कानपुर टेस्ट की दोनों पारियों को मिलाकर न्यूज़ीलैंड ने क़रीब 240 ओवर बल्लेबाज़ी की, जिसमें से अकेले टॉम लेथम ही 71 ओवर तक क्रीज़ पर डटे रहे। लेथम का इतनी देर तक बल्लेबाज़ी करना भी न्यूज़ीलैंड के लिए मैच ड्रॉ कराने का एक बड़ा कारण रहा।

भारतीय पिचों पर किसी विदेशी बल्लेबाज़ द्वारा ज़्यादातर बड़ी और यादगार पारियां तभी देखने को मिली हैं, जब विदेशी टीम ने पहले बल्लेबाज़ी की हो। पहला दिन - वह समय न सिर्फ़ बल्लेबाज़ी के लिए सबसे उपयुक्त होता है, बल्कि ऐसा करने के बाद विदेशी टीम भारत में चौथी पारी में बल्लेबाज़ी करने से भी बच जाती है। क्योंकि भारतीय पिचों पर चौथी पारी में बल्लेबाज़ी करना बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन लेथम ने इन बातों को मानो ग़लत साबित कर दिया। क्योंकि न्यूज़ीलैंड को तो टॉस हारने के बाद पहले फ़ील्डिंग करनी पड़ी थी।

हालांकि कानपुर की पिच कोई बहुत बड़ा टर्न लेने वाली नहीं थी, लेकिन हां इस पर उछाल बेहद कम थी। उसपर से जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता जा रहा था, गुणवत्तापूर्ण भारतीय स्पिनरों ने बल्लेबाज़ों के लिए परिस्थितियां और भी कठिन कर दीं थी। इनसब के बीच लेथम क्रीज़ पर चट्टान की तरह डटे रहे और हर गेंद का लाजवाब अंदाज़ में सामना किया। यहां तक कि उनकी विकेट भी गेंदबाज़ों को उन्हें फंसाकर नहीं मिली बल्कि पहली पारी में तिहरे अंक में जाने की फ़िराक़ में वह जल्दबाज़ी कर बैठे। जबकि दूसरी पारी में वह एक ख़राब शॉट खेलने की कोशिश में आउट हुए।

आख़िर लेथम ने भारतीय स्पिनर्स के ख़तरे को दूर किया कैसे ?

उनकी बल्लेबाज़ी देखकर हम समझ सकते हैं कि ऐसा करने के कई तरीक़े हैं।

पहला तरीक़ा जो दिमाग़ में आता है वह है क़दमों का इस्तेमाल करते हुए स्पिनरों के ख़िलाफ़ हर तरफ़ खेलना - ये एक ऐसा कौशल है जो क़रीब क़रीब हर वह बल्लेबाज़ करने की कोशिश करता है जो भारत में क़ामयाब होना चाहता है।

दूसरा तरीक़ा जो लेथम ने किया - एक मज़बूत गेम प्लान और इसके प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता जिसपर वह लगातार क़ायम रहे। लेथम ने अपनी पारी के दौरान कभी भी स्पिनरों के ख़िलाफ़ ड्राइव नहीं लगाई, न ही उन्होंने ज़्यादा कट करने की कोशिश की। बल्कि वह ऑफ़ साइड पर इतने सीमित हैं कि बतौर गेंदबाज़ आप ऑफ़ स्टंप फ़ुल गेंद डालने से भी नहीं डर सकते। ज़ाहिर है अगर हाफ़ वॉली मिलेगी तो वह ड्राइव लगाएंगे, लेकिन वह भी तभी जब गेंद बिल्कुल उनके बल्ले के अंदर हो। वह आपको कट भी कर सकते हैं लेकिन तभी ही जब गेंद बहुत ज़्यादा बाहर और छोटी हो।

गेंदबाज़ के तौर पर आप फिर यही करते हैं कि उन्हें ऑफ़ स्टंप के बाहर गेंदबाज़ी करें और लेंथ को बदलते रहें, और वह लगातार मेडन पर मेडन ओवर ख़ुशी-ख़ुशी खेलते रहेंगे। और यही उनके ख़िलाफ़ गेंदबाज़ी करना एक चुनौती की तरह हो जाता है। उनका डिफ़ेंस भी बेहतरीन है, बल्कि तकनीकी तौर पर वह इतने शानदार हैं कि उप-महाद्वीप के बल्लेबाज़ भी उनसे ये कला सीख सकते हैं। उनका फ़्रंटफ़ुट गेम तो लाजवाब है, जब पैर निकालते हैं तो उनका सिर हमेशा बिल्कुल गेंद के ऊपर होता है और हाथ बल्ले के ठीक सामने, इस समय उनका बल्ला हल्का सा इस तरह कोण बनाए रहता है कि उनका बल्ला और कंधा मानो नौ (9) का आकार बना रहा हो।

