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करियर के अंतिम दौर में विराट ने खेला सबसे बड़ा जुआ

कोहली ने अपने करियर में बहुत साहसी फ़ैसले लिए हैं, लेकिन बोर्ड से टक्कर लेना उनका सबसे साहसी फ़ैसला है

Virat Kohli issues the last round of instructions before the game, Afghanistan vs India, T20 World Cup, Group 2, Abu Dhabi, November 3, 2021

कोहली ने बोर्ड के हथियार से ही बोर्ड पर आघात किया है  •  ICC via Getty

बतौर कप्तान विराट कोहली कभी भी अपने फ़ैसलों को लेकर दोहरे मन में नहीं होते। नेतृत्व करने का सबसे मुश्किल काम होता है- दूसरों के लिए फ़ैसले लेना और फिर उन फ़ैसलों का बोझ साथ लेकर चलना। कोहली ने बतौर कप्तान अपने पहले टेस्ट मैच में आर अश्विन की जगह कर्ण शर्मा को टीम में शामिल किया। विपक्षी टीम के अनुभवी ऑफ़ स्पिनर ने उस मैच में 12 विकेट चटकाए और अपनी टीम को जीत दिलाई। वहीं लेग स्पिनर कर्ण को फिर कभी भारत के लिए खेलने का मौक़ा नहीं मिला।
यह एक ऐसा निर्णय है जो किसी भी कप्तान को ज़िंदगी भर के लिए तकलीफ़ दे सकता है, डरा सकता है और भविष्य में कठिन फ़ैसले लेने से रोक सकता है। "अगर मैं अपने प्रमुख स्पिनर को खिलाता तो क्या चौथी पारी में लक्ष्य छोटा होता? क्या उस युवा लेग स्पिनर का करियर कुछ अलग होता अगर मैं उसे पूरी तरह तैयार होने पर ही मैदान पर उतारता?" ऐसे सवाल आपको परेशान कर सकते हैं।
कोहली बाक़ी सब से थोड़े अलग हैं। अगर वह जानते हैं कि उनका फ़ैसला टीम के हित में लिया गया है तो फिर वह उस पर सवाल नहीं उठाते हैं। उनके अनुसार झिझक मैदान पर आपसे ग़लतियां करवाती हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या अपनी 'सर्वश्रेष्ठ एकादश' खिलाने पर मैच का परिणाम कुछ और होता, तब उन्हें बहुत गुस्सा आता हैं। उनके अनुसार इसका यह अर्थ होता है कि उन्होंने जानबूझकर अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम को मैदान पर नहीं उतारा।
यह चीज़ें विभिन्न संस्कृतियों में विभिन्न लोगों के लिए अलग तरह से काम करती है, हालांकि यह एक बेहतरीन गुण है। अपने पूरे करियर के दौरान कोहली ने साहसी क़दम उठाए हैं, जो बाहर बैठे लोगों को जोखिम भरे लग सकते हैं। एक समय पर उन्होंने टीम के प्रमुख कोच और दिग्गज लेग स्पिनर अनिल कुंबले के साथ काम करने से मना कर दिया था। वह भी तब जब जनता की सहानुभूति और पुराने खिलाड़ियों का समर्थन कुंबले के साथ था।
उस दौरान कोहली अकेले ही सबसे भिड़ गए थे। क्रिकेट सलाहकार समिति में सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण उनके इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे। उन्हें बताया गया कि कुंबले के साथ-साथ वह ज़हीर ख़ान और वीरेंद्र सहवाग के साथ भी काम करने से इनकार कर रहे थे, जिन्हें सहयोगी स्टाफ़ के रूप में चुना गया था। यह अंगारों पर चलने के समान था और अगर इसके बाद वह परिणाम नहीं देते तो यह उनके लिए आत्महत्या जैसा होता।
भले ही आप कोहली को चाहों या ना चाहों, आप उनकी दृढ़ता को नकार नहीं सकते। कोहली के अनुसार उनकी इस स्पष्टता के पीछे बड़ा हाथ उनकी पत्नी अनुष्का शर्मा का हैं।
