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मुंबई टेस्ट में मयंक ने स्पिन खेलने का मास्टर क्लास दिखाया

कठिन परिस्थितियों में मयंक ने दोनों पारियों में शानदार बल्लेबाज़ी की

कहा जाता है कि वापसी, डेब्यू से भी अधिक कठिन होता है। डेब्यू में जहां नए खिलाड़ी से ज़्यादा कुछ अपेक्षा नहीं होती, वहीं वापसी करने वाले खिलाड़ी पर अच्छा करने का दबाव होता है। ऐसे समय में आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि आपसे क्या ग़लती हुई कि आप टीम से बाहर हुए। वहीं आपको अच्छे प्रदर्शन का दबाव भी नहीं लेना चाहिए। हालांकि ऐसा कहना आसान है, करना मुश्किल होता है।
न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ वापसी करते हुए मयंक अग्रवाल ने भी यही सब सोचा होगा। पहले रोहित शर्मा और फिर केएल राहुल इस सीरीज़ के लिए अनुपलब्ध हुए। इसी वजह से उन्हें वापसी का मौक़ा मिल पाया। मुंबई टेस्ट में न्यूज़ीलैंड के तेज़ गेंदबाज़ों के ख़िलाफ़ मयंक ने सधी हुई शुरुआत की। वह अपने पैरों की मूवमेंट और शॉट सेलेक्शन में बहुत निश्चयी दिख रहे थे।
वहीं जब स्पिनर आए, तो उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ खेला दिखाना चालू किया। वह स्पिन के सबसे अच्छे भारतीय खिलाड़ियों में से एक हैं। स्पिन के ख़िलाफ़ उनका डिफ़ेंस और आक्रमण दोनों मज़बूत है। फ़ुल गेंद आने पर वह फ़्रंटफ़ुट का जबरदस्त प्रयोग करते हैं, जबकि छोटी गेंद आने पर वह पिच में गहरे अंदर तक चले जाते हैं। ज़रूरत पड़ने पर वह आगे भी निकलते हैं और गेंद को गेंदबाज़ के सिर के ऊपर से बॉउंड्री पार भेजने में कोई संकोच नहीं करते हैं।
इस दौरान वह अपने भार को हमेशा आगे रखते हैं, जो कि स्पिन खेलने की सबसे आदर्श तकनीक है। अगर वह आगे भी बढ़ते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा ही हवाई शॉट खेलेंगे, उनके पास डिफ़ेंड करने या फिर सिंगल निकालने के भी विकल्प होते हैं।
वह जब आगे निकलते हैं तो थोड़ा सा झुके भी होते हैं ताकि उनका भार हमेशा आगे की ही तरफ़ रहे। अधिकतर बल्लेबाज़ जब आगे निकलते हैं तो उनकी हमेशा से सोच बड़ा शॉट खेलने की होती है। ऐसे समय में जब गेंद थोड़ी दूर रह जाती है तो वे चकमा खा जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे झुकते नहीं हैं और उनका भार पीछे ही होता है।
हालांकि यह सिर्फ़ तकनीक की बात नहीं है, यह आत्मविश्वास और इरादे की भी बात है। अगर आपका डिफ़ेंस कमज़ोर है तो आप हर मिले मौक़ों पर आक्रमण करने की सोचते हैं। लेकिन अगर आपको कमज़ोर गेंदें नहीं मिलती है तो आप अधीर हो जाते हैं और आड़े-तिरछे शॉट खेलने लगते हैं। आप गेंद का लाइन-लेंथ पढ़ने के बिना ही ख़ुद से आक्रामक शॉट बनाने की कोशिश करने लगते हैं।
यहां पर मयंक आपसे अलग हैं क्योंकि वह लगातार घंटों तक रक्षात्मक खेल दिखा सकते हैं। गेंद को डिफ़ेंड करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, इसलिए उनके पास वह छूट होती है कि वह कमज़ोर गेंदों का इंतजार करें और फिर उस पर ही आक्रमण करे।
इसके अलावा मयंक उन जगहों पर शॉट खेलते हैं, जहां पर टेस्ट क्रिकेट में क्षेत्ररक्षक ना के बराबर ही लगाए जाते हैं। टेस्ट क्रिकेट में यह ज़रूरी है कि अगर गेंद पूरी तरह से टाइम भी नहीं हुई हो फिर भी वह बॉउंड्री के लिए जाए क्योंकि अधिकतर समय बल्लेबाज़ के लिए फ़ील्ड खुला होता है।
जिस तरह से बाएं हाथ के स्पिनर के ख़िलाफ़ वह कवर के ऊपर से इनसाइड आउट और ऑफ स्पिनर के ख़िलाफ़ मिड ऑफ़ के ऊपर से सीधा शॉट लगाते हैं, वह दर्शनीय होता है। टेस्ट क्रिकेट में इन दोनों जगहों पर अमूमन कोई क्षेत्ररक्षक नहीं होता है और अगर वहां कोई क्षेत्ररक्षक होता है तो फिर मयंक को आसानी से सिंगल निकालने का मौक़ा मिल जाता है। मुंबई में ऐसा ही हुआ और फिर मयंक को अपनी पारी बड़ी करने में मदद मिली।
जहां वह पैरों का प्रयोग करके हवाई शॉट खेलते हैं, वहीं क्रीज़ के भीतर जाकर छोटी गेंदों को भी सज़ा देने से भी वह नहीं चूकते। ऐसे समय में अगर गेंद फुल भी होती है तो वह स्वीप शॉट भी लगाने की क्षमता रखते हैं।
संक्षेप में कहें तो मयंक के पास वह सब कुछ है, जो उन्हें अच्छा स्पिन खिलाड़ी बनने की क्षमता देता है। यही वजह है कि घर पर उनका रिकॉर्ड इतना बेहतरीन है। अगर वह तेज़ गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़ भी अपनी तकनीक में सुधार करते हैं तो वह भारत के लिए हर परिस्थितियों में एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकते हैं। स्पिन के ख़िलाफ़ तकनीक उनकी इतनी अच्छी है कि अगर शीर्ष क्रम में जगह नहीं हो तो उन्हें मध्यक्रम में भी आजमाया जा सकता है।

आकाश चोपड़ा पूर्व क्रिकेटर और क्रिकेट स्तंभकार हैं, अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के दया सागर ने किया है