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वॉर्न की तरह हर कोई बनना चाहता था 'द किंग'

उनकी मौजूदगी, उनका ओरा, उनके स्वैग को देखकर प्रशंसक भी ख़ुद को ऊंचा महसूस करते थे और मानते थे कि वे भी अजेय हैं

हर कोई शेन वॉर्न की तरह लेग स्पिन करने की हसरत रखता रहा है  •  Getty Images

हर कोई शेन वॉर्न की तरह लेग स्पिन करने की हसरत रखता रहा है  •  Getty Images

'द किंग' कुछ उपनाम संयोगिक होते हैं। लेकिन यह जितना दिया गया उतना ही कमाया गया था। 1980 के बाद पैदा हुए किसी भी ऑस्ट्रेलियाई के लिए शेन वॉर्न को 'द किंग' के नाम से जाना जाता है। वह सिर्फ़ स्पिन के किंग नहीं थे, बल्कि क्रिकेट की दुनिया के भी किंग थे।
बचपन में वॉर्न ने ख़ुद डेनिस लिली को अपना आदर्श माना। वॉर्न, डेनिस लिली को ऑस्ट्रेलिया के अंतिम श्रेष्ठ गेंदबाज़ मानते थे। लिली भी वॉर्न से आकर्षित थे और उनसे उतना ही प्यार करते थे। उस पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने उन्हें 'वॉर्नी' उपनाम दिया। वॉर्न ने लिली जैसी बहादुरी और करिश्माई गेंदबाज़ी की। लेकिन इन्होंने आश्चर्यजनक स्तर के लेगस्पिन से अपनी जादूगरी दिखाई।
लेकिन युवा पीढ़ी जो 'द किंग' के रूप वॉर्न के साथ पले-बढ़े, उन्होंने बिना किसी शर्त के उनकी आदर की, न कि केवल मैदान पर उनके कारनामों के लिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वॉर्न ने क्रिकेट से अलग क्या किया, उन्हें आंकने या अलग करने के असंख्य अवसर थे। इस चीज़ ने वॉर्न को इस प्यारी पीढ़ी के लिए और भी अधिक प्यार करने का काम किया।
वॉर्न उनके जेम्स बॉन्ड थे। युवक उनके जैसा बनना चाहते थे। प्लेबॉय लाइफस्टाइल, अच्छा और बुरा दोनों था। उन्होंने जिस तरह से बल्लेबाज़ों को गेंदबाज़ी की, उसी तरह उन्होंने एक पीढ़ी को रिझाया। बहुत कम बच्चे कभी एक गेंदबाज़ की गेंदबाज़ी देखने के लिए बैठते होंगे। लेकिन वॉर्न के आने पर वे अपनी सीटों के किनारे पर बैठ जाते। वॉर्न जो कर रहे थे उसमें एक ऐश्वर्य, एक पहेली, एक महारत थी और फिर भी ऐसा लगता था कि उनका अनुकरण करना संभव है।
वह किसी भी तरह से सर्वश्रेष्ठ एथलीट नहीं थे। ब्लीच कराए हुए सुनहरे बाल। कोई छरहरा फ़िगर नहीं। वह बस क्रीज़ पर चल कर जाते, जैसा कोई भी बच्चा कर सकता है, और अपनी उंगलियों को घुमाते और जादू बिखेर देते! महान रिची रिचर्डसन को आउट करने के लिए फेंका गया फ्लिपर। एक चौंकाने वाला लेगब्रेक जो अभी भी माना जाता है कि यह माइक गैटिंग का ऑफ़ स्टंप कैसे उड़ा सकता है। अपने पसंदीदा मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर बॉक्सिंग डे पर हैट्रिक।
क्रिकेट में रुचि रखने वाला हर बच्चा अचानक लेग स्पिन गेंदबाज़ी करने की चाहत रखने लