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मोंगा : जब भारतीय टीम को अपने कप्तान का साथ चाहिए था तो कोहली सबसे आगे खड़े हुए

शमी को ख़राब गेंदबाज़ी नहीं बल्कि अल्पसंख्यक होने की वजह से अपशब्द कहे गए थे और यह मानने की ज़रूरत थी "नहीं, मैं इसके बारे में थोड़ा और विस्तार से बताऊंगा।"

विराट कोहली ने सोशल मीडिया नफ़रत पर अपना सामान्य ग़ुस्सा व्यक्त किया, क्योंकि भारतीय टीम में उनके साथी एक अल्पसंख्यक समुदाय से भारतीय क्रिकेटर पर सोशल मीडिया पर अपमानजनक प्रतिक्रिया दी गई। कोहली को उस सामान्य प्रतिक्रिया की भी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि बीसीसीआई के मीडिया अधिकारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत सभी को याद दिलाते हुए कहा था, "हम केवल क्रिकेट की योग्यता पर ही सवाल उठाएंगे।"
जब मीडिया मैनेजर ने दूसरे सवाल को ख़ारिज करने की कोशिश की, तो कोहली इस बात को समझ चुके थे कि यह सवाल विशेष रूप से शमी के धर्म पर केंद्रित था। इसके बाद यह भारतीय क्रिकेट में सबसे महत्वपूर्ण बयानों में से बन गया। एक कप्तान न केवल अपनी टीम के साथी के साथ खड़ा रहा, बल्कि उसके लिए खड़ा रहा, जिन्होंने उसके साथी पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते हुए अपशब्द कहे। उन्होंने इसे दयनीय कहा, रीढ़वीहिन कहा।
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत के मैच और इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच के सप्ताह में कई क्रिकेट हस्तियां, यहां तक कि वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर, शमी के समर्थन में सामने आए। यह उन सभी के इरादों पर संदेह करने के लिए नहीं है। कुछ वास्तव में भोले हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने जो कहा वह अच्छे से ज़्यादा नुकसान कर सकता है।
उन सभी ने कहा है कि उन्हें मोहम्मद शमी पर कितना गर्व है, वह कितने प्रतिबद्ध और विश्व स्तरीय गेंदबाज़ हैं, कैसे सिर्फ़ एक दिन ख़राब होने के लिए उन्हें अपशब्द नहीं कहे जाने देने चाहिए थे। यह ऐसा था जैसे जनता पर सभी क्रिकेट हस्तियों की नज़र थी और उन्हें लगा कि प्रतिक्रिया करने की जरूरत है और जल्दी से इसे "एक दिन की अति-प्रतिक्रिया" बोलकर आगे निकल गए।
युवराज सिंह ऐसे ही ट्वीट करने वाले क्रिकेटरों में से एक हैं। उन्होंने कहा, "एक बुरा दिन आपको एक खिलाड़ी के रूप में परिभाषित नहीं कर सकता।" वैसे उन्हें पता होना चाहिए 2014 टी20 वर्ल्ड कप फ़ाइनल में उनका ख़ुद का दिन ख़राब रहा और इसके लिए उन्हें काफ़ी अपशब्दों का सामना करना पड़ा।
हालांकि किसी ने युवराज को देशद्रोही नहीं कहा। उन्हें किसी ने नहीं कहा कि वह सीमा पार पंजाब वापस चला जाए या कोई खालिस्तान बना दे या कनाडा चला जाए। अगर आप किसान हैं और युवराज के समर्थन में हैं तो आपके पास सारे हक़ हैं, लेकिन ध्यान देना है कि 2014 में युवराज को धर्म के आधार पर अपशब्द नहीं कहे गए थे।
क्रिकेट समुदाय के लिए यह स्वीकार करना और बार-बार दोहराना महत्वपूर्ण है कि शमी को मुस्लिम होने के कारण गाली दी गई थी, न कि छुट्टी के दिन के लिए। अक्सर ऐसी घटनाओं का वर्णन करने में संकोच करने की प्रवृत्ति होती है, जो केवल अपराधियों को ही सशक्त बनाती है। शमी को मिली गालियों को उनके प्रदर्शन से जोड़कर, आप इसे लगभग किसी तरह की वैधता प्रदान करते हैं। लगभग मानो कुछ उत्साही क्रिकेट प्रेमी पुराने दौर के क्रिकेट को भुल चुके हों।
यह अभी भी इस साल की शुरुआत से बेहतर है जब भारत की महिला हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया के घर को जातिवादी दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा था। उस समय भारतीय महिला हॉकी टीम ओलंपिक में एक मैच हार गई थी। अपराधियों ने पटाखे फोड़े। देखिए विडंबना? उत्तराखंड में कटारिया के उनके घर के बाहर अर्जेंटीना से भारत की हार का जश्न मनाया। उनके परिवार को बताया कि ऐसा तब होता है जब उनकी जाति के लोग राष्ट्रीय टीम में आते हैं।
