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रजत व राहुल और उनकी जुदा शैली

पाटीदार ने अपनी पारी के हर 2.8 गेंद पर एक चौका या छक्का जड़ा

कोई-कोई दिन आपका होता है, जब आप माटी को भी छूते हो तो वह सोना हो जाता है। बुधवार का दिन रजत पाटीदार के लिए कुछ वैसा ही था। उन्हें इसका आभास तभी हो गया होगा, जब उन्होंने तीसरी गेंद पर दुश्मांता चमीरा पर बॉउंड्री लगाया।
चमीरा ने उन्हें ऑफ़ स्टंप की लाइन में तेज़ और गुड लेंथ गेंद डाली थी जिसे पाटीदार ने बैकवर्ड प्वाइंट की तरफ़ पंच कर दिया। गेंद एक टप्पा खाती हुई फ़ील्डर के दाएं हाथ के ऊपर से चली गई। कवर प्वाइंट पर खड़े फ़ील्डर ने गेंद को चेज़ ज़रूर किया लेकिन वह भी गेंद को रोक पाने में नाकाम रहे। यह एक विशुद्ध टाइमिंग वाला शॉट था, जिसमें फ़ुटवर्क और फ़ॉलो थ्रू मायने नहीं रखते थे। जिस तरह का दिन पाटीदार के पास था, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आप को बस खड़े रहने और गेंद को देखने की ज़रूरत है और इसके बाद सब कुछ छोड़ देना ही मुनासिब है।
जब ज़रूरत हुई उनके पैर चले, जिस वजह से उन्होंने लेग स्टंप के बाहर जा कर लो फ़ुल टॉस गेंद को एक हाथ से ही कवर के ऊपर से खेला, वहीं राउंड द विकेट एंगल से यॉर्कर को शॉर्ट फ़ाइन लेग की भी दिशा दिखाई। इतना ही नहीं छोटी गेंदें जो उन्हें रूम न देने के इरादे फेंकी गई थीं उन्हें भी पाटीदार ने बैकफुट पर जाकर लांग लेग के ऊपर से छक्के के लिए हुक कर दिया। पाटीदार के पैर ज़रूरत पड़ने पर चले, लेकिन तभी जब इसकी बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी। पाटीदार की पारी में स्थिरता साफ़ तौर पर झलक रही थी, एक ऐसी स्थिरता जो इस बात का संकेत देती है कि बल्लेबाज़ के पास शॉट को खेलने के लिए अतिरिक्त समय है।
केएल राहुल उन्हीं कुछ धन्य लोगों में से एक हैं, जिनके पास अतिरिक्त समय है। लखनऊ सुपर जायंट्स की पारी के छठे ओवर में उन्होंने मोहम्मद सिराज की गेंदों पर पुल के ज़रिए एक जोड़ी छक्का लगाया, जिसने संकेत दिया कि उनके पास गेंद पर प्रतिक्रिया करने के लिए स्प्लिट-सेकंड के बजाय मिनट थे। जैसे पाटीदार ने रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर की पारी के दौरान बार-बार किया था, राहुल बस स्थिर रहे और गेंद को अपनी उपस्थिति से बाहर भेजते रहे।
जब वह इस तरह के शॉट खेलते हैं तो राहुल कुछ भी करने में सक्षम दिखते हैं। यह ऐसा है जैसे वह पहले से जानते हों कि गेंदबाज़ क्या गेंदबाज़ी करेगा। राहुल इन शॉट्स को इतना आसान बनाते हैं कि आपको आश्चर्य होने लगता है कि उनके बीच के अंतराल को इतनी सावधानी से क्यों बिताया जाता है, जो कि डीप के क्षेत्ररक्षकों के लिए टहलते हुए सिंगल्स से भरा होता है। और जब आप 208 रनों का पीछा कर रहे थे, तब और भी अधिक आश्चर्य होता है।
पाटीदार की पारी के दौरान ऐसी कोई खामी नहीं थी। उन्होंने हर 2.8 गेंदों में एक चौका या छक्का लगाया और अगर वह एक ओवर में जल्दी चौका मारते, तो यह गेंदबाज़ पर बिना किसी इरादे के अधिक दबाव डालने का एक प्रस्ताव था। उस पारी को ध्यान में रखते हुए राहुल के बल्लेबाज़ी करते समय तुलना करना स्वाभाविक था। मिसाल के तौर पर, पाटीदार ने अपनी 49वीं गेंद पर अपना शतक पूरा किया और राहुल ने 49वीं गेंद पर छक्का लगाकर 58 रन से 64 रन के निजी स्कोर पर पहुंचे। हालांकि यहां एक गौर करने वाली बात है। पाटीदार उस दिन एक पारी खेल रहे थे, जब सब कुछ उनके हिसाब से चल रहा था। उन्होंने गेंद को एक सपने की तरह टाइम किया और दुर्लभ मौकों पर जब उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो भाग्य उन पर मुस्कुराया।
