जब टीवी कॉमेंटेटर और प्रशंसक अंपायरों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने लगते हैं, तो आप जानते हैं कि इस दिन पारी की घोषणा होनी है। दर्शकों के लिए यह एक कठिन दिन होता है लेकिन शीर्ष स्तर पर खेला जाने वाला कोई भी खेल पहले एक प्रतिस्पर्धा है और बाद में मनोरंजन। यह मनोरंजन है क्योंकि इसमें प्रतिस्पर्धा है।

तो भारत बढ़त लेने के बाद दोबारा बल्लेबाज़ी करने का निर्णय लेता है। वह मेहमान टीम को वापसी करने का कोई मौक़ा नहीं देना चाहता है और साथ ही इस पिच पर आख़िरी गेंदबाज़ी करने का अवसर गंवाना नहीं चाहता है। वह न्यूज़ीलैंड को फ़ॉलो-ऑन दे सकता था और अब तक तो यह टेस्ट मैच ख़त्म भी हो जाता लेकिन उन्हें मैच जल्दी समाप्त करके जाना कहां है। साउथ अफ़्रीका दौरे के लिए वह संभवतः इसी बायो-बबल में कैद रहेंगे तो क्यों ना उस अतिरिक्त दिन की बल्लेबाज़ी का फ़ायदा उठाया जाए?

इसके अलावा कुछ भारतीय बल्लेबाज़ों को क्रीज़ पर समय बिताने का मौक़ा मिलता। और तो और तीसरे दिन के खेल के बाद अक्षर पटेल ने बताया कि अपनी दूसरी पारी में टीम का विचार यह था कि हम इस तरह से बल्लेबाज़ी करें जैसे हम एक मुश्किल पिच पर चौथी पारी में लक्ष्य का पीछा कर रहे हैं।

यह देखने में आकर्षक नहीं है, ख़ासकर तब जब विपक्ष के पास इन परिस्थितियों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए गेंदबाज़ नहीं हैं। दोनों टेस्ट में न्यूज़ीलैंड द्वारा खिलाए गए चार विशेषज्ञ गेंदबाज़ों में से एक, विल समरविल, पूरी सीरीज़ में एक भी विकेट नहीं चटका पाए। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में केवल सात गेंदबाज़ों ने एक सीरीज़ में बिना कोई विकेट लिए उनसे अधिक रन ख़र्च किए।

ऐसी परिस्थितियों में रनों की तलाश कर रहे खिलाड़ियों के अलावा दर्शकों को बांधे रखना मुश्किल हो जाता है। तो अंपायरों को बलि का बकरा बना दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि कोरोना महामारी से पहले उनकी आलोचना नहीं होती थी। लेकिन अब यह ज़्यादा होने लगा है क्योंकि अधिकारी महामारी के दौरान न्यूट्रल अंपायरों को बुलाना ठीक समझते और घरेलू अंपायरों को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह पेशेवर अंपायरों की तौहीन है जिनका मूल्यांकन पेशेवर तरीक़े से ही किया जाता है। ऐसे में यह सोचना भी हास्यस्पद है कि कोई अंपायर अपने करियर को दांव पर लगाकर किसी एक टीम की तरफ़दारी करेगा जब मैदान पर इतने सारे कैमरें लगे रहते हैं।

अगर तरफ़दारी हो भी रही है तो वह इस तरह के बेतुके मुद्दे उठाने वालों को दिखेगी नहीं। तरफ़दारी खेल के संचालन में हो सकती है कि अंपायर किसी को कितना स्लेज (उकसाने) करने देते हैं, किसे अपने व्यवहार के लिए तोका जाता है, वह गीले मैदान पर कितनी देर तक किसी एक टीम को खेलने देते हैं आदि। यहां तक कि ख़राब रोशनी भी इस सूची में नहीं आती क्योंकि उसे लाइट-मीटर के साथ मापा जाता है। इधर-उधर की छोटी-मोटी बातों के अलावा इस विषय पर भी कोई सवाल नहीं है।

दुर्भाग्य से, पूर्व क्रिकेटर, जो अपने दौर में अंपायरों के साथ तू-तू-मैं-मैं करते रहते थे, आज उनकी निंदा करने में सबसे आगे हैं। उदाहरण के लिए, शेन वॉर्न ने इस टेस्ट के दौरान पहली पारी में विराट कोहली के पगबाधा फ़ैसले का एक छोटा वीडियो चुना और उन्हें नॉट आउट करार दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि अंपायर अकसर तकनीक की व्याख्या करने में ग़लती कर देते हैं। उन्होंने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि शायद उस फ़ैसले में गेंद पहले पैड पर लगी हो या फिर एक साथ बल्ले और पैड के साथ उसका संपर्क हुआ हो। थर्ड अंपायर ने देखा कि कोहली का बल्ला उनके पैड से थोड़ा पीछे था इसलिए उन्हें बाहर जाना पड़ा। वहीं दूसरी पारी में वैसी ही एक अपील के दौरान जब उनका बल्ला पैड से बस एक या दो इंच आगे था, अंपायर ने तुरंत उन्हें नॉट आउट दिया।

