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प्रदीप मैगज़ीन : सौरव गांगुली मैदान के अंदर जैसे दिखते थे, बाहर बिल्कुल अलग थे

वरिष्ठ पत्रकार ने बीसीसीआई अध्यक्ष के करियर के पुराने दिनों को याद किया, साथ ही साथ राहुल द्रविड़ और जॉन राइट के साथ उनके रिश्तों के बारे में भी अपनी किताब में लिखा है

प्रदीप मैगज़ीन
22-Dec-2021
2005 में कोलकाता के बेहाला में अपने घर के बाहर सौरव गांगुली  •  Associated Press

2005 में कोलकाता के बेहाला में अपने घर के बाहर सौरव गांगुली  •  Associated Press

मैंने 1999 विश्व कप के बाद लंदन में पहली बार सौरव गांगुली का इंटरव्यू लिया था। उनकी प्रतिष्ठा उससे पहले: एक धूर्त, मनमौजी व्यक्ति जिसे उसके अमीर पिता ने बिगाड़ दिया था, कुछ ऐसी ही थी। लोग उनकी प्रतिभा से ज़्यादा इन्हीं चीज़ों की बात करते थे। मैं यह पता लगाने के लिए दृढ़ था कि क्या यह छवि सटीक थी, क्योंकि तब तक जब भी मैंने उनके साथ कुछ संक्षिप्त बातचीत की थी तो वह एक विनम्र और अच्छे व्यवहार वाले व्यक्ति ही नज़र आए थे।
गांगुली की मुस्कान बेहद स्वागत योग्य है, हालांकि ये भी हो सकता है कि वह हमेशा वादा किए गए समय पर इंटरव्यू के लिए न पहुंचे, या आपको पूरी तरह से धोखा दे दें, लेकिन एक बार जब उनकी मुलाक़ात आपसे हो जाए तो आप पाएंगे कि वह पूरी तरह से विनम्र हैं और उन्हें नहीं पसंद करना मुश्किल है। उस दिन लंदन में उनका व्यवहार सबसे अच्छा था। मैदान पर गांगुली का वह घूंसा मारने जैसा जोश, आक्रामक बॉडी लैंग्वेज, जो उन्होंने कप्तान बनने के बाद से दिखाई थी। लेकिन मैदान के बाहर वह आमतौर पर एक अच्छे और मिलनसार व्यक्ति थे। इंग्लैंड में उस दिन विश्व क्रिकेट के सबसे बड़े मंच पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले वे बहुत संतुष्ट व्यक्ति थे।
जब मैंने होटल की लॉबी में उनका साक्षात्कार लिया, तो कई बंगाली पत्रकार उनकी नज़र में आने और उनसे एक कोट लेने के इरादे से इधर-उधर घूम रहे थे। स्थानीय पत्रकारों की नज़र में दादा का क़द अब बढ़ता जा रहा था। दादा ख़ुद बंगाली प्रेस के महत्व से अवगत थे, और उनके साथ एक परिचित और गर्मजोशी के साथ व्यवहार करते थे, ठीक वैसा ही जैसा हम या आप किसी अपने परिवार वाले के साथ करते हैं।
बंगाल का एक फ़्रीलांस फ़ोटोग्राफर था जो किसी दौरे पर सुविधाजनक जगह नहीं मिलने पर अपना सामान गांगुली के कमरे में रखता था और गांगुली कभी-कभी उसे अपने कमरे में सोने भी देते थे। ऐसे कई अन्य लोग थे जो मानते थे कि वह उनका घनिष्ठ मित्र था और वह अपने रहस्य केवल उनके साथ साझा करते थे।
जैसे-जैसे गांगुली का क़द बढ़ता गया और भारतीय क्रिकेट पर उनका नियंत्रण शुरू होने लगा, उनके साथ उनका रिश्ता और मज़बूत होता गया, इसके बाद वह अब पत्रकारों और उस कथित मित्र को भी कम समय देने लगे थे। वह जानते थे कि कब पत्रकारों का स्वागत गर्मजोशी के साथ करना है और कब उन्हें अनदेखा करना है।
मेरे इस सवाल के जवाब में कि बंगाल के पत्रकारों की लगातार मौजूदगी से वे नाराज़ क्यों नहीं हुए, उन्होंने मुझे बताया कि बेहाला, कोलकाता में उनका घर हमेशा दोस्तों और शुभचिंतकों के लिए खुला रहता था। ख़ास तौर से उन लोगों के लिए जो बड़ी संख्या में उनके माता-पिता को उनके बेटे की उपलब्धियों पर बधाई देने के लिए आते थे।
