यह जून 2017 की बात है। इंग्लैंड में चैंपियंस ट्रॉफ़ी की बस शुरुआती दिन थे और एजबैस्टन में आमने-सामने थे चिर प्रतिद्वंदी भारत और पाकिस्तान। एक ऐसा मुक़ाबला जिसके टिकट यदि 10 बार बिकते तो भी स्टेडियम हाउस फ़ुल ही रहता।

ठीक उसी वक़्त लंदन में एक हादसा हुआ जिसमें एक गाड़ी को जान बूझकर लंदन ब्रिज पर पदयात्रीयों पर चढ़ा दिया गया और 11 लोगों की मौत हुई और 48 और घायल हुए।अगले दिन लंदन से लगभग 180 किलोमीटर दूर बर्मिंघम में मैच का आयोजन नहीं रुका। पूरे टूर्नामेंट को अधिक सुरक्षा कवच के बीच ख़त्म किया गया। सुरक्षा के मामले में ख़तरों के बीच क्रिकेट के आयोजन की सराहना हुई।

लेकिन क्या लंदन में खेल का ना रुकना कहीं लाहौर में ऐसा होने से ज़्यादा क़ीमती है? सोमवार को इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) का पाकिस्तान दौरे से इनकार एक बार फिर कुछ ऐसी तस्वीर सामने लाती है। क्रिकेट जगत में दोहरे मापदंड हैं जिनसे कुछ देशों को नापा जाता है।

आपको बता दें न्यूज़ीलैंड के अपने दौरे को रद्द करने के फ़ैसले के बावजूद यूनाइटेड किंगडम के विदेश मंत्रालय से पाकिस्तान में यात्रा करने के सलाह में कोई बदलाव नहीं घोषित हुई है। ईएसपीएनक्रिकइंफ़ो के पास यह जानकारी भी है कि ईसीबी के अपने सुरक्षा सलाहकार ईएसआई के परामर्श में कोई नई जानकारी नहीं है। हाल ही में शाही परिवार के सदस्य भी पाकिस्तान का दौरा कर आए हैं। समझ लीजिए कि इस दौरे के रद्द होने में कोई भी सुरक्षा जानकारी से जुड़े सलाह का हाथ नहीं था और ईसीबी ने भी अपने बयान में स्वीकारा कि उन्हें अपने खिलाड़ियों की मानसिक स्थिति की अधिक चिंता थी।

शायद यह सोच सही भी है। लेकिन पाकिस्तान का यह दौरा महज़ चार दिनों का था। एक दिन के क्वारंटीन के बाद दो मैच लगातार दिनों में आयोजित होने थे। यूएई में आईपीएल खेलने के बाद घर लौटने पर क्वारंटीन की अवधी इस पूरे दौरे से दो दिन ज़्यादा होती है।

ऐसा समझा जा रहा है कि पकिस्तान ने दोनों मैच लाहौर में बंद दरवाज़ों के पीछे खेले जाने का प्रस्ताव रखा था। क्या इंग्लैंड 14 खिलाड़ियों को चार दिन के लिए नहीं भेज सकता था?

यह वही पाकिस्तान है जिसने 2020 में इंग्लैंड की मदद करने से पहले दोबारा नहीं सोचा था। उस वक़्त कोविड का प्रकोप इंग्लैंड में पाकिस्तान से कहीं ज़्यादा था। दौरे से पहले उन्हें 10 दिन का क्वारंटीन बर्मिंघम में चार-सितारा होटल के जगह डर्बी में एक साधारण लॉज में बिताना पड़ा था। वैक्सीन के इजात से महीनों पहले पाकिस्तान ने इंग्लैंड में सात हफ़्ते बिताए ताक़ि ईसीबी, और उनके नीचे के खिलाड़ी और अधिकारी, घर का चूल्हा जलाते रहें।

