यह एक सूची है ऐसे खिलाड़ियों की जिन्होंने कोविड महामारी के विश्व भर में फैलने के बाद पुरुष क्रिकेट में घर से बाहर सबसे ज़्यादा अंतर्राष्ट्रीय मैच खेले हैं। टॉप के 10 नामों में आठ पाकिस्तानी हैं। शायद पाकिस्तान का विश्व क्रिकेट में पहले जैसा वर्चस्व नहीं रहा, लेकिन फिर भी इंग्लैंड ने अपने घर के पिछले छह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट समर में द्विपक्षीय मुक़ाबलों में पांच बार पाकिस्तान को आमंत्रित किया है। आईसीसी भी जब भी कोई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता के बारे में सूचित करना चाहता है तो प्रेस रिलीज़ में भारत बनाम पाकिस्तान का ज़िक्र होता है, चाहे आगामी मुक़ाबले की बात हो या पिछले मैच में तोड़े गए दर्शक संख्या का रिकॉर्ड।

तीन नाम ऐसे भी हैं - बाबर आज़म, शाहीन अफ़रीदी और मोहम्मद रिज़वान - जो मौजूदा फ़ॉर्म में किसी भी अंतर्राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बन सकते हैं। अगर मौक़ा मिलता तो उन्हें आईपीएल में भी ज़रूर शामिल किया जाता। यह ऐसे सुपरस्टार हैं जिन्हें देखने के लिए आप पैसे देने को राज़ी होंगे।

महामारी के पिछले 18 महीनों में इन खिलाड़ियों ने इंग्लैंड का दौरा दो बार किया है, न्यूज़ीलैंड का पूरा दौरा कर आए हैं, और साउथ अफ़्रीका, ज़िंबाबवे और वेस्टइंडीज़ में भी क्रिकेट खेल चुके हैं। दुनिया का कोई भी हिस्सा टूर करने से इस टीम ने असहजता नहीं दर्शाई। इसका उल्लेख ज़रूरी बन जाता है क्योंकि कोविड के ज़माने में हवाई जहाज़ में उड़ना, आइसोलेशन में वक़्त काटना आसान नहीं है। पिछले साल इंग्लैंड में 10 दिन, न्यूज़ीलैंड में 14 और इस वर्ष फिर से इंग्लैंड में 10 दिन - ऐसे कड़े क्वारंटीन में बीते जहां अक्सर आप अपने होटल का दरवाज़ा सिर्फ़ खाना उठाने के लिए ही खोल सकते थे। कुल मिलाकर इन खिलाड़ियों ने छह ऐसे दौरे किए हैं जहां बबल जीवन के चलते उन्हें कड़े नियमों का पालन करना पड़ा है।

इस दौरान उन्होंने कोई शिकायत नहीं की है। कुछ हद तक इसकी ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी संस्कृति पर भी है, जहां मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करना आम नहीं है। शान मसूद ने इस बारे में कुछ कहा ज़रूर था लेकिन अधिकतर खिलाड़ियों को शायद पता भी नहीं कि ऐसे जीवन का उनके मानसिकता पर क्या असर पड़ रहा है। पीसीबी दौरे पर रज़ामंदी ज़ाहिर करती है और फिर खिलाड़ी चुपचाप खेलने चले जाते हैं। इस मुल्क में खिलाड़ियों की बुलंद आवाज़ सुनने वाला कौन है? अगर आप कुछ कहने गए तो मानिए टीम में आपकी जगह गई।

इनमें कुछ खिलाड़ियों को कोविड संक्रमण भी हुआ है। फिर भी उन्होंने अपने शरीर को आराम नहीं दी। जहां उनकी ज़रुरत पड़ी, क्रिकेट किट उठाकर चल दिए। खिलाड़ियों को ज़रूर इसके पैसे मिले, लेकिन यह जहां-जहां गए उस जगह के बोर्ड ने भी मुनाफ़ा कमाया।

पिछले साल इंग्लैंड के समर सीज़न को इन्होंने बचाया। महामारी के चलते साउथ अफ़्रीका का दौरा सितंबर से स्थगित हुआ लेकिन वे छह महीने में अपना कर्त्तव्य निभा आए। और इंग्लैंड के साउथ अफ़्रीका दौरे को रद्द करने की भरपाईइंग्लैंड के साउथ अफ़्रीका दौरे को रद्द करने की भरपाई करने पाकिस्तान ने ख़ुद एक अतिरिक्त टी20 खेलने में कोई अड़चन नहीं डाला। पाकिस्तान ने फ़ुल मेंबर में सबसे नज़रअंदाज़ देश ज़िंबाब्वे में एक नहीं दो बार दौरा किया। अगर ईसीबी के पास मैदानों की कमी नहीं होती और अगर तालिबान की प्रशासनिक वापसी नहीं हुई होती तो पाकिस्तान आयरलैंड और अफ़ग़ानिस्तान के साथ भी खेल चुके होते।