मुझे बाद में पता चला कि उनका घर एक विशाल हवेली है जिसमें कई विशाल लॉन हैं जो आसानी से सैकड़ों उपस्थित लोगों के साथ कार्यक्रमों की मेज़बानी कर सकते हैं। गांगुली बंगाली पत्रकारों की ज़रूरतों को समझते थे और ये भी जानते थे कि अख़बार उनसे क्या अपेक्षा करते हैं, क्योंकि एक स्थानीय बालक भारतीय टीम में इतना अच्छा कर रहा था।
उन्होंने कहा, "उन्हें कुछ बयान और थोड़ी पहुंच की आवश्यकता है और मुझे इससे कोई ऐतराज़ भी नहीं।" गांगुली के साथ किए गए उस इंटरव्यू के बाद अहंकार, दंभ या स्वार्थी जैसे शब्द उनके लिए कहना अब मेरे लिए मुश्किल था।
यह नहीं भूलना चाहिए कि गांगुली को उस टीम का कप्तान बनाया गया था, जिसमें उनके वरिष्ठ सहयोगी, अनिल कुंबले भी मौजूद थे। सच कहा जाए तो कूंबले तार्किक तौर पर ज़्यादा मुनासिब उम्मीदवार थे। तो वहीं राहुल द्रविड़ को भी लगा होगा कि उनके लिए भी एक मौक़ा ज़रूर है।
भारत के 2002 दौरे पर हेडिंग्ली टेस्ट में जीत के बाद मुझे द्रविड़ का साक्षात्कार याद है। गांगुली ने बादल से घिरी सीमिंग परिस्थितियों में पहले बल्लेबाजी करने का फ़ैसला करते हुए एक सकारात्मक सोच दिखाई थी, और भारत ने पहली पारी में एक बड़ा स्कोर बनाने के लिए बेहतरीन अंदाज़ में सीम और स्विंग गेंदबाजी का सामना किया। यह पारी द्रविड़ और सलामी बल्लेबाज संजय बांगर की तकनीकी प्रतिभा के इर्द-गिर्द बुनी गई थी, जिन्होंने सचिन तेंदुलकर और गांगुली के लिए एक शानदार प्लेटफ़ॉर्म सेट किया था।
उस साक्षात्कार में, मैंने द्रविड़ से पूछा कि क्या वह कप्तानी की महत्वाकांक्षा रखते हैं और भविष्य में किसी समय टीम का नेतृत्व करना चाहेंगे। उन्होंने सकारात्मक जवाब देते हुए कहा कि वह, अधिकांश खिलाड़ियों की तरह, किसी दिन राष्ट्रीय टीम की कप्तानी करना चाहते हैं। यह एक सहज और ईमानदार जवाब था। वास्तव में द्रविड़ ने सार्वजनिक रूप से ख़ुद को जिस गरिमापूर्ण तरीक़े से संभाला, उसके लिए उन्हें ज़बरदस्त सम्मान मिला। उन्होंने हमेशा अपने शब्दों को बहुत सावधानी से चुना, ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहते थे जो विवाद पैदा कर सके।
बाद में, जब मैं लेख लिख रहा था, द्रविड़ मेरे पास आए और कहा, "प्रदीप, कृपया वह कप्तानी का सवाल छोड़ दें।" मैं उनकी दुविधा को समझ गया और उनके अनुरोध पर सहमत हो गया। जबकि उन्होंने जो कहा था उसमें कुछ भी ग़लत नहीं था और वह किसी भी तरह से टीम में कोई कलह पैदा करने की कोशिश नहीं कर रहे थे, वह नहीं चाहते थे कि उनके जवाब को गांगुली के सिंहासन के लिए एक चुनौती के रूप में ग़लत समझा जाए।

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अपनी आंखों से ही सामने वाले को घायल करने वाले लंब क़द के जॉन राइट। वह आम तौर पर पत्रकारों से ज़्यादा बात नहीं करते थे और ख़ुद में ही रहने वाले व्यक्ति थे। लेकिन जब उनके हाथ में बीयर का गिलास हो, तो फिर वह ज़्यादा गर्मजोशी से मिलते थे और अपनी राय खुलकर रखते थे। पिछली शाम आपके साथ शराब पीने के बाद, वह कभी-कभी अगली सुबह आपको मैदान पर पहचानते भी नहीं थे। उनका इस तरह का रुख़ कभी-कभी आपको असभ्य भी लग सकता था।
वह एक प्रतिबद्ध पेशेवर थे, अराजक परिस्थितियों में काम कर रहे थे, जहां उचित योजना, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अनुशासन की बहुत कमी थी। भारत में, क्रिकेट सितारों को संभालना मुश्किल हो सकता है और एक कोच को सफल होने के लिए अपने स्टार खिलाड़ियों को ख़ुश रखना पड़ता है। एक बार, राइट ने एक और रचनात्मक तरीक़े का ख़ुलासा किया, जिसका इस्तेमाल उन्होंने खिलाड़ियों को उनके अभिमान को चकमा दिए बिना उनके इनपुट का पालन करने के लिए किया।
