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केवल बाहर जाती गेंदें नहीं हैं कोहली की परेशानी

भारतीय कप्तान 2018 से ज़्यादा कुछ अलग नहीं कर रहे पर बिना शतक जड़े वह कब तक अपनी तकनीक पर भरोसा रखेंगे?

विराट कोहली की हालिया फ़ॉर्म के दौरान गेंद ने उनके बल्ले का बाहरी किनारा ज़रूर लिया हो लेकिन उनके लिए अंदर आती गेंद भी परेशानी का सबब बनी हैं। इंग्लैंड में खेलते हुए कोहली छह बार बाहरी किनारे के चलते आउट हुए हैं लेकिन उनका सबसे कड़ा मुक़ाबला अंदरूनी किनारे के साथ भी रहा है।
हेडिंग्ले टेस्ट के चौथे दिन को ही ले लीजिए। कोहली ने जब 45 के स्कोर पर दिन शुरू किया तो वह जेम्स एंडरसन के आउटस्विंगर आसानी से छोड़ रहे थे। उन्होंने 14 में से 11 ऐसे गेंद छोड़े तो सबको लगा कि जिस गेंद ने उन्हें लगातार परेशान किया, शायद उसका तोड़ वह ढूंढ चुकें हैं।
बात दरअसल यह है कि यह सारी गेंदें उस अंदाज़ से रिलीज़ की गई थी जैसे कोई गेंदबाज़ अमूमन एक आउट स्विंग गेंद को रिलीज़ करने के लिए करता है और इसी वजह से उन्होंने इन्हें आसानी से पढ़ लिया था। कोहली को खिलाया गया 15वीं गेंद एंडरसन ने तिरछी सीम से डाला और यह गेंद अंदर की तरफ़ कोण बनाते हुए आई। कोहली गेंद को सुरक्षात्मक ढंग से खेलने गए तो गेंद टप्पा खाकर बाहर सीम करती हुई निकल गई। बस, यहां कोहली जैसा महान बल्लेबाज़ भी दुविधा में पड़ गया। कोहली के लिए 2014 का सीरीज़ तब पलट गया था जब लॉर्ड्स टेस्ट में उन्होंने लियम प्लंकेट की उस गेंद को छोड़ा था, जो लॉर्ड्स के स्लोप की वजह से अंदर आई।
दूसरे टेस्ट की दूसरी पारी और कोहली हुए पहली गेंद पर क्लीन बोल्ड। उनका मौजूदा ख़राब फ़ॉर्म दरअसल पिछले साल न्यूज़ीलैंड में शुरू हुआ, जहां टिम साउदी और कॉलिन डि ग्रैंडहोम ने अंदर आने वाली गेंदों पर पगबाधा आउट किया। गेंदों को देख कर लगा कि वह बाहर निकलेंगीं पर दोनों ने ठीक विपरीत व्यव्हार दिखाया।
कोहली ने ख़ुद 2016-17 में माना कि 2014 में उनको अंदर आती गेंद की आशंका ने परेशान कर रखा था। विश्व टेस्ट चैंपियनशिप फ़ाइनल में काइल जेमीसन ने फिर कोहली को अंदर आती गेंद पर पगबाधा आउट किया। उस मैच की दूसरी पारी तक कोहली ठीक 2014 की तरफ़ बाहर जाती गेंद की ओर बढ़ते हुए खेल रहे थे और उनका दाहिना कंधा दिखने लगा था।
यह अपने आप में अजीब शॉट है। आप के लिए रन मिलने का आसार न के बराबर हैं। हालांकि कोहली के लिए यह शॉट उनके पसंदीदा कवर ड्राइव की तैयारी है। उल्लेखनीय है कि 2014 के बाद कोहली ने कवर ड्राइव को अपने खेल से हटाया नहीं, बल्कि उसे और बेहतर खेलने लगे।
कुछ लोगों में ग़लतफ़हमी है कि 2018 में कोहली ने कवर ड्राइव मारना छोड़ दिया था। एजबैस्टन में उन्होंने 149 और 51 बनाए तो ऐसा लगा उन्होंने शरीर से दूर खेलना छोड़ दिया है। ऊपर से इस बार हेडिंग्ले से पहले उनका बयान भी था कि आप इंग्लैंड में अपने इगो (अहम) को जेब में रखें तो ही अच्छा है।
वास्तव में 2018 में कोहली अपने छटे गेंद पर शरीर से दूर खेलने गए थे। वो गेंद गली से पहले जाकर गिरी और फिर उन्होंने अगले गेंद को भी खेलने की कोशिश की। कोहली अपनी 13वीं गेंद पर ड्राइव लगाने गए पर वो भी हवा में गई। और 15वे गेंद को वह लेग साइड पर खेलने गए तो गेंद ने बाहरी किनारा लिया।
अपने 55वीं गेंद पर ड्रॉप होते होते कोहली ने शरीर के बाहर खेलते हुए 14 ग़लतियां की, मतलब हर चार गेंद पर एक ग़लत शॉट। इस श्रृंखला में वह 277 गेंदों में 43 फ़ॉल्स शॉट खेलते हुए पांच बार आउट हो गए हैं।
