केएल राहुल एक ऐसे बल्लेबाज़ हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपने पहले दिन से ही बेहतरीन खेल दिखा रहे हैं। साथ ही साथ वह एक ऐसे खिलाड़ी भी हैं, जो अपने खेल की नींव (बेसिक्स) से समझौता किए बिना तीनों प्रारूपों में बढ़िया प्रदर्शन करने में सक्षम है।

उनका स्टांस, पैरों का मूवमेंट और बैक लिफ़्ट सभी अद्भुत तालमेल में रहती हैं। भले ही उन्हें टी20 क्रिकेट में कुछ समय लगा लेकिन जिस दिन उन्होंने इस ताबड़तोड़ गेम के कोड को क्रैक किया, उस दिन से उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

क्रिकेट का एक रहस्य है कि जब कुछ सही चलने लगता है, तब कुछ ऐसी चीजें सामने आएंगी जो आपके करियर को बार-बार पटरी से उतारने का प्रयास करेंगी। ऐसा राहुल के साथ भी हुआ। राहुल चोटिल हुए और उसके बाद उनके फ़ॉर्म ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया।

इस संदर्भ में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि जब कोई व्यक्ति अपना फ़ॉर्म खो देता है, तो उसके पीछे क्या-क्या कारण होते हैं? क्रिकेट कौशल (स्किल) एक पहिये की तरह है, जो कि लगातार घूम रहा होता है कभी-कभी आप इसमें अपनी मूल ताकत को पहचानने से चूक जाते हैं। छोटी-छोटी कमियां आपके खेल में बिन बुलाए मेहमानों की तरह घुसने के तरीके ढूंढती हैं और इससे पहले कि आप उनकी उपस्थिति को स्वीकार करें, वे आपके सोचने के तरीके को नियंत्रित करना शुरू कर देते हैं। इसके बाद आप एक ऐसे मुकाम पर पहुंच जाते हैं, जब आप सिर्फ उन कमियों के बारे में ही सोच रहे होते हैं।

राहुल ऐसे ही दौर से गुजर रहे थे और खेलों के बीच अनगिनत घंटे नेट्स में बिता रहे थे। लेकिन कड़ी मेहनत भी रनों में तब्दील नहीं हो पा रही। इंग्लैंड में (2018 में) वह बाहर की गेंदों की छेड़-छाड़ करने के कारण लगातार आउट हो रहे थे। भारत में वह सामने की गेंदों पर फंस रहे थे। इन दोनों तरीके से आउट होने या उन गेंदों को खेलने के लिए यह जरूरी है कि आप कितनी तेजी से और कब आगे की तरफ मूव करते हैं।

जब आप "फ़ॉर्म" में होते हैं, तो यह मूवमेंट लगभग अनजाने में होता है क्योंकि आपका ध्यान आपके रास्ते में आने वाली गेंद पर होता है। लेकिन जब आप "फ़ॉर्म" में नहीं होते हैं, तो आप उसी ट्रिगर मूवमेंट के बारे में सोचते हैं।

भारत के पूर्व बल्लेबाज़ी कोच संजय बांगर याद करते हैं कि कैसे 2018 और 2019 के बीच एक टेस्ट में आउट होने के बाद, राहुल अपनी गलतियों को सुधारने के लिए नेट्स में उतरने का इंतजार नहीं कर सकते थे। उन्हें अभी-अभी आउट किया गया था। वह स्क्रीन पर कई बार डिसमिसल्स देख रहे थे और वह इसे भूलना नहीं चाहते थे। वह नेट पर जाने के लिए उत्सुक थे, जबकि भारत टेस्ट में अभी भी बल्लेबाज़ी कर रहा था।

इसमें कुछ गलत नहीं है कि आप अपनी गलतियों को पहचानने और सुधारने के लिए अडिग हैं और उसे तुरंत ठीक कर लेना चाहते हैं। हालांकि हमें इस बात का भी ख़्याल रखना चाहिए कि किसी भी चीज की अति, यहां तक ​​कि ट्रेनिंग भी खतरनाक साबित हो सकती है और वह आपको नुकसान पहुंचा सकती है। उस दिन राहुल अपनी खामियों को दूर करने के लिए बेताब थे।