उधर पिछले 18 महीनों में इंग्लैंड ने श्रीलंका, साउथ अफ़्रीका, पाकिस्तान और बांग्लादेश के दौरों को रद्द किया है। ऐशेज़ पर भी चर्चा चल रही है। अपने पर आने में ईसीबी ब्रॉडकास्ट अधिकार के पैसों का तर्क देने में माहिर है लेकिन औरों के साथ लेन-देन के मामले में इंग्लैंड सिर्फ़ लेते हुए ही दिखते हैं।

आईपीएल को भी कैसे भुलाया जाए? पाकिस्तान ना जाने का मतलब इंग्लैंड के खिलाड़ी अब उस टूर्नामेंट में नॉकआउट मैचों के लिए उपलब्ध होंगे। शायद यह संयोग हो, लेकिन मैनचेस्टर टेस्ट रद्द होने से भी आईपीएल का ही फ़ायदा हुआ था।

इस पूरी कड़ी का कपट सबसे ज़्यादा उत्तेजना पहुंचाता है। 2005 ऐशेज़ से पूर्व लंदन में कई जगह विस्फोट के चलते 50 से अधिक लोग मारे गए थे। शहर में तीन दिन बाद ऑस्ट्रेलिया ने वनडे मैच खेला था।सोमवार को भी लेस्टर में वनडे खेलने वाली न्यूज़ीलैंड महिला टीम के ख़िलाफ़ धमकी की ख़बर थी, लेकिन मेहमान टीम के पहली फ़्लाइट पर घर लौटने की जगह इस धमकी को अविश्वसनीय कहा गया।

अब बात करते हैं उस व्यक्ति की जिसने तीन बार मैदान का उल्लंघन करके सुरक्षाकर्मियों का मज़ाक़ उड़ाया। एक बार तो उसने खिलाड़ियों के साथ शारीरिक संपर्क भी किया। क्या होता अगर उसके पास कोई हथियार रहता? अगर इंग्लैंड दुनिया के किसी भी कोने में खेल रहा होता और ऐसा होता तो सोचिए प्रतिक्रिया कैसी रहती?

वैसे इतिहास में इंग्लैंड ने भी विदेशी दौरों पर संवेदनशीलता दिखाई है। 1985 और 2008-09 में भारत में और 2016 में बांग्लादेश में वह नाज़ुक स्थितियों में मेज़बान टीम के साथ खड़े रहे। लेकिन क्या इस इंग्लैंड टीम में वैसी परिपक्वता है? या ऐसा तो नहीं की ईसीबी को अपने स्वार्थ के आगे दूसरों की तक़लीफ़ नज़र आना बंद हो गई है?

ऐसे फ़ैसले के परिणाम तो होंगे ही। पाकिस्तान क्रिकेट का घाटा तो है ही, अब पाकिस्तान सोचेगा कि इंग्लैंड क्रिकेट के साथ उनके रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा। सिर्फ़ पाकिस्तान ही नहीं, ईसीबी के और दोस्त भी उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगेंगे। इंग्लैंड ने 2005 के बाद पाकिस्तान का दौरा नहीं किया है और यह दो मैच 2020 में पाकिस्तान के उदारता पर उन्हें धन्यवाद कहने का मौक़ा भी था। इस दौरे से दोस्ती और गहरी हो सकती थी।

लेकिन अब इसने साफ़ कर दिया है कि क्रिकेट में असमानता अभी भी मज़बूत है। पैसों और संसाधन के धनी बोर्ड और उनके खिलाड़ी खेल के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझते हैं। और कुछ देशों में कपट और पाखंड की कोई कमी नहीं।

हालिया महीनों में ईसीबी ने खेल में विविधता और समावेश लाने पर कई बार ज़ोर डाला है। लेकिन जब इसकी मिसाल क़ायम करने की बात आई तो वो ख़ुद इससे मुकर गए।

यह सिर्फ़ पाकिस्तान के लिए एक बुरा दिन नहीं है। कहीं न कहीं इंग्लैंड और उसके समर्थक भी ईसीबी से शर्मसार हैं।

जॉर्ज डोबेल ESPNcricinfo के सीनियर संवाददाता हैं। अनुवाद ESPNcricinfo में सीनियर असिस्टेंट एडिटर और स्थानीय भाषा प्रमुख देबायन सेन ने किया है