पाटीदार 34 गेंद पर 59 रन पर थे, जब कुणाल पांड्या की गेंद पर शॉर्ट थर्ड मैन पर खड़े मोहसिन ख़ान ने उनका कैच टपका दिया। उन्होंने अगली गेंद पर स्लॉग स्वीप करने का प्रयास किया और गेंद उनके अंदरूनी किनारे से टकरा गई और लेग स्टंप से एक इंच छूट गई। फिर, जब वह 40 गेंद पर 72 रन पर थे, तो उन्होंने रवि बिश्नोई की गेंद को गलत तरीके से मारा और दीपक हुड्डा डीप मिडविकेट पर एक सिटर पर चूक गए।
वहीं पाटीदार की टीम पहले बल्लेबाज़ी कर रही थी. राहुल की टीम पीछा कर रही थी। राहुल 54 गेंदों में 112 रनों का पीछा नहीं कर रहे थे, लखनऊ 208 का पीछा कर रही थी।
मध्य ओवरों में राहुल के रूढ़िवादी दृष्टिकोण की अक्सर आलोचना होती है - इसमें से बहुत कुछ उचित है - जब उनकी टीम पहले बल्लेबाज़ी करती है लेकिन यह वैसी पारी नहीं थी। पावरप्ले के तुरंत बाद सात ओवर की अवधि थी, जिस दौरान राहुल ने सिर्फ़ एक चौका मारा, लेकिन यह कम से कम आंशिक रूप से वास्तव में अच्छी रक्षात्मक गेंदबाज़ी के लिए था, खासकर हर्षल पटेल की गेंदों के लिए, जिन्होंने किसी अन्य गेंदबाज़ की तुलना में अपने कटर से बड़े शॉट्स पर लगाम लगाई।
पाटीदार ने अपने हर दुस्साहसी भरे शॉट में अपने विकेट को जोखिम में डाला, लेकिन जब शॉट बल्ले से बाहर आए तब वह इतने जोखिम भरे प्रतीत नहीं हो रहे थे क्योंकि पूरी टाइमिंग के साथ गेंदों को खेल रहे थे और किस्मत उन पर बारंबार मेहरबान दिख रही थी।
राहुल ने जो जोखिम उठाया, वह था अपना विकेट खोने के जोखिम को कम करना और मैच के अंतिम ओवरों में अपने और अपने सहयोगियों को बैक करना। उन्होंने हारने का जोखिम उठाया, जब वह तेज़ रन बना सकते थे। वह 16 गेंदों पर 28 रन बनाकर आउट होकर प्रशंसा भी अर्जित कर सकते थे भले ही उनकी टीम बड़े अंतर से हार जाती। 208 के रन चेज़ में 58 गेंदों में 79 रनों की पारी के मुक़ाबले 16 गेंदों में 28 रनों की पारी अधिक उपयोगी होती है, यह दलील उचित प्रतीत होती है।
18 गेंदों में 41 रनों की दरकार थी, दो ओवरों में अब 33 रन बनाने थे। हेज़लवुड द्वारा कुछ वाइड फेंके जाने के बाद 9 गेंदों में अब लखनऊ को जीतने के लिए 28 रन बनाने थे कि तभी राहुल वाइड यॉर्कर की अपेक्षा करते हुए ऑफ़ स्टंप की तरफ़ शफ़ल हुए और हेज़लवुड ने एक लो फ़ुल टॉस कर दी। राहुल ने लैप शॉट लगाया लेकिन गेंद शॉर्ट फ़ाइन लेग के फ़ील्डर के हाथों में चली गई। कुछ ऐसे दिन भी होते हैं जब सब कुछ आपके पक्ष में जाता है, लेकिन कुछ दिन वैसे भी होते हैं जब सब कुछ आपके पक्ष में नहीं जाता। राहुल ने गेंद पर बहुत हद तक अच्छे ढंग से टाइम किया, शॉट में पावर भी पर्याप्त था लेकिन वह गेंद को उतनी एलिवेशन नहीं दिला पाए जितनी ज़रूरत थी ताकि गेंद शॉर्ट फ़ाइन लेग को क्लियर कर सके।
मैच के बाद राहुल ने कहा, "हां, पीछे देखने पर मुझे भी यह लगता है कि मध्य ओवरों में दो बड़े शॉट्स की हमें दरकार थी और चीज़ें हमारे पक्ष में घूम सकती थीं। हालांकि ऐसा नहीं था कि हम बड़े शॉट्स के लिए नहीं जा रहे थे लेकिन उन्होंने उम्दा गेंदबाज़ी की। मेरे ख़याल से मध्य ओवरों में हर्षल के दो ओवरों ने हमें थोड़ा पीछे खींच लिया। उन्होंने शायद उन दो ओवरों में महज़ सात या आठ रन ही दिए। उन्होंने रूम नहीं दिया, फ़ील्ड के मुताबिक गेंदबाज़ी की और इसी दौरान हम हल्का पिछड़ गए।"

कार्तिक कृष्णास्वामी ESPNcricinfo में सीनियर सब एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी में एडिटोरियल फ़्रीलांसर नवनीत झा ने किया है।