बहुत लंबा क़दम शरीर के वज़न को पीछे धकेलता है और हल्के हाथों से खेलना इसे और भी प्रभावी बनाता है, लेकिन लेथम का मूवमेंट बिल्कुल सटीक है। और ऐसा लगता है कि उन्होंने इसके लिए काफ़ी मेहनत की है, क्योंकि न्यूज़ीलैंड ने जब पिछली बार टेस्ट मैचों के लिए भारत का दौरा किया था तो उन्हें आर अश्विन ने चार बार अपना शिकार बनाया था, जिसमें से तीन बार वह फ़्रंटफ़ुट पर डिफ़ेंड करते हुए आउट हुए थे।

ऐसा नहीं था कि कानपुर में वह एक बार भी डिफ़ेंड करते हुए बीट नहीं हुए, या फिर हर एक डिफ़ेंसिव शॉट बिल्कुल सटीक और सही था। लेकिन इसके बावजूद वह कभी भी अपने गेम प्लान से बिल्कुल विचलित नहीं हुए। कहा जाता है कि बल्लेबाज़ी करने का सबसे सही अंदाज़ ये होता है कि आप भूल जाएं कि पिछली गेंद पर किया हुआ था, लेकिन ये कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल। हर गेंद जो आपकी अपेक्षा से अधिक घूमती है या आपकी अपेक्षा से अधिक या कम उछलती है, वह आपके दिमाग़ में अपनी छाप छोड़ती है और, कई बार इस वजह से आप अगली गेंद पर कुछ अलग करने चले जाते हैं। लेकिन लेथम की अपने खेल को प्रभावित न करने की क्षमता क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी।

कल्पना करिए कि ठीक इन्हीं परिस्थितियों में अश्विन के सामने डेविड वॉर्नर हों, एक बार अगर अश्विन ने उन्हें परेशान किया तो फिर वॉर्नर उनके ख़िलाफ़ आक्रामक शॉट खेलने जाएंगे, उसके लिए वह जगह बनाएंगे या फिर क़दमों का इस्तेमाल करते हुए गेंदबाज़ के सिर के ऊपर से खेलना चाहेंगे। हालांकि ये भी कोई ख़राब तरीक़ा नहीं है, और कई बार तो कहा भी जाता है कि आक्रमण ही सुरक्षा का सबसे अच्छा तरीक़ा है। लेकिन भारतीय पिचों पर सुरक्षा ही सुरक्षा का सबसे अच्छा तरीक़ा माना जाता है; क्योंकि यहां हर दूसरी रणनीति असफल हो जाती है।

ऑफ़ स्टंप के बाहर लगातार गेंदों को डिफ़ेंस करते हुए, लेथम ने गेंदबाज़ों को मजबूर कर दिया कि वह उनके क़रीब गेंद करें और यहीं पर वह रन बना पाते थे। जिसके बाद गेंदबाज़ फिर उन्हें ऑफ़ स्टंप के बाहर गेंद डालने लगते थे, और एक बार फिर वह उसे ख़ुशी-ख़ुशी डिफेंस करने लगते थे। यही सिलसिला लगातार चलता रहा, हालांकि उनके पास मैथ्यू हेडन या एडम गिल्क्रिस्ट की तरह ज़ोरदार स्वीप शॉट नहीं है, लेकिन लेथम के पास अत्यधिक नियंत्रण है और स्वीप शॉट्स की कई विविधताएं हैं।

जिस तरह से स्पिन के ख़िलाफ़ उनका खेल शानदार है, ठीक उसी तरह तेज़ गेंदबाज़ों के ख़िलाफ़ भी लेथम बेहद मज़बूत हैं। ऑफ़ स्टंप के बाहर की गेंदों को वह छोड़ देते हैं, जो थोड़ा पास होती है उसे डिफेंड करते हैं और जो पैड की ओर रहती हैं, उनपर वह स्कोर कर पाते हैं। लेकिन स्पिन गेंदबाज़ी के उलट, तेज़ गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़ लेथम को ड्राइव काफ़ी पसंद है, हालांकि वह शॉट पारंपरिक कवर ड्राइव से थोड़ा हटकर स्क्वेयर ड्राइव की तरह दिखता है।

भारत के लिए लेथम फ़िलहाल बड़ा रोड़ा नज़र आ रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि इन पिचों पर वह न्यूज़ीलैंड के सबसे मुक़म्मल बल्लेबाज़ हैं। इसलिए ये ज़रूर हैरान करने वाली बात रही कि हमने उनके ख़िलाफ़ ज़्यादा बाउंसर नहीं देखे, कानपुर की धीमी और कम उछाल वाली पिचों पर अच्छा बाउंसर बल्लेबाज़ को परेशानी में डाल सकता था। हो सकता है वानखेड़े में खेले जाने वाले दूसरे टेस्ट में हम उनके ख़िलाफ़ ये नज़ारा ज़रूर देखें।

आकाश चोपड़ा (@cricketaakash) पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज़ हैं, अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट सैयद हुसैन ने किया है।