बहुत ज्यादा जरूरत है। मैं हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, मिताली राज, मोना मेशराम, रीमा मल्होत्रा और बाकी सभी क्रिकेटरों का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं जिन्होंने मेरे उस ट्वीट को रिट्वीट किया।
अब हम मेरी मां और बहन के बिना जिंदगी जी रहे हैं, वे हमेशा हमारा हिस्सा रहेंगे। मुझे लगता है कि यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम परिवार के हर सदस्य को खुश रखें, क्योंकि अगर हम में से कोई मानसिक तौर पर कमजोर पड़ा तो दूसरे भी पड़ेंगे। यह मैं तब भी कर रही थी जब मेरी मां का निधन हुआ और मेरी बहन जिंदगी के लिए लड़ रही थी। मैं ही अपनी बहन से बात कर रही थी जब वह सुधार करने लगी थी क्योंकि बाकी परिवार के सदस्यों को बात करने में मुश्किल हो रही थी।
मैं भाग्य पर विश्वास करती हूं, लेकिन मैंने सच में उम्मीद की थी कि मेरी बहन घर वापस आ जाए, जब वह नहीं आई थी तो मैं पूरी तरह से बिखर गई थी। हम सभी टूट गए थे और मैं आज भी अपने परिवार के सामने बहादुरी से भरा चेहरा दिखाती हूं। वह कुछ सप्ताह मेरे लिए परीक्षा से भरे थे कि कैसे मैं खुद को संभाल पाती हूं, लेकिन यह दृश्य बार-बार आकर आपको डरा देता है। मैं बस खुद को काम में उलझाई रहती हूं, जो भी मैं कर सकती हूं।
तब से अब जब भी मैं कदुर आती हूं, तो मैं कोशिश करती हूं कि मेरे पिता अकेले ना बैठे, वह कार्ड गेम्स या मूवी देखने में व्यस्त रहें। मेरी बहन का बेटा कोविड से सही हो गया है। वह 21 वर्ष का है और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। उसने अपने पिता को तो तभी गंवा दिया था जब वह सात महीने का था और अब उसकी मां भी चली गईं। यह बहुत जुदा है कि अब वह क्या सोच रहा है, क्योंकि मेरी तरह वह खुद ही चीजों को संभालना पसंद करता है।
एक ऐसे देश में जहां क्रिकेट या अन्य खेल ही अकेला है, हमें अभी भी मानसिक स्वास्थ्य पर बात करने के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा। अगर यह मुझे अपनी मां और मेरी बहन को भी सलाह देनी होती तो हम किसी पेशेवर से सलाह लेते कि कैसे कोविड से उबरने के बाद हम महसूस कर रहे हैं, अगर वह जिंदा होते तो मुझे नहीं लगता कि वह इसके लिए तैयार होते। मैं इसे उनकी ओर से गलती नहीं कहती, क्योंकि ऐसा ही हमारा समाज है।
बहुत से लोग जो क्रिकेट खेल रहे हैं वह समझते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य क्या है, लेकिन यह स्वीकार करना जरूरी है कि अगर सिस्टम इस मामले में हमारी कोई मदद नहीं कर रहा है तो हमें खुद का खुद ही ख्याल रखना होगा। आप कर सकते हो और आपको मानसिक स्वास्थ्य के मामले पर सलाह लेनी होगी। मेरे साथ भी यह समस्या थी और मैंने भी इस समस्या के निदान के लिए सहायता ली।
मुझे अभी भी लोगों से बात करने में समस्या हो रही है कि मैं कैसा महसूस कर रही हूं, मैं बस अपने जवाब इमोजी से ही देने की कोशिश करती हूं क्योंकि यह बात करने का सबसे आसान रास्ता है। जब ऐसा कुछ आपके परिवार के साथ होता है, तो यह अच्छा है कि कई लोग आपका ध्यान रखना चाहते हैं, लेकिन दूसरी ओर, जब आप उस लम्हें के बारे में सोचते हैं तो बहुत मुश्किल हो जाता है।
मैं दुखी नहीं हूं कि किसी ने मुझे कॉल या मैसेज नहीं किया। मैं सभी का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं। मुझे बीसीसीआई के सचिव का कॉल आया था जो मैंने सोचा भी नहीं था, सच कहूं तो। उन्होंने मेरे और मेरे परिवार के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि जब वह बेंगलुरु में होंगे तो मुझसे मिलेंगे। उनका कॉल आना सच में अच्छा था।

ऑन्‍नेशा घोष ESPNcricinfo में सब एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी में एसोसिएट सीनियर सब एडिटर निखिल शर्मा ने किया है।