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बल्लेबाज़ को किन परिस्थितियों में कौन सा गार्ड लेना चाहिए?

किसी भी बल्लेबाज़ का गार्ड उनके परंपरागत खेल और खेल की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप फ़ाइनल के दौरान शुभमन गिल क्रीज़ से बहुत आगे आकर बल्लेबाज़ी कर रहे थे  •  Alex Davidson/Getty Images

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप फ़ाइनल के दौरान शुभमन गिल क्रीज़ से बहुत आगे आकर बल्लेबाज़ी कर रहे थे  •  Alex Davidson/Getty Images

क्रिकेट में गेंदबाज़ खेल की शुरुआत गेंद फेंककर करते हैं और बल्लेबाज़ उस पर प्रतिक्रिया देते है। इस प्रक्रिया में बल्लेबाज़ द्वारा गार्ड लेना भी बल्लेबाज़ी की तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो यह स्थापित करता है कि बल्लेबाज़ उस गेंद का सामना कैसे करने जा रहा है।
गार्ड लेने का शाब्दिक अर्थ यह है कि बल्लेबाज़ स्टंप के सापेक्ष कहां खड़ा होना चाहता है। बल्लेबाज़ पिच पर पहुंच कर सबसे पहले गार्ड ही लेता है, जो कि 'रणयुद्ध' की तैयारी के लिए कवच पहनने के समान है।
किसी भी बल्लेबाज़ के लिए सही गार्ड क्या है और गार्ड चुनने के क्या-क्या विकल्प होते हैं? आप लेग स्टंप गार्ड, मिडिल-लेग स्टंप गार्ड या ऑफ-स्टंप गार्ड ले सकते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में बहुत सारे बल्लेबाज़ या तो लेग-स्टंप या फिर मिडिल-लेग गार्ड लेना पसंद करते हैं। दुनिया के इस हिस्से में उछाल हमेशा कम होता है और बल्लेबाज़ों के एलबीडब्ल्यू या बोल्ड होने की संभावना सबसे अधिक होती है। इसलिए यहां पर बल्लेबाज़ लेग स्टंप पर खड़े होकर सामने वाले पैर को गेंद के रास्ते से बाहर रख बल्ले को मुक्त रूप से गेंद तक जाने देते हैं।
लेग-स्टंप पर गार्ड लेने से एक फायदा यह भी है कि उनके लिए ऑफ़ साइड में रन बनाने का मौका और खुल जाता है। वहीं, जो खिलाड़ी एशिया की तुलना में अधिक उछाल वाली पिचों पर खेलते हैं, वे अक्सर मिडिल स्टंप पर गार्ड लेते हैं। इन पिचों पर अतिरिक्त उछाल के कारण एलबीडब्ल्यू विकेट कम होते हैं, जबकि विकेट के पीछे कैच होने की संभावना अधिक होती है। इसलिए आप ऐसी सतहों पर गेंद की लाइन से अधिक दूर नहीं रहना चाहते हैं। जो बल्लेबाज़ पिच के दोनों ओर रन बनाना पसंद करते हैं, वे भी अक्सर मिडिल स्टंप गार्ड लेते हैं।
ऐसा बहुत कम ही होता है कि कोई बल्लेबाज़ ऑफ़ स्टंप पर गार्ड ले, क्योंकि इससे उनके स्टंप के सामने प्लम्ब (एलबीडब्ल्यू) होने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन जब आप ऐसी बॉलिंग का मुक़ाबला करते हैं, जो ऑफ़ स्टंप के लाइन से भी बहुत दूर गेंदबाज़ी करती है, तब ऑफ़ स्टंप गार्ड लेना बहुत फायदेमंद होता है।