मज़ेदार बात तो यह है कि ये वही लोग है जो ज़मीन के क़रीबी कैच के मामले में तकनीक पर भरोसा नहीं करते। वह क्या है ना कि तकनीक ने टेस्ट क्रिकेट नहीं खेला है और जिन्होंने खेला है, वे जानते हैं कि सबूत हो या ना हो, ऐसे लो कैच हमेशा आउट ही होते हैं। देखते ही देखते अनगिनत मीडिया संगठन वॉर्न के शब्दों को अपनी कॉपी में छाप देते हैं और अंपायरों को अपना पक्ष रखने का मौक़ा ही नहीं मिलता।

इन सबके बीच अगर कोई अंपायर अपना पक्ष रखता भी है तो वह टिकता नहीं है। अब कुमार धर्मसेना को ही ले लीजिए जो आईसीसी के 'अंपायर ऑफ़ द इयर' भी रह चुके हैं। उन्होंने 2019 विश्व कप फ़ाइनल में हुई चूक पर स्पष्टिकरण दिया तो उनकी बात समझने के बजाय उनका मज़ाक उड़ाया गया कि इतने उच्च-स्तरीय अंपायर को खेल के नियम तक याद नहीं है।

धर्मसेना के समझाने के बाद भी यह जानना लगभग असंभव है कि जब गेंद 60 गज़ की दूरी से फेंकी गई तब रन के लिए दौड़ रहे दोनों बल्लेबाज़ एक-दूसरे से कितना दूर थे। लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि थर्ड अंपायर की मदद क्यों नहीं ली गई लेकिन उन्हें इस बात का पता ही नहीं था कि अंपायर केवल बाउंड्री और विकेटों की जांच करने के लिए ही तीसरे अंपायर की मदद ले सकते हैं। क्रिकेट के नियम बनाने वाली एमसीसी ने बाद में उस नियम को ठीक किया और यह उसकी ख़ामियों को साफ़ दर्शाता है।

इससे यह भी पता चलता है कि हम अंपायरों और उनके काम को कितना नज़रअंदाज़ करते हैं। यही कारण है कि टेस्ट क्रिकेट के एक सुस्त दिन पर बात ख़राब फ़ैसलों की हो रही थी, वह भी तब जब इस सीरीज़ में उन्होंने इतनी ग़लतियां की भी नहीं है। वह कभी-कभी बल्ले के बाहरी या अंदरूनी किनारे से हुए संपर्क को देखने से चूक जाएंगे लेकिन यह उन्हें एक ख़राब अंपायर नहीं बनाता है। और तो और हमारे पास उनकी ग़लतियों को ठीक करने के लिए रिव्यू भी तो उपलब्ध हैं।

कुछ ऐसे नतीजे हैं जो चिंता का विषय बन सकते है, ख़ासकर तब जब गेंद का विकेटों के बीच पैड पर लगना और फिर स्टंप्स से जा टकराना असंभव है। यदि आप ऐसे मौक़ों पर ग़लती करते हैं तो फिर संकेत है कि आपका फ़ैसला अपील की ताक़त से प्रभावित हो रहा है। इस पूरी सीरीज़ में केवल एक ही ऐसा फ़ैसला याद आता हैं जब कानपुर टेस्ट की दूसरी पारी में आर अश्विन की गेंद पर विल यंग को पगबाधा करार दिया गया था। ऑफ़ स्टंप के बाहर से घुमाव के साथ अंदर आकर गेंद उनके फ़्रंटफ़ुट पर लगी थी। टेस्ट क्रिकेट में इस तरह की गेंद पर पगबाधा बहुत कम लोग होते है लेकिन इस गेंद के कम उछाल ने सभी को चकमा दिया। यहां तक कि बल्लेबाज़ को जिन्होंने अंपायर के फ़ैसले को निर्धारित समय में रिव्यू नहीं किया।

इस टेस्ट में कुछ ऐसे भी क़रीबी मामले रहे हैं जहां अंपायरों से ग़लती हुई है और टीमों ने उस फ़ैसले पर अपील तक नहीं की। वह इसलिए कि पेशेवर खिलाड़ियों और अंपायरों के अनुसार वह आउट नहीं था लेकिन उच्च-स्तरीय कैमरों ने दिखाया कि गेंद पहले पैड पर लगी थी या फिर बल्ले के बाहरी किनारे से उसका संपर्क नहीं हुआ था। अब इस बात को लेकर अंपायरों पर उंगली उठाना अनुचित है।

अंपायरिंग के प्रवचन में कई सारी चीज़ें ग़लत हैं, लेकिन एक सुस्त दिन पर आप ख़ुद को याद दिला सकते हैं कि अंपायर कितने अच्छे हैं। साथ ही हम खिलाड़ियों की तरह ख़राब फ़ैसले लेने पर अंपायरों को भी सहानुभूति दे सकते हैं।

सिद्धार्थ मोंगा ESPNcricinfo में असिस्टेंट एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर अफ़्ज़ल जिवानी ने किया है।