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गांगुली-शाह जोड़ी की क़िस्मत का फ़ैसला बुधवार को हो सकता है

बोर्ड प्रमुख तौर पर इसके पदाधिकारियों के लिए अनिवार्य कूलिंग-ऑफ़ अवधि में संशोधन चाहता है

बुधवार को हो सकता है गांगुली और शाह के भविष्‍य पर फैसला  •  AFP

बुधवार को हो सकता है गांगुली और शाह के भविष्‍य पर फैसला  •  AFP

अपने संविधान में कई संशोधनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई की याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है, जिससे 2018 में आरएम लोढ़ा समिति की कई सिफ़ारिशों को कोर्ट द्वारा स्‍वीकृति देने के बाद कई सुधार देखने को मिल सकते हैं।
दो जजों डीवाई चंद्रचूड़ और हिमा कोहली की बेंच ने बीसीसीआई के कानूनी सलाहकार तुषार मेहता को सुना, जिनके साथ न्‍याय मित्र मनिंदर सिंह भी रहे। मेहता भारत के प्रधान पब्लिक प्रोसेक्यूटर भी हैं। कोर्ट ने मूल वादी क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बिहार को भी सुना, जिसने 2014 में 2013 के आईपीएल भ्रष्टाचार घोटाले के ख़‍िलाफ़ एक याचिका दायर की थी, जिसके कारण अंततः बीसीसीआई संविधान में बदलाव आया।
बिना एक दिन के फ़ैसले के संकेत देते हुए कोर्ट ने कहा कि बुधवार दोपहर को सुनवाई फिर से शुरू करेगी।
मंगलवार को दो सालों में यह पहला मौक़ा था जब कोर्ट बीसीसीआई की याचिका को सुन रहा था, यह याचिका अप्रैल 2020 में दायर की गई थी और हाल ही में कोर्ट पर इसको जल्‍द सुनने को लेकर दबाव बनाया गया था क्‍योंकि बीसीसीआई के वार्षिक चुनाव सितंबर के अंत में होने हैं।
बीसीसीआई ने जिन प्रमुख सुधारों की समीक्षा करने के लिए कोर्ट से कहा है, उनमें इसके पदाधिकारियों के लिए अनिवार्य कूलिंग-ऑफ़ अवधि, पद धारण करने के लिए अयोग्यता मानदंड को संशोधित करना, बोर्ड सचिव को अभूतपूर्व अधिकार देना और अगर भविष्‍य में बीसीसीआई अपने संविधान में कोई संसोधन करना चाहता है तो उसमें कोर्ट को अपनी बात कहने से रोकना शामिल है।
2018 में लागू हुए बीसीसीआई के संविधान के अनुसार कोई भी पदाधिकारी या प्रशासक को छह साल लगातार दो बार पद पर रहने के बाद तीन साल के कूलिंग ऑफ़ पीरियड पर जाना होगा, फ‍िर चाहे यह राज्‍य संघ में हो या बीसीसीआई या दोनों को मिलाकर। कूलिंग ऑफ़ पीरियड के दौरान वह इंसान ख़ुद ब ख़ुद चुनाव लड़ने या किसी पद पर बने रहने के अयोग्‍य हो जाएगा।
2018 में कोर्ट ने कूलिंग ऑफ़ अवधि के मानदंड में ढील दी थी, जैसा कि मूल रूप से लोढ़ा समिति की सिफ़ारिशों में कहा गया था। लोढ़ा समिति की सिफ़ारिशों के अनुसार एक प्रशासक या पदाधिकारी को बीसीसीआई या राज्य संघ में तीन साल का एक कार्यकाल पूरा करने के बाद तीन साल का ब्रेक लेना होगा। हालांकि, कोर्ट ने उस खंड को बदल दिया, जिसमें एक पदाधिकारी या प्रशासक को राज्य संघ या बीसीसीआई, या दोनों के संयोजन में लगातार दो कार्यकाल (छह वर्ष) अलग-अलग सेवा देने की अनुमति दी गई थी, जबकि एक स्थान (राज्य या बोर्ड) में अधिकतम नौ साल का कार्यकाल बरकरार रखा गया था।
