रोहित शर्मा टेस्ट डेब्यू पर शतक बनाने वाले 15 भारतीय पुरुष खिलाड़ियों में से एक हैं। दरअसल, उन्होंने अपने पहले दो टेस्ट मैचों में शतक बनाया था।

उनके अंतर्राष्ट्रीय करियर की राह अन्य खिलाड़ियों की तुलना में थोड़ी अलग रही है। रोहित को सफेद गेंद क्रिकेट में ख़ुद को स्थापित करने के बाद ही टेस्ट डेब्यू करने का मौका मिला। अपने पहले दो टेस्ट मैचों में दो शतक लगाकर रोहित ने अपने टेस्ट करियर की शानदार शुरुआत भी की। उनके पास बेहतरीन बल्लेबाज़ी करने का कौशल तो था, बात सिर्फ सफ़ेद गेंद के फ़ॉर्म को टेस्ट मैचों में बरकरार रखने की थी। अपने शुरुआती मैचों में उन्होंने ऐसा ही किया।

लेकिन दुर्भाग्य से उनका टेस्ट करियर इतना शानदार नहीं रहा। वह लगातार टीम से अंदर-बाहर होते रहे। और तो और उन्हें सफ़ेद गेंद वाली क्रिकेट की तरह टेस्ट मैचों में ओपन करवाने के फ़ैसले को उनके टेस्ट करियर को पुनर्जीवित करने का आख़िरी पासा समझा गया।

उन्होंने ओपनिंग में अभी तक अपना काम कर दिखाया है। तो सवाल उठता है कि इसे पहले क्यों नहीं आज़माया गया? साथ ही तकनीकी रूप से कुछ हद तक कमजोर माने जाने वाला बल्लेबाज़ कैसे टेस्ट मैचों में ओपन कर सकता है?

बेशक आने वाले समय में एक सलामी बल्लेबाज़ के रूप में उन्हें अग्निपरिक्षा से गुज़रना होगा। आने वाले समय में भारत को इंग्लैंड में पांच और साउथ अफ़्रीका में तीन टेस्ट खेलने हैं। लेकिन आइए इस सवाल पर गौर करें कि उन्हें पहले सलामी बल्लेबाज़ के रूप में क्यों नहीं आज़माया गया।

शर्मा की बल्लेबाज़ी की शैली आकर्षक और प्रभावी है लेकिन यह तकनीकी रूप से थोड़ा कमजोर होने का आभास भी देती है। उनके पैर ज़्यादा हिलते नहीं हैं और वह केवल अपने हाथों से गेंद तक पहुंचने का प्रयास करते हैं।

फिर भी, क्या आप उन्हें इस तरह खेलने के लिए दोषी ठहरा सकते हैं? सफेद गेंद वाली क्रिकेट में आप इस तकनीक से स्कोर कर सकते हैं। अपने पैरों को बहुत अधिक हिलाना आपको धीमा कर सकता है और यदि आप धीमे हैं तो आप वनडे क्रिकेट में दोहरा शतक नहीं बना सकते।

सफेद गेंद वाली क्रिकेट में बहुत सारे रन बनाने की उनकी क्षमता ने उन्हें सबकी नज़रों में छोटे प्रारूपों का बल्लेबाज़ बना दिया था। हर बार आउट होने पर उनकी निंदा की जाती थी और यह कहा जाता था कि उनके पास टेस्ट मैच खेलने का स्वभाव नहीं है। सही मायने में उस समय यह विश्वास पूरी तरह से गलत भी नहीं था। इसलिए उन्हें शीर्ष क्रम में आज़माने की अनिच्छा टीम मैनेजमेंट में थी।

मुझे याद है कि मैंने टेस्ट में रन बनाने की लय को समझने के लिए संघर्ष कर रहे शर्मा के बारे में लिखा भी था। वह हमेशा की तरह लाजवाब फ़ॉर्म में नज़र आते थे और फिर एक ऐसा शॉट खेलेते जिससे आपका सिर घूम जाता। आपको आश्चर्य होता कि जब सब कुछ सही ढंग से चल रहा था, तो उन्होंने ऐसा क्यों किया। शायद इसका कारण यह था कि वह भारत के व्यस्त क्रिकेट कैलेंडर के कारण कोई प्रथम श्रेणी क्रिकेट नहीं खेल रहे थे।

तो अब क्या बदल गया है या उनकी टेस्ट बल्लेबाज़ी में कुछ बदलाव आया है?