एक बार जब उन्हें भारतीय टीम से बाहर कर दिया गया, तो वह फिर से वापसी के लिए भी उतने ही व्याकुल थे। अस्वीकृति के प्रति यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है। यह प्रतिक्रिया और भी अधिक होती है, तब जब आप उच्चतम स्तर पर सफलता का स्वाद चख चुके होते हैं। ऐसा लगता है कि आप सफलता का रहस्य जानते हैं लेकिन अस्थायी रूप से उसका पासवर्ड भूल गए हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्सुकता कब चिंता में बदल जाती है? जब आप परिणाम के बारे में बहुत अधिक और प्रक्रिया के बारे में बहुत कम सोचते हैं। ऐसा नहीं है कि आप घंटों मेहनत नहीं कर रहे होते हैं, लेकिन आप खेल खेलने की खुशी, गेंद के बल्ले से टकराने की धुन का आनंद लेना बंद कर देते हैं। लेकिन फिर एक दिन आप परिणाम के बारे में उतावला होना बंद कर देते हैं और चीजें फिर से ठीक होने लगती हैं।

बेशक, मेरे इस परिस्थिति को जानने और पढ़ने में बहुत सारे अनुमान हैं, लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर यह मेरे द्वारा वर्णित शब्दों और परिस्थितियों से ज़्यादा अलग ना हो।

यह सच है कि आईपीएल एक आधुनिक क्रिकेटर के करियर का एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन मैं इस तथ्य पर अपना आखिरी रूपया दांव पर लगा सकता हूं कि राहुल सिर्फ आईपीएल से संतुष्ट होने वालों में से नहीं हैं। उनका बड़ा लक्ष्य सिर्फ भारत के लिए फिर से खेलना नहीं था बल्कि तीनों प्रारूपों में भारत के लिए खेलना था।

जब उन्होंने कीपर और फिनिशर की भूमिकाएं संभालीं तो उन्होंने खुद को सीमित ओवर की क्रिकेट के लिए फिर से स्थापित किया। इसके बाद जब उन्होंने टेस्ट में मध्यक्रम के बल्लेबाज़ के लिए अपनी तैयारियां की, तो किस्मत ने उन्हें फिर से सलामी बल्लेबाज़ के रूप में स्थापित होने का मौका दिया।

टेस्ट क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज़ के रूप में राहुल की वापसी शीर्ष पर सफल होने की उनकी क्षमता के बारे में नहीं है। यदि उनमें कौशल नहीं होता तो उनके नाम पांच टेस्ट शतक (इनमें से भी चार विदेशी जमीन पर) नहीं होते।

अगर ट्रेंट ब्रिज में 84 रनों की पारी ने दिखाया कि उन्हें नई गेंद के ख़िलाफ़ अपने कौशल पर भरोसा है, तो लॉर्ड्स में राहुल के शतक ने स्थापित किया कि वह कुछ अच्छा करने के लिए वापस आए हैं।

जब आप जानते हैं कि आप आक्रामक बल्लेबाज़ है, तो 100 गेंदों पर 18 रन बनाने के लिए बहुत धैर्य और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। राहुल ने वह सब दिखाया, जो कि वह कर सकते थे। राहुल गेंदों पर शॉट्स लगाने के लिए उत्सुक नहीं दिखें और बहुत सारी गेंदों को अकेले छोड़ कर खुश हुए। वह अपना समय बिताने और आगे बढ़ने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करने को तैयार दिखें।

ऐसा नहीं है कि छोटी-मोटी त्रुटियां उनकी बल्लेबाज़ी में कभी नहीं आएंगी या वह फिर कभी फ़ॉर्म से बाहर नहीं होंगे लेकिन उन्हें इस समय इस तरह से बल्लेबाज़ी करते हुए देखना बहुत खुशी की बात है। उनके लिए अगली चुनौती इस अच्छे फ़ॉर्म को अधिक से अधिक समय तक बरकरार रखना है।

भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज आकाश चोपड़ा तीन पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें से नवीनतम द इनसाइडर: डिकोडिंग द क्राफ्ट ऑफ क्रिकेट है। @cricketaakash