अगर कोहली उस पूरे कुंबले प्रकरण को याद करेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि उस दौरान बोर्ड ने वही सब कुछ किया था जिस पर उन्हें आज ग़ुस्सा आ रहा हैं : अर्धसत्य, अफ़वाह और छवि ख़राब करने की कोशिश। हालांकि उस दौरान न तो उन्होंने कभी कुंबले के ख़िलाफ़ कुछ ग़लत कहा था और ना ही कुंबले ने उनके ख़िलाफ़। यह एक प्रोफ़ेशनल असहमति थी और जहां तक कोहली का सवाल है, बाहर के किसी भी व्यक्ति के लिए इसकी जानकारी ज़रूरी नहीं थी।
2018-19 में जब भारत ने पर्थ में चार ऐसे तेज़ गेंदबाज़ खिलाए जो बल्लेबाज़ी नहीं कर सकते थे और मैच हार गए, तब उनसे मैच के बाद पूछा गया कि क्या चोट के कारण ये फ़ैसले लिए गए? कोहली ने साफ़-साफ़ कहा कि यह फ़ैसला टीम के हित में लिया गया था। लेकिन पूर्व खिलाड़ी फिर भी इस बात की आलोचना कर रहे थे। तब एक हफ़्ते के बाद रवि शास्त्री ने सामने आकर बताया कि जाडेजा पूरी तरह से फ़िट नहीं थे। ऐसी प्रतिक्रिया आपको अपने फ़ैसलों पर टिके रहने वाले कोहली से कभी नहीं मिलेगी।
ख़ुद बल्लेबाज़ होने के बावजूद कोहली मैच जीतने के लिए बल्लेबाज़ी के लिए मुश्किलें खड़ी करने से नहीं हिचकिचाते। वह केवल पांच बल्लेबाज़ों के साथ जाने वाले पहले कप्तान नहीं है लेकिन उन्होंने निरंतरता के साथ ऐसा किया है। ख़राब फ़ॉर्म से जूझने के बावजूद वह पहले दिन से स्पिन करने वाली पिच मांगने से भी नहीं कतराते हैं।
यह पूर्व कप्तानों को कम आंकने के लिए नहीं है। उन्हें अक्सर वह स्वतंत्रता और समर्थन नहीं मिला जो प्रशासन ने कोहली को दिया। उदाहरण के लिए महेंद्र सिंह धोनी को घर पर कभी भी अपनी पसंद की पिच नहीं मिली, साथ ही उनकी टीम में हमेशा से सीनियर खिलाड़ी थे, जिन्हें संभालना अपने आप में एक कठिन कार्य था। एक और उदाहरण नए कोच राहुल द्रविड़ का है, जिन्होंने षडयंत्रों के कारण कप्तानी की ज़िम्मेदारी छोड़ दी। कोहली को इन सबसे नहीं गुज़रना पड़ा।
बोर्ड के नए प्रशासक, ख़ुद के रनों के अभाव और विश्व टेस्ट चैंपियनशिप फ़ाइनल में मिली हार के बाद बढ़ते दबाव के बावजूद कोहली इंग्लैंड दौरे पर मैच विजेता अश्विन को बाहर रखने से नहीं कतराए, क्योंकि उनका मानना था कि यह संयोजन उन परिस्थितियों में टीम के लिए बेहतर था। जिस तरह से यह ज़रूरी नहीं है कि टीम की जीत कोहली को सही ठहराए, वैसी ही ज़रूरी नहीं है कि हार उन्हें ग़लत ही साबित करे।
कोहली अब भी वही हैं, लेकिन अब बोर्ड उनके साथ नहीं है। बोर्ड ने कुछ ऐसी बातें लीक की, जिससे कोहली के व्यक्तित्व पर झटका लगा। हालांकि ये बातें निराधार नहीं थीं, लेकिन वह बिना संदर्भ के लोगों के बीच साझा हुईं। कुंबले ने भी इसका सामना किया था, लेकिन उन्होंने कभी इसका जवाब नहीं दिया।
यहां तक ​​कि सचिन तेंदुलकर ने भी बोर्ड का कभी विरोध नहीं किया, जबकि उन्हें मीडिया के माध्यम से पता चला था कि उन्हें कप्तान के पद से हटा दिया गया है। उन्होंने कई वर्षों तक इस सॉफ़्ट पावर का आनंद लिया और रिटायर होने के बाद ही इसका खुलासा किया। अधिकतर खिलाड़ी रिटायर होने के बाद भी बोर्ड के बारे में कुछ भी नहीं कहते हैं क्योंकि इसके बाद का करियर भी बोर्ड के ग़ैर-ज़िम्मेदार पदाधिकारियों की सनक और शौक पर निर्भर करता है। इस लिहाज़ से कोहली, तेंदुलकर से ज़्यादा सुनील गावस्कर रहे हैं।