तीन साल पहले कोहली ने पेस के ख़िलाफ़ 818 में से 211 गेंदों को जाने दिया; यही आंकड़ें इस बार 207 में से 70 हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं, पहला शायद इंग्लैंड के गेंदबाज़ 2018 की तरह उन्हें स्टंप पर कम खिलाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं सीरीज़ के पहले ही गेंद पर विकेट के पीछे कैच आउट होने के बाद शायद कोहली ख़ुद ड्राइव करने, गेंद को रोकने या छोड़ने के बीच में असमंजस की स्थिति में पड़ गए हैं।
2018 में कोहली ने पेस के 818 गेंदों पर 173 ग़लतियां की और मौजूदा सीरीज़ में 207 गेंदों पर 36। तीन साल पहले उनका नियंत्रण लगभग 79 प्रतिशत था, 2021 से थोड़ा कम। अधिक नियंत्रित बल्लेबाज़ी करते हुए 36 ग़लत शॉट के फलस्वरुप पांच बार आउट होना, जब 2018 में 173 ग़लतियों के बावजूद सात बार आउट हुए, यह दर्शाता है कि क्रिकेट में क़िस्मत भी कोई बात होती है। और कोहली के साथ अच्छी और बुरी क़िस्मत भी बड़े पैमाने पर आती हैं। जहां 2014 में 10 बार आउट होते हुए उन्होंने 54 फ़ॉल्स शॉट खेले, एजबैस्टन की एक पारी में 55 ग़लतियों पर भी वह आउट नहीं हुए। इन दोनों आंकड़ों से उनके बल्लेबाज़ी के स्तर पर आप सवाल नहीं उठा सकते।
ट्विटर पर @flighted_leggie ने यह दर्शाया कि कोहली ने एक तकनीकी बदलाव को दरकिनार कर दिया है। कोहली ने 2016-17 में बताया था कि वह अपने दाएं पैर को क्रीज़ के समानांतर रखने लगे थे ताकि उनके कमर का दायां हिस्सा नहीं खुल जाए। इंग्लैंड में इस बार उनका दाहिना पैर उस तरीक़े से नहीं बैठ रहा लेकिन आउट होते हुए सिर्फ़ जेमीसन के ख़िलाफ़ ही उनका दायां कूल्हा खुलता हुआ दिखा है। शायद कोहली अपने शरीर के संरेखण से ख़ुश हैं और उन्हें बैकफ़ुट का क्रीज़ से समानांतर न होने का इल्म नहीं हैं।
कोहली का सामना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ तेज़ गेंदबाज़ से है, जिनके इर्द गिर्द भी एक उच्चतम श्रेणी का गेंदबाज़ी क्रम खड़ा है। कोहली हर आउटस्विंगर के पीछे नहीं जा रहे। यह इन गेंदबाज़ों की प्रसंशनीय रणनीति है कि 51.14 की औसत से 7671 रन बनाने वाला एक बल्लेबाज़ उनके ख़िलाफ़ अंदर आती गेंद के संदेह के चलते ग़लतियां कर रहा है।
ग़लत शॉट खेलने के बाद आपकी प्रतिक्रिया आपके तकनीकी स्वभाव पर निर्भर है। एक सुरक्षात्मक खिलाड़ी लंबाई आंकने में भूल कर भी जाए तो बल्ले को शरीर के क़रीब रखने की वजह से वो प्रायः सिर्फ़ बीट होता है। आक्रमक बल्लेबाज़ रन बटोरने के लिए अपने शरीर को तैयार करता है और इसी वजह से वह अच्छी गेंदों पर भी रन बनाता है।
चेतेश्वर पुजारा औसतन हर 13.71 ग़लतियों पर आउट होते हैं, तो वहीं कोहली हर 11.3 फ़ॉल्स शॉट पर। पुजारा अपनी ग़लतियों पर कम आउट होते हैं और कोहली उतनी ही ग़लतियां करने में ज़्यादा रन बना लेते हैं। विश्व क्रिकेट में स्टीव स्मिथ ही ऐसे अनोखे खिलाड़ी हैं जो पुजारा जैसी सुरक्षात्मकता के साथ कोहली की तेज़ी से बल्लेबाज़ी कर लेते हैं। अपने अंदाज़ में पुजारा और कोहली भी सफलतम बल्लेबाज़ों की सूची में शामिल हैं।
अगर कोहली को अपना अंदाज़ बदलना है और गेंदबाज़ों को उनकी शरीर पर गेंदें डलवानी है तो उन्हें अपने कवर में रन थोड़े कम करने पड़ेंगे। उन्होंने ऐसा 2014 में नहीं किया, और सिर्फ़ 32 की उम्र में ऐसा भी नहीं है कि वह अपने गेम को ख़ासा बदलना चाहेंगे।
बिना शतकीय पारी के विराट कोहली आख़िर कब तक सिर्फ़ अपने तकनीक और अपने स्वभाव पर भरोसा रखते हुए खेलेंगे? उनकी बल्लेबाज़ी में एक बेफ़िक्र अंदाज़ है लेकिन स्कोरबोर्ड झूठ नहीं बोलता।कोहली के करियर का यह पड़ाव सिर्फ़ यह बताता है कि उनके ज़बरदस्त फ़ॉर्म के दिन कितने अविश्वसनीय थे।

सिद्धार्थ मोंगा ESPNcricinfo में सहायक संपादक हैं, अनुवाद ESPNcricinfo के सीनियर असिस्टेंट एडिटर और स्थानीय भाषा प्रमुख देबायन सेन ने किया है