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रणनीति, चयन और गेंदबाज़ी की नाकामी ने भारत को पीछे ढकेल दिया

इस टीम में टैलेंट की कमी नहीं, लेकिन ये तय नहीं कि टेस्ट मैच जीतने का तरीक़ा क्या है

यह पहली बार है जब भारत ने एशिया और वेस्टइंडीज़ के बाहर 500 रन से ज़्यादा रन दिए हैं - वो भी पूरे एक दशक बाद। अगर आप भारत के फ़ैन हैं, तो "आंखों में आंसू" वाला इमोजी लगा सकते हैं। इन दस सालों में भारत ने इन विदेशी पिचों पर कभी 500 रन नहीं दिए - जबकि उसके पहले के 10 सालों में 16 बार ऐसा हुआ था, जिसमें से दो बार इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के डरावने दौरे भी शामिल हैं।
हालांकि पिछले दशक की पिचें अलग थीं और ये भारत का पहला "बैज़बॉल" दौरा है, लेकिन यह बदलाव दर्शाता है कि भारत ने टेस्ट क्रिकेट को किस तरह खेला। पहले घरेलू पिचों पर बेहतरीन स्पिनर थे, फिर 2018 से विदेशी दौरे पर तेज़, फ़िट और अनुभवी फ़ास्ट बॉलर।
अब भारत एक बदलाव के दौर में है और उनका प्रमुख गेंदबाज़ हर टेस्ट नहीं खेल पा रहा। संकेत पहले से थे, लेकिन ओल्ड ट्रैफ़र्ड में तीसरे दिन वो सब कुछ खुलकर सामने आ गया।
2014 के इंग्लैंड दौरे के बाद पहली बार किसी भारतीय तेज़ गेंदबाज़ की शुरुआत इतनी फीकी रही है - जब पंकज सिंह ने 0/179 के आंकड़े के साथ गेंदबाज़ी की थी। उसके दो साल पहले विनय कुमार ने WACA में 1/73 दिए थे। उसके बाद से डेब्यू मैच खेलने वाले खिलाड़ी आमतौर पर तैयार दिखे।
लेकिन अंशुल कम्बोज का मामला उलझा हुआ है। वह अपने करियर के पीक पर हैं। उन्होंने हर ज़रूरी पड़ाव पार किया है। हरियाणा के कोच और चयनकर्ता मानते रहे कि वो टेस्ट क्रिकेट के लिए बने हैं। IPL में उन्हें एमएस धोनी और आर अश्विन का समर्थन मिला। फिर भारतीय चयनकर्ता और टीम मैनेजमेंट ने भी भरोसा जताया।
जब कम्बोज ने सुबह पहला स्पेल डाला, भारत को उम्मीद थी कि अब असली कम्बोज दिखेगा, वही जिसने सबका ध्यान खींचा था। उस समय जो रूट और ओली पोप बुमराह और सिराज की शुरुआती चुनौती झेल चुके थे। अगर कम्बोज और शार्दुल ठाकुर की दूसरी शाम जैसी गेंदबाज़ी दोहराई जाती, तो भारत टेस्ट से बाहर हो सकता था। दोपहर के क़रीब यह आख़िरी मौक़ा था जब भारत मुक़ाबले में बना रह सकता था। लेकिन तीसरे दिन कम्बोज की रफ़्तार और गिर गई। वह औसतन 125.34 किमी/प्रति घंटा की दर से गेंदबाज़ी कर रहे थे। जबकि दूसरे दिन यह रफ़्तार 128.26 थी। यह पिछले 10 सालों की सबसे चौंकाने वाली चयन में से एक है, क्योंकि वह कई खिलाड़ियों को पछाड़कर सीधा प्लेइंग XI में आए और नई गेंद भी थामी।
गेंदबाज़ी कोच मॉर्ने मोर्कल भी हैरान थे कि IPL में जहां कम्बोज ने 55% गेंदें 135kmph से ऊपर डाली थीं, वहीं यहां वह 134.58kmph से ऊपर नहीं जा सके। मोर्कल ने माना कि कम्बोज इंडिया A के मैचों और नेट्स में तेज़ गेंदबाज़ी करते हुए दिखे थे।
अगर हम मान भी लें कि पिच धीमी थी, या पहले मैच का नर्वसनेस था, तब भी रफ़्तार में गिरावट आना अजीब है। मोर्कल ने साफ़ किया कि कम्बोज पूरी तरह फिट हैं, और बोले, "अगर वो फ़िट नहीं होते तो खेलते ही नहीं। मैं भी चाहता हूं कि मुझे इसका जवाब पता होता ताकि उसे बता पाता कि तेज़ कैसे गेंदबाज़ी करे। लेकिन नेट्स में वो ठीक लग रहे थे और फिर हमने वही तय किया जो पहले बात हुई थी। अब रफ़्तार क्यों नहीं आ रही, इस पर हम काम कर रहे हैं।"
सिर्फ़ कम्बोज को दोष देना नाइंसाफ़ी होगी। ये टीम अक्सर इस तरह के फ़ैसलों में फंसी रहती है। बर्मिंघम में मिली जीत भी दो गेंदबाज़ों के असाधारण प्रदर्शन की वजह से आई थी और ऐसा हर बार नहीं हो सकता। ओवरहेड कंडीशन देखकर ठाकुर को खिलाया लेकिन फिर उन्हें गेंदबाज़ी नहीं कराई। टीम में टैलेंट है, लेकिन उन्हें प्रयोग करने का सटीक तरीक़ा कहां है ?
बुमराह पहले टेस्ट में 42.7% गेंदें 140kmph से ऊपर डाल रहे थे, दूसरे में 22.3% और अब ओल्ड ट्रैफ़र्ड में सिर्फ़ 0.5%। वह अब भी भी असरदार हैं, लेकिन कम गति वह वजह हो सकती है, जिसके कारण उन्होंने अपने लाइन लेंथ को तलाशने के लिए अतिरिक्त प्रयास किया। गेंदबाज़ी आक्रमण ने वो आत्मविश्वास नहीं दिखाया जो पिछले दशक में उनकी ताक़त था - अच्छी लाइन, निरंतर दबाव । यही वो समय था जब कुलदीप यादव जैसे कलाई स्पिनर काम आ सकते थे। लेकिन वो ड्रिंक्स सर्व कर रहे थे।
टीम ने ज़रूरत से ज़्यादा कवर करने की कोशिश की और अपने किसी चीज़ पर भरोसा नहीं दिखाया - न बल्लेबाज़ी पर, न गेंदबाज़ी पर। अब सीरीज़ बचाने की ज़िम्मेदारी उसी बल्लेबाज़ी गहराई पर है, जिस पर टीम ने दांव लगाया था।