यह कहने में अतिशोक्ति नहीं है कि विपरीत परिस्थितियों में पाकिस्तान ने क्रिकेट समुदाय के जीवित रहने में बड़ी भूमिका निभाई। इस नीति के पीछे कोई सदाचार या महानता नहीं था। पाकिस्तान ने उम्मीद क़ायम रखा था कि उनके परिश्रम के फलस्वरूप आख़िरकार पाकिस्तान में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट की वापसी के रूप में उनके घर न्यूज़ीलैंड, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ज़रूर आएंगे।

लेकिन इसके बदले में पाकिस्तान को क्या मिला? ईसीबी का दौरा रद्द करने के बाद उनका खेद? या कहें दुनिया के समक्ष अपमान? ना सिर्फ़ पीसीबी और पाकिस्तान के क्रिकेटप्रेमियों का अपमान, बल्कि बाबर, अफ़रीदी और उन जैसे खिलाड़ियों का अपमान। वहीं जिन्होंने महामारी के बीच, घर परिवार से हफ़्तों तक दूर रहते, कड़े आइसोलेशन नियमों के चलते, डांट फटकार खाते हुए, अपनी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को निरंतर जोखिम में डाला। इस पूरे बलिदान का अपमान। इस क़िस्से से यह भी साफ़ है कि 2014 में 'बिग थ्री' गुट की असली ग़लती थी अपने प्लान को काग़ज़ पर डालने की। क्रिकेट जगत के नई समीकरण के तहत उसे चलाना आधिकारिक बनाए बिना ही किया जा सकता था।

उदाहरण के तौर पर क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के हालिया व्यवहार को देखते हैं। मान लेते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की मेज़बानी ना करने के पीछे उनके दिए गए कारण ठीक हैं। लेकिन महामारी के बाद उन्होंने क्या-क्या किया है उसमें एक पैटर्न नज़र आता है। पहले वो ऑस्ट्रेलिया गए और फिर उन्होंने टी20 विश्व कप की संभावित मेज़बानी की जगह भारत को घर बुलाया। उन्होंने महामारी के डर का वास्ता देकर साउथ अफ़्रीका जाने से इंकार ज़रूर किया लेकिन महामारी के दूसरे लहर से झूझ रहे भारत में आईपीएल खेलने से अपने खिलाड़ियों को नहीं रोका।

इंग्लैंड ने पाकिस्तान और बांग्लादेश के दौरे रद्द कर दिए लेकिन एक ही वर्ष में भारत के साथ उन्होंने आठ टेस्ट खेलें हैं और नौवां ना खेले जाने पर अफ़सोस जताया। ऐशेज़ खेलने के लिए इंग्लैंड महामारी रोकने की प्रचंड व्यवस्था, खिलाड़ियों की नाराज़गी और सेकंड-स्ट्रिंग टीम खिलाने की ज़रुरत को भी बाधा नहीं मान रहा।

बिग थ्री को औपचारिक रूप में 2017 में हटा दिया गया था लेकिन तब सेऑस्ट्रेलिया के आधे मैच इंग्लैंड और भारत के ख़िलाफ़ रहे हैं। इंग्लैंड की एक-तिहाई मैच बाक़ी दोनों देशों के विरुद्ध हुए हैं और भारत के 35 प्रतिशत मैच ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ रहे हैं।

हैरानी की बात है कि पाकिस्तान को एक ऐसे बिग थ्री बोर्ड ने ठुकराया है जो अगले साल आईसीसी के किसी प्रतियोगिता को हटाकर और द्विपक्षीय क्रिकेट खेलने के बेताब है। याद रहे कि एक आईसीसी प्रतियोगिता फ़ुल मेंबर देशों को बिग थ्री बोर्ड के मुक़ाबले अधिक पैसा गारंटी करती है। आख़िर जब बिग थ्री बोर्ड द्विपक्षीय मुक़ाबलों की बात करते हैं तो उनका मलतब होता है और बिग थ्री देशों के साथ मैच।

बाबर, अफ़रीदी और पाकिस्तान को याद कराया गया है कि पहले से विभाजित अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट महामारी के चलते कितना और टूट चूका है। शायद यही बात अब पीसीबी अध्यक्ष रमीज़ राजा भी समझ चुके हैं; मंगलवार को उनके अगले कदम पर उन्होंने कहा, "सच पूछिए तो दौरा रद्द होने का कोई सही जवाब नहीं हो सकता।" पाकिस्तान को अब इन दौरों के रद्द होने से उत्पन्न नुक़सान को झेलना ही होगा। जैसा वरिष्ठ पत्रकार गिजन हेग अक्सर कहते हैं, आईसीसी अब एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी से बढ़कर कुछ नहीं, तो उनके दरवाज़े पर जाकर भी क्या ही फ़ायदा। क्रिकेट के रखवाले अब वही हैं जिन्होंने पाकिस्तान क्रिकेट का अपमान किया है।

उस्मान समिउद्दीन ESPNcricinfo में सीनियर एडिटर हैं, अनुवाद ESPNcricinfo में सीनियर असिस्टेंट एडिटर और स्थानीय भाषा प्रमुख देबायन सेन ने किया है।