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गौतम गंभीर और भारत को टेस्ट क्रिकेट के बदलाव के दौर में दीर्घकालिक सोच अपनानी होगी

हालिया टेस्ट सीरीज़ में मिली हार से भारत के कोच पर दबाव बढ़ा है, लेकिन सफ़ेद गेंद की क्रिकेट में टीम की कामयाबी उन्हें भरोसा दे सकती है

टेम्बा बवूमा
30-Jan-2026 • 1 hr ago
Gautam Gambhir smiles, Australia vs India, 5th T20I, Brisbane, November 8, 2025

एक टीम, एक कोच। खिलाड़ी चाहते हैं कि अलग-अलग फ़ॉर्मैट में उन्हें एक जैसी भाषा और सोच का सामना करना पड़े  •  Ayush Kumar/ICC/Getty Images

दिसंबर में भारत के ख़िलाफ़ हमारी वनडे और T20I सीरीज़ में मिली हार ने एक बात साफ़ कर दी है कि सफ़ेद गेंद की क्रिकेट में टीम इंडिया आज भी एक अलग ही लेवल पर खेल रही है।
वनडे फ़ॉर्मैट में आपने देखा कि विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दो धुरंधर खिलाड़ियों की मौजूदगी में भारत कितना ख़तरनाक नज़र आता है। हालांकि टेस्ट क्रिकेट की तस्वीर इससे बिल्कुल जुदा थी, क्योंकि वहां ये दोनों दिग्गज चयन के लिए उपलब्ध नहीं थे। लाल गेंद की क्रिकेट को देखें तो भारतीय टीम साफ़ तौर पर बदलाव के एक मुश्किल दौर से गुज़र रही है। अगर मैं सात साल पुरानी 2019 की अपनी प्रोटियाज़ टेस्ट टीम को याद करूं, तो हमने भी ठीक ऐसा ही मंज़र देखा था। उस वक़्त हमारी टीम के भी कई बड़े स्तंभ एक साथ हट गए थे। लिहाज़ा टेस्ट क्रिकेट में भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, उसमें कुछ भी हैरान करने वाला नहीं है।
भारत के मुख्य कोच गौतम गंभीर इस समय भारी दबाव के साये में हैं। मेरा मानना है कि उन्हें इस स्थिति को सहजता से लेना होगा और हर चुनौती का सामना उसी वक़्त करना होगा जब वह सामने आए। टेस्ट क्रिकेट में अपनी रणनीति को पुख़्ता करने के लिए उन्हें थोड़े वक़्त की ज़रूरत है, और सफ़ेद गेंद की क्रिकेट में टीम को मिल रही लगातार जीत उन्हें यह समय दिलाने में ढाल का काम कर सकती है।
सीमित ओवरों की क्रिकेट में भारत के पास टैलेंट की कोई कमी नहीं है, उनके पास चयन के लिए विकल्पों का अंबार लगा है। 2026 का T20 विश्व कप भी उनके लिए बड़ा मौक़ा है, क्योंकि फ़रवरी-मार्च में होने वाला यह टूर्नामेंट भारत और श्रीलंका की मेज़बानी में घरेलू मैदानों पर ही खेला जाएगा। वनडे क्रिकेट में विराट कोहली और रोहित शर्मा का अनुभव और नेतृत्व टीम को मजबूती देता रहेगा, जिससे प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी उन पर ज़्यादा होगी। इसीलिए मुझे लगता है कि गंभीर की कोच की कुर्सी फिलहाल सुरक्षित है, हालांकि लाल गेंद की क्रिकेट में इस भारतीय टीम की राह आगे काफ़ी मुश्किल नज़र आ रही है।
कुछ लोगों का यह मानना हो सकता है कि गंभीर को केवल व्हाइट बॉल क्रिकेट तक सीमित रहना चाहिए और टेस्ट टीम की कमान किसी और को सौंप देनी चाहिए। अलग-अलग फ़ॉर्मैट के लिए अलग-अलग कोच रखने का यह प्रयोग हमने 2023 में अपने प्रोटियाज़ सेटअप में करके देखा था।
उस समय इस बंटवारे के पीछे तर्क था। लेकिन अब सभी फ़ॉर्मैट में एक ही कोच होना खिलाड़ियों के लिए निरंतरता के लिहाज़ से कहीं बेहतर काम करता है। इसके अलावा यह सोच और खेलने की शैली के लिहाज़ से भी फ़ायदेमंद है। मुझे नहीं लगता कि अब ज़्यादा टीमें इस तरह की अलग अलग फ़ॉर्मैट वाली कोचिंग व्यवस्था के साथ जा रही हैं और सच कहूं तो मैं भी इसके पक्ष में नहीं हूं। यह खिलाड़ियों को उलझन में डाल देता है, क्योंकि एक फ़ॉर्मैट में एक तरह की भाषा और संदेश होता है और फिर कुछ ही हफ्तों बाद दूसरे फ़ॉर्मैट में आपको खुद को ढालना पड़ता है। गंभीर का करार 2027 के वनडे विश्व कप तक है और भारत को बस उन पर भरोसा बनाए रखना चाहिए।
मुझे नहीं लगता कि BCCI के सूट पहने अधिकारियों ने उन्हें कोच इस उम्मीद के साथ बनाया है कि वे छह महीने में ही सफल हो जाएंगे। वे चाहते हैं कि गंभीर दो से चार साल की अवधि में टीम को सफल बनाएं। इस दौरान हर चीज़ हमेशा सही नहीं चलने वाली। यहां सोच को लंबे समय पर केंद्रित रखना ज़रूरी है।
घरेलू क्रिकेट से खिलाड़ियों के लिए मौके आएंगे और टेस्ट टीम में कुछ जगहें अब भी खाली हैं। ऐसे में जो खिलाड़ी इस समय टीम में हैं, उनके सामने चुनौती यह है कि वे अपनी जगह पक्की करें। टीम के कुछ सीनियर खिलाड़ियों को शायद एक दो साल तक टीम का भार उठाना पड़ेगा, जब तक कम अनुभव वाले खिलाड़ी खुद को स्थापित नहीं कर लेते।
भारत के टेस्ट कप्तान शुभमन गिल को हमारे ख़िलाफ़ कोलकाता में खेले गए पहले टेस्ट के दौरान गर्दन में चोट लगी थी, जिसकी वजह से वह गुवाहाटी में हुए दूसरे टेस्ट से बाहर हो गए। अब पीछे मुड़कर देखें तो साफ़ है कि गिल जैसे सीनियर खिलाड़ी की ग़ैर-मौजूदगी का हमें भरपूर फ़ायदा मिला। बल्लेबाज़ी में उनके अनुभव की कमी टीम इंडिया को खली और यह हमारे पक्ष में गया। भारत को ऋषभ पंत की कप्तानी में उतरना पड़ा और नंबर चार पर भी एक नया बल्लेबाज़ था। अब जबकि गिल चोट से वापसी कर रहे हैं, तो मुझे लगता है कि मुक़ाबला बराबरी का होगा और भारत के लिए हालात उतने बुरे नहीं हैं। बदलाव के ऐसे दौर में टीम का धैर्य बनाए रखना सबसे ज़्यादा अहम है।
2019 में हमारी प्रोटियाज़ टीम भी ठीक इसी मंझधार में थी। तब हमें मीडिया और फ़ैंस की तीखी आलोचना झेलनी पड़ी और कुछ खिलाड़ियों का करियर तो वहीं थम गया। यह वक़्त कभी आसान नहीं होता, लेकिन टीम के पुनर्गठन की प्रक्रिया का यह एक ज़रूरी हिस्सा है।
गौतम गंभीर जिस तरह से इस टेस्ट टीम को लीड कर रहे हैं, उसे देखते हुए मेरा मानना है कि उन्हें साफ़ कर देना चाहिए कि आने वाले विदेशी दौरे मुश्किलों भरे होंगे, लेकिन नज़रें लंबे लक्ष्य पर होनी चाहिए। उन्हें अपने खिलाड़ियों की पीठ थपथपानी होगी और एक वक़्त ऐसा आएगा जब इन खिलाड़ियों को भी अपने कोच के भरोसे का मान रखते हुए मैदान पर प्रदर्शन करना होगा।