एक स्तर पर यह कप्तानी परिवर्तन एक नियमित मामला था। कोहली ने एक प्रारूप से इस्तीफ़ा दिया, बोर्ड ने स्वीकार कर लिया। फिर बोर्ड ने महसूस किया कि सीमित ओवर की दोनों टीमों के पास एक ही कप्तान होना चाहिए, तो उन्होंने कोहली को हटा दिया। कोहली ने फिर से कहा कि 'ठीक है'।
लेकिन इस 'ठीक है' के शांत पानी के नीचे भी प्रतिरोध की अंगार थी। कोहली ने विश्व कप से पहले अपनी आश्चर्यजनक घोषणा के साथ एक गूगली फेंकी थी, जिसके बाद बोर्ड ने उन्हें जल्दबाज़ी में रिलीज़ करने का फ़ैसला लिया। उन्होंने उन्हें वनडे कप्तानी से हटाने की हिम्मत की और कहा कि वे अब 2023 विश्व कप के लिए टीम तैयार करना चाहते हैं।
बोर्ड ने अब आगे बढ़कर उन्हें बर्खास्त कर दिया, जो पूरी तरह से उचित कॉल था क्योंकि कोहली ने इस दिशा में ख़ुद पहला कदम उठाया था। लेकिन जिस तरह से यह कदम उठाया गया, वह पूरी तरह से असम्मानजनक और दुर्भाग्यपूर्ण था।
कोहली के साथ संचार ठीक था। एक चयन बैठक से 90 मिनट पहले उन्हें यह बताया गया,भारत में आमतौर पर कप्तानों को यह सुविधा नहीं मिलती। लेकिन इस दौरान जनता के बीच जो संदेश गया वह बहुत ख़राब था।
गांगुली ने बैठक के अनौपचारिक विवरण का खुलासा किया, जहां कोहली ने उन्हें सूचित किया था कि वह टी20 की कप्तानी छोड़ रहे हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यह सच था, झूठा या आधा सच, लेकिन कोहली ने एक बार फिर शांत और सोची-समझी बात के साथ बोर्ड पर वापस लौ फेंक दी। उन्हें यह स्वीकार करने के लिए छोड़ दिया कि उनका अध्यक्ष झूठ बोल रहा है या फिर कह रहा है कि कप्तान झूठ बोल रहा है। एक ही झटके में कोहली ने बोर्ड का सबसे प्रभावी हथियार उनसे छीन लिया।
साउथ अफ़्रीका में भारत की पहली टेस्ट जीत ऐसे ही एक उथल-पुथल भरे समय में आई थी, जब गांगुली ने टीम के लिए अवांछित होते हुए भी जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। ड्रेसिंग रूम में बड़े टेस्ट जीतने की अन्य कहानियां अभी बाक़ी हैं। भारतीय क्रिकेट में बहुत अधिक प्रतिभा और गहराई है और ऐसी चीज़ों से शायद ही मैदान में उनका प्रदर्शन प्रभावित हो। एक बार जब वे मैदान में उतरते हैं, तो वे सिर्फ़ और सिर्फ़ जीतने के लिए खेलते हैं।
लेकिन यह एक कप्तान के बारे में है, जिसने खुले तौर पर बोर्ड को चुनौती दी, जो गावस्कर के दिनों से ही नहीं हुआ है। गावस्कर की तरह कोहली ऐसा करने के लिए सबसे अधिक तैयार हैं। वह मुखर हैं, बेतहाशा लोकप्रिय हैं और तर्क करने से नहीं शर्माते हैं। उन्हें किसी भी दशा में अलग-थलग नहीं किया जा सकता है।
फिर भी अपने करियर के अंतिम दिनों में शायद ही कोई खिलाड़ी बोर्ड से टक्कर लेना चाहे। बोर्ड को इसकी आदत नहीं है और वह बेहद ही शांत ढंग से बदला लेते हैं। कोहली एक ऐसी दुनिया में चल रहे हैं, जिसके वे आदी नहीं हैं। उनके पास रनों की कमी है, फ़ॉर्म भी पहले जैसा नहीं रहा है और ऑस्ट्रेलिया में जीत के बाद से भारतीय क्रिकेट के साथ कुछ ख़ास अच्छा भी नहीं हुआ है। ऐसे में बोर्ड से पंगा लेना उनका अभी तक का सबसे बड़ा जुआ हो सकता है।

सिद्धार्थ मोंगा ESPNcricinfo में सहायक संपादक हैं, अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के उप संपादक अफ़्ज़ल जिवानी ने किया है