मान लीजिए, जब आप एक ऑफ़ स्पिनर के ख़िलाफ़ एक रैंक टर्नर पिच पर खेल रहे हो और आप उन पर आक्रामक रुख अपनाना चाहते हैं, तो आप ऑफ़ स्टंप गार्ड लेते हैं। ठीक इसी तरह से जब एक बाएं हाथ के बल्लेबाज़ को दाएं हाथ का तेज़ गेंदबाज़ राउंड द विकेट से विकेट से दूर गेंदबाज़ी करता है तब भी बल्लेबाज़ ऑफ़ स्टंप गार्ड लेते हैं। फिर भी, सामान्य परिस्थितियों में कोई भी बल्लेबाज़ आमतौर पर ऑफ़ स्टंप गार्ड लेना पसंद नहीं करता है।
हालांकि विभिन्न बल्लेबाज़ों की गार्ड लेने की आदत इस बात पर निर्भर करती है कि वे किस स्टाइल में बल्लेबाज़ी करते हैं और उन्होंने अपने शुरुआती जीवन का क्रिकेट कहां खेला हैं, लेकिन कई बार मैच की परिस्थितियों के अनुसार बल्लेबाज़ अपने नियमित गार्ड में परिवर्तन भी करते हैं।
अगर बल्लेबाज़ एक्रॉस द विकेट जाकर खेलना पसंद करता है तो वह तेज़ी से रन बनाने के लिए ऑफ़ स्टंप पर गार्ड ले सकता है। वहीं अगर बल्लेबाज़ अधिकतर सामने की दिशा में शॉट खेलता है, तो वह ऑफ़ स्टंप गार्ड को छोड़कर कोई भी विकल्प चुन सकता है।
मैंने पहले कहा था कि गेंदबाज़ कार्रवाई शुरू करते हैं और बल्लेबाज उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन कई बार बल्लेबाज़ गेंदबाज़ों की रणनीति को प्रभावित करने के लिए भी गार्ड बदलते रहते हैं। कुछ बल्लेबाज़ क्रीज़ पर या क्रीज़ के भीतर खड़े होने की बजाए अक्सर एक-दो फुट बाहर खड़े होते हैं, ताकि स्विंग को कम किया जा सके और गेंदबाज़, गेंद के लेंथ को भी थोड़ा शार्ट रखे। गेंद जितनी देर हवा में रहती है, उसके स्विंग होने की संभावना भी उतनी ही अधिक होती है।
हम देखते हैं कि विराट कोहली नियमित रूप से ऐसा करते हैं। वह क्रीज़ के बाहर खड़े होकर सामने का पैर आगे निकालकर गेंद की स्विंग को ख़त्म करने का प्रयास करते हैं। इससे स्विंग गेंदबाज़ भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर हो जाते है।
विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल के दौरान शुभमन गिल दूसरे दिन के पहले सत्र में क्रीज़ से एक कदम बाहर निकलकर खेल रहे थे। हालांकि वह आगे बढ़कर या डाउन द ग्राउंड आकर कोई आक्रामक शॉट नहीं खेल रहे थे बल्कि वह गेंद को शरीर के करीब लाकर उसे सीधे बैट से डिफेंड कर रहे थे।
ऐसे समय पर गेंदबाज़ भी बल्लेबाज़ के करीब ही गेंदबाज़ी करते हैं। विरले ही ऐसे गेंदबाज होते हैं जो ऐसे मौकों पर ऑफ़ स्टंप के बाहर लगातार गेंदबाज़ी करें। कई बार अपेक्षित लाइन-लेंथ ना मिलने पर इस ढंग से बल्लेबाज़ी करते वक़्त भी आपका नियंत्रण छूट जाता है और आप बाहरी किनारा लगा बैठते हैं। गेंदबाज़ इसी ताक में लगातार शरीर के करीब ही गेंदबाज़ी करते हैं।
इस रणनीति में भी कुछ खामियां हैं। गतिशील शरीर का अर्थ है कि आपका सर भी गति करता है, जिसके कारण आप कई बार गेंद की लाइन को मिस कर सकते हैं। इसके अलावा, आप अपने बैकफ़ुट खेल से भी समझौता करते हैं।

भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा (@cricketaakash) तीन किताबों के लेखक भी हैं। उनके नवीनतम किताब का नाम 'द इनसाइडर: डिकोडिंग द क्राफ्ट ऑफ़ क्रिकेट' है। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर दया सागर (@dayasagar95) ने किया है।