घटना के आसपास की रिपोर्टिंग में यह भी उल्लेख नहीं किया गया था कि कटारिया कौन से परिवेश से हैं, इन कट्टरपंथियों के अनुसार उनके समुदाय के लिए कौन सा नीच पेशा है और भारत में जातिगत भेदभाव क्यों हैं। अपनी कप्तान रानी रामपाल के अलावा, शमी के साथ दुर्व्यवहार होने पर क्रिकेट समुदाय में बोला ही कौन। जब तक हम राष्ट्रीय शर्म का सामना नहीं करते, हम इसे खत्म करने की उम्मीद नहीं कर सकते। जब तक हम उस शर्म को साझा नहीं करते, पीड़ित व्यक्ति ही पीड़ित होता है। इसलिए यह जरूरी था कि एक ऐसा कप्तान जिसका हर शब्द जनता के बीच में हो, वह उसे स्पष्ट रूप से बताए। सुरक्षित शर्तों के आसपास कोई सुनी सुनाई बातों की जिसमें जगह नहीं हो।
कोहली इसे अपने सोशल मीडिया पर जल्दी कह सकते थे, वह शमी की उपलब्धियों को सूचीबद्ध भी कर सकते थे लेकिन एक शानदार गेंदबाज़ के लिए प्रेस वार्ता में बोलना भी सही नहीं था, क्योंकि शमी ने किसी से कम प्रदर्शन नहीं किया है, लेकिन उन्होंने जो कहा है वह अभी भी महत्वपूर्ण है। हम चाहते हैं कि क्रिकेटर अधिक मुखर हों और जो कुछ भी सही हो, उसे बनाए रखें, लेकिन वास्तविक दुनिया में वे एकाधिकार काम करते हैं, लेकिन आज के समय में कोहली के इस बयान से उनकी छवि लोकप्रियता से बाहर भी हो सकती है। हम इतना भी कह कर इस बात की पूरी तरह से सराहना नहीं कर सकते हैं कि ये क्रिकेटर क्या हार गए हैं और वह भी तभी जब उनके इतने करीबी को निशाना बनाया गया हो।
कोहली जहां कप्तान हैं, उस बोर्ड में सचिव के पिता भारत के गृह मंत्री हैं। यहां तक कि बोर्ड अध्यक्ष, जिन्हें राष्ट्रीय टीम के कप्तान के रूप में बांटने के अधिकार को कम करने का श्रेय दिया जाता है, वह स्पष्ट रूप से चुप हैं। यह वह बोर्ड है जिसने उत्तराखंड में वसीम जाफर को सांप्रदायिक रूप से निशाना बनाए जाने पर या जब डैरेन सैमी के आईपीएल में नस्लीय दुर्व्यवहार होने पर कोई नज़रिया या फ़ैसला ही नहीं लिया। बीसीसीआई ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए बोलने पर कोई कदम नहीं उठाए, लेकिन वह एक भारतीय खिलाड़ी को समाज के प्रति शिक्षित करने में भी विफल रहा, वह तब भी विफल रहा जब एक खिलाड़ी ने दूसरी जाति के खिलाड़ी पर प्रहार किया।
कोहली शायद इतने बड़े स्टार हैं कि उन्हें नतीजों से डरना नहीं चाहिए। वह अपनी क्रिकेट उपलब्धियों में सहज और आश्वस्त हैं। वह अल्पसंख्यक से नहीं है जिसे निशाना बनाया जा सकता है। इसलिए ऐसे बड़े नामों का नेतृत्व करना महत्वपूर्ण है।
यह एक ऐसा सप्ताह था जिसमें भारत की पाकिस्तान से हार और क्विंटन डिकॉक के घुटने टेकने से इनकार ने क्रिकेट को वास्तविक दुनिया में सच में खींच लिया। सिर्फ़ भारत और साउथ अफ़्रीका में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी। जब वक़ार यूनुस इसे एक धार्मिक जीत के रूप में पेश करने में कामयाब हो सकते हैं, तो कल्पना कीजिए कि उनके देश में यह कितना भयानक रहा होगा जब वे भारत से 12 विश्व कप मैच हार गए थे।
इस पूरे विवाद से कुछ अच्छी चीज़ें आगे आई है। वक़ार को माफ़ी मांगनी पड़ी हालांकि उन्होंने उसमें भी यह शर्त रखा कि "अगर मेरी बातों से किसी को ठेस पहुंची हो"। डिकॉक को भी समझ आया कि अपने हक़ की रक्षा करने के चक्कर में वह ऐसा एक प्रतीकात्मक चिंह से दौड़ रहे थे जो मनुष्य के हक़ की लड़ाई ही है। शायद इस प्रक्रिया में विरोध और रज़ामंदी के बीच उन्हें अपने पात्रता का ज्ञान एक ऐसे देश में जहां एक टीम का समर्थन करना भी देशवासियों पर थोप दिया जाता है, उसमें कोहली ने एक साथी के समर्थन के साथ ही नज़र उनको परेशान कर रहे लोगों पर डाल दी है। कोहली ने कहा है कि शमी को दया और सहानुभूति की उतनी ज़रूरत नहीं जितनी ऐसे लोगों को निंदा की। अगर इससे भारतीय क्रिकेट फ़ैन असहज हो रहे हैं तो इसे कोहली के 70 अंतर्राष्ट्रीय शतकों में जोड़ दीजिए।

सिद्धार्थ मोंगा ESPNcricinfo में असिस्टेंट एडिटर हैं, अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सीनियर सब-एडिटर निखिल शर्मा हैं।