राइट ने कहा, "मुझे पता है कि वे बड़े सितारे हैं और उनके पास ईगो भी काफ़ी है। मुझे सावधान रहना होगा क्योंकि वे निर्देश देना पसंद नहीं करते हैं। आप रॉक स्टार की तरह लोगों को ग़लतियां नहीं बताते हैं। मैं उनके दिमाग़ में बहुत सूक्ष्मता से काम करता हूं। एक विचार को धीरे-धीरे डालते हैं, कुछ इस तरह कि वे मेरे पास आते हैं और ख़ुद कहते हैं, 'अरे जॉन, मैंने यह करने का फ़ैसला किया है', और यह वही है जो मैं चाहता था। अंतर यह है कि उन्हें लगता है कि ये उनका अपना विचार है, और मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं था। मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा, क्योंकि मैंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया था।"
मैंने राइट को मैदान पर ड्रेसिंग रूम की रणनीति के ठीक विपरीत गांगुली पर ग़ुस्सा करते हुए भी देखा है। दिन के खेल के बाद होटल के बार में राइट कप्तान को न सुनने के लिए डांटते थे। लेकिन उन्होंने अपनी हताशा को कभी ख़त्म नहीं होने दिया और टीम को अस्थिर करने नहीं दिया।
कोच और कप्तान और खिलाड़ियों के बीच संबंधों में स्वस्थ संतुलन बनाए रखने का बहुत सारा श्रेय गांगुली को भी जाना चाहिए। उन्हें पता था कि कब अपनी मांगों पर क़ायम रहना है और कब झुकना है। ग्रेग चैपल के साथ हुए मतभेदों के बारे में बोलते हुए गांगुली ने कहा, "कई बार राइट मुझसे इतने परेशान हो जाते थे कि वह मुझसे कई दिनों तक बात भी नहीं करते थे।" इस दौरान, गांगुली भी चुप रहते थे और मामलों तूल नहीं देने देते थे। आख़िरकार चीजें सामान्य हो जीता थीं, और फिर "हम दोनों आगे बढ़ जाते थे"।
1989-90 में गांगुली का प्रथम श्रेणी में डेब्यू रणजी ट्रॉफ़ी फ़ाइनल में हुआ था। जहां उनके सामने दिल्ली की एक ऐसी टीम थी जो गाली-गलौज कर रही थी। दिल्ली ने बंगाल के खिलाड़ियों को लगातार स्लेज किया। दिल्ली की टीम में कीर्ति आजाद, दिवंगत रमन लांबा, मनोज प्रभाकर, अतुल वासन और मनिंदर सिंह थे, जबकि बंगाल की टीम में अरुण लाल, अशोक मल्होत्रा और प्रणब रॉय शामिल थे। दोनों पक्षों द्वारा ख़राब रोशनी और बेहद धीमी बल्लेबाजी के संयोजन के कारण, कोई भी टीम दूसरी बार बल्लेबाजी नहीं कर सकी। गांगुली ने महत्वपूर्ण 22 रन बनाए और अपने समय के कुछ सबसे प्रसिद्ध खिलाड़ियों को उनका सबसे ख़राब व्यवहार करते हुए देखा।
हालांकि, दिल्ली की डराने वाली रणनीति विफल रही और बंगाल ने वह मैच जीत लिया। तब वह केवल दूसरी बार रणजी चैंपियन का ताज पहन रहे थे। उस पहले मैच से ही, गांगुली को ऑन-फ़ील्ड रणनीति से अवगत कराया गया था जो किसी कोचिंग मैनुअल में दिखाई नहीं देती। उन्होंने ड्रेसिंग रूम में तैयार की गई रणनीतियों में हमेशा विश्वास नहीं रखा; ज़मीन पर उनकी प्रतिक्रियाएं उस पल के हिसाब से तय होती थी।
उदाहरण के लिए, हरभजन सिंह एक टेस्ट मैच के दौरान अप्रभावी साबित हो रहे थे, और एक सत्र ब्रेक के दौरान कोच और कप्तान ने फ़ैसला किया खेल फिर से शुरू होने पर गेंद किसी और को दें। हालांकि, मैदान पर वापस जाने से ठीक पहले, गांगुली ने हरभजन को मैदान के किनारे शानदार लय के साथ गेंदबाजी करते हुए देखा। गांगुली ने कहा, "जब मैच फिर से शुरू हुआ, तो मैंने योजना के ख़िलाफ़ जाकर हरभजन को गेंद थमा दी। और उन्होंने हमें तुरंत विकेट दिलाए।"
लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि कई बार ऐसा भी होगा जब उनकी ये भावनाएं मैदान पर काम नहीं आएंगी। "अंत में जो मायने रखता है वह आपका इरादा है, परिणाम हमेशा आपके हाथ में नहीं होता है।" गांगुली ने यह बात उस समय कही जब ग्रेग चैपल के साथ उनकी निजी लड़ाई चल रही थी, कोच-कप्तान के रिश्ते को वह परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश कर रहे थे।
गांगुली-राइट संयोजन 2003 एडिलेड टेस्ट के दौरान चरम पर था, जहां भारत ने ऐतिहासिक जीत के लिए 230 रनों का पीछा किया। मेरे पास तीन बहुत ही विपरीत उपाख्यान हैं जो उन विभिन्न भावनाओं के बारे में ख़ुलासा करते हैं जो इन हाई-वोल्टेज स्थितियों के केंद्र में उन लोगों के दिमाग़ में चलती हैं।
चौथे दिन के अंत में, भारत को अभी भी जीत के लिए 193 की ज़रूरत थी। द्रविड़ उस शाम होटल में मेरे कमरे में आए, शायद मैच के दबाव से अपना ध्यान हटाने के लिए। उन्होंने हल्की-फुल्की बातचीत शुरू की लेकिन मेरे अंदर के पत्रकार ने बात को मैच की ओर ले जाने की कोशिश की। द्रविड़ ने तुरंत स्पष्ट कर दिया कि वह मैच के बारे में बात नहीं करना चाहते और न ही सोचना चाहते हैं।
भारत के लक्ष्य का पीछा करने के दौरान, वीरेंद्र सहवाग ने स्टुअर्ट मैकगिल के खिलाफ ज़बरदस्त खेल दिखाया और 47 रन पर आउट हो गए, जिससे भारतीय टीम दबाव में आ गई थी। हालांकि फिर द्रविड़ के नाबाद 72 रनों के दम पर भारत टेस्ट जीतने में सफल रहा। गांगुली ने क्रीज़ पर 41 मिनट के कठिन समय में केवल 12 का योगदान दिया।
जीत के बाद भारतीय कप्तान उत्साहित और रोमांचित थे, जब मैंने पूछा कि वह दबाव से कैसे ख़द को निकाल पाए, तो उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा "जब मैं बल्लेबाजी कर रहा था, तो मैं इतना घबरा गया था कि मैं शायद ही गेंद को देख सकता था।" इसके बाद बेचैन गांगुली ने अपनी पारी के दौरान द्रविड़ से बात की थी और अपने मन की स्थिति के बारे में बताया था। भारत को जीत की ओर ले जाने के लिए वह अपने डिप्टी के आभारी थे।
तीसरी घटना उस रात बाद में हुई, जो राइट की अपनी टीम को निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए किसी भी हद तक जाने का इरादा दिखाती है। अगर कोई खिलाड़ी आदर्श से विचलित होता है, तो कोच बेहद दुखी होगा, भले ही अंतिम परिणाम सुखद हो, जैसा कि उस दिन हुआ। राइट ट्रेनर एंड्रयू लीपस के साथ बार में थे, मैंने उन्हें बधाई दी और समारोह में शामिल हुआ।
हालांकि जीत से काफ़ी ख़ुश थे, लेकिन सहवाग के आउट होने के तरीक़े से परेशान थे। राइट के लिए इस तरह के अपमानजनक शॉट के प्रयास में अपना विकेट फेंकना एक ग़ैरज़िम्मेदार रवैया था, वह भी उस स्थिति में जहां भारत एक ऐतिहासिक जीत का पीछा कर रहा था। "वह क्या सोच रहा था," राइट ने अपशब्दों की एक स्ट्रिंग में बड़बड़ाया। मैं टीम पर आउट होने के दबाव पर उनकी हताशा को समझ सकता था।
राइट ऐसे ही थे, उनके लिए प्रक्रिया और अनुशासन ही सब कुछ था।
यह एक संपादित अंश है नॉट जस्ट क्रिकेट: ए रिपोर्टर्स जर्नी थ्रू मॉडर्न इंडिया, प्रदीप मैगज़ीन द्वारा लिखित, हार्पर कॉलिन्स (2021) द्वारा प्रकाशित

अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट सैयद हुसैन ने किया है। @imsyedhussain