संयोग से, 2018 का कोर्ट का फै़सला न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ द्वारा पारित किया गया था, जिन्होंने कहा था, "एक व्यक्ति को लगातार छह साल तक एक पदाधिकारी के रूप में कार्य करने की अनुमति देना अनुभव और ज्ञान के लिए पर्याप्त रूप से लंबी अवधि है, जो खेल के हित में जाएगा और इससे सत्ता का एकाधिकार नहीं होगा। कूलिंग ऑफ़ पीरियड पर जज चंद्रचूड़ ने कहा, कूलिंग-ऑफ़ अवधि आवश्यक थी क्योंकि व्‍यक्तिगत हितों के ख़‍िलाफ़ एक सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करेगा, साथ ही अधिक प्रशासकों को लाभ प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करके जिससे, कुछ हाथों में शक्ति की एकाग्रता पर विराम लग सकेगा।
जज चंद्रचूड़ ने अपने फ़ैसले में लिखा था, "कूलिंग ऑफ को कुछ व्यक्तियों को क्रिकेट के प्रशासन को एक निजी मैदान मानने के साधन को रोकने का मानते हुए स्‍वीकार किया जाना चाहिए। खेल क्रिकेट के सज्‍जन वर्गों के बिना बेहतर होगा।"
2019 अक्‍तूबर को बीसीसीआई के नए प्रशासक चुने गए थे, जहां सौरव गांगुली को अध्‍यक्ष, जय शाह को सचिव, अरूण धूमल को कोषाध्‍यक्ष और जयेश जॉर्ज को संयुक्‍त सचिव चुना गया था। पद पर चुने जाने के दो महीने भी नहीं हुए थे कि गांगुली प्रशासन कूलिंग ऑफ़ पीरियड के ख़‍िलाफ़ कोर्ट चला गया था, वे चाहते थे कि कूलिंग ऑफ़ पीरियर किसी सदस्‍य के एक ही स्‍थान पर लगातार छह साल तक पद संभालने के बाद आना चाहिए ना कि राज्‍य संघ या बीसीसीआई या दोनों को मिलाकर। अभी के संविधान के मुताबिक पदाधिकारी अगर राज्‍य संघ या बीसीसीआई या इन दोनों को मिलाकर छह साल का कार्यकाल पूरा करता है तो वह कूलिंग ऑफ़ पीरियड पर जाएगा।
मौजूदा समय में उपाध्‍यक्ष राजीव शुक्‍ला सहित पांच बीसीसीआई पदाधिकारियों ने छह साल पूरे कर लिए हैं, जहां वे बीसीसीआई के पदाधिकारी बनने से पहले अपने राज्‍य संघ में अहम पद संभाल चुके हैं। गांगुली का कूलिंग ऑफ़ पीरियड जुलाई 2020 के बाद से शुरू हो गया है, वह 2014 में बंगाल क्रिकेट संघ के सचिव बने थे जबकि 2015 में वह अध्‍यक्ष बने और सितंंबर 2019 में उन्‍हें दोबारा अध्‍यक्ष चुना गया लेकिन इसके बाद वह बीसीसीआई में अध्‍यक्ष बने। शाह 2014 में गुजरात क्रिकेट संघ के संयुक्‍त सचिव बने थे। कुछ अंदरूनी रिकॉर्ड बताते हैं कि उनका यह कार्यकाल आठ सितंबर 2013 से शुरू हुआ था। यानि सितंबर 2013 से अक्‍तूबर 2019 में बीसीसीआई सचिव बनने से पहले उन्‍होंने पांच साल अपने पूरे कर लिए थे। जबकि अगले महीने वह बीसीसीआई में भी तीन साल पूरे गए लेंगे, यानि के पूरे आठ साल। वहीं शुक्‍ला सांसद होने की वजह से बीसीसीआई पदाधिकारी बनने के अयोग्‍य हैं, क्‍योंकि बोर्ड के संविधान के मुताबिक कोई नेता पदाधिकारी नहीं हो सकता है।
बीसीसीआई से हर कोई सहमत नहीं है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के सदस्‍य सुब्रमण्‍यम स्‍वामी भी शामिल हैं। भारतीय कानून की बार एंड बेंच वेबसाइट के मुताबिक स्‍वामी ने भी बीसीसीआई को सामने रखते हुए एक याचिका दायर की है, जिसमें कहा गया है कि बीसीसीआई ने यह याचिका कूलिंग ऑफ़ पीरियड को तबाह करने के लिए डाली है। इससे एक बार फ‍िर कुछ व्‍यक्तिगत हितों के पास में पावर आ जाएगी और इससे 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की अवहेलना होगा।

नागराज गोलापुड़ी ESPNcricinfo में न्‍यूज एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी में सीनियर सब एडिटर निखिल शर्मा ने किया है।