जब से उन्होंने टेस्ट में ओपनिंग करना शुरू किया है तब से उनकी बल्लेबाज़ी में बदलाव आया है। फ़्रंट-फ़ुट थोड़ा और आगे निकल रहा है और हाथ शरीर के करीब रह रहे हैं। हालांकि विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (डब्ल्यूटीसी) फ़ाइनल 2019 में वह बड़ा स्कोर नहीं कर सके। लेकिन उन्होंने दोनों पारियों में परिस्थितियों के अनुसार अपने खेल को ढालने का एक ईमानदार प्रयास किया। फ़्रंट-फ़ुट आगे ले जाने के बाद भी वह स्विंग के ख़िलाफ़ नहीं खेल रहे थे। उन्होंने गेंदों को धैर्यपूर्वक डिफेंस किया, फ़ुल व शॉर्ट गेंदों की प्रतीक्षा की और फिर अपने हाथ खोले।

डब्ल्यूटीसी फ़ाइनल ऐसा पहला मौका नहीं था जब शर्मा ने अपनी तकनीक में बदलाव किया। इस साल इंग्लैंड के ख़िलाफ़ चेन्नई में शतक, अहमदाबाद में अर्धशतक और अक्टूबर 2019 में दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ रांची में दोहरे शतक के दौरान भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया था।

शॉट लगाना शर्मा की बल्लेबाज़ी का मूल-मंत्र है। इसलिए सावधानी और आक्रामकता को संतुलित रखना उनके लिए कठिन साबित हो सकता है। किसी एक में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी उनके लिए परेशानी का कारण बन सकती है।

मुझे चेन्नई में उनकी बल्लेबाज़ी का अंदाज़ बहुत पंसद आया था, जो पहले दिन बल्लेबाज़ी करने के लिए सबसे मुश्किल पिचों में से एक थी। शर्मा जैसे एक कुशल खिलाड़ी (मैं यहां "प्रतिभाशाली" शब्द से परहेज़ कर रहा हूं) के लिए, अपनी परेशानी को दूर करने के लिए बड़े शॉट लगाना एक तरीक़ा हो सकता है। यह सीमित ओवरों की क्रिकेट में बहुत फ़ायदेमंद रहता है। परंतु टेस्ट क्रिकेट का अपना अलग अंदाज़ है और ऐसा लग रहा है कि शर्मा टेस्ट मैचों के अनुसार अपने खेल को बदलने के लिए तैयार हैं।

क्या वह फिर कभी कोई खराब शॉट नहीं खेलेंगे? ऐसा तो कभी नहीं हो सकता। पर जब भी ऐसा होगा, कोई भी जल्दबाज़ी में उनके टेस्ट करियर पर अपना फ़ैसला नहीं सुना पाएगा।

यह तो वक्त ही बताएगा कि क्या रोहित इंग्लैंड में रन बनाएंगे और विदेशों में भी टेस्ट सलामी बल्लेबाज़ के रूप में ख़ुद को साबित करेंगे। पर उनके हालिया फ़ॉर्म को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि वह इसके लिए अपना सब कुछ झोंक देंगे।

भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा (@cricketaakash) तीन किताबों के लेखक भी हैं। उनकी नवीनतम किताब का नाम 'द इनसाइडर: डिकोडिंग द क्राफ्ट ऑफ़ क्रिकेट' है। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब-एडिटर अफ़्ज़ल जिवानी (@jiwani_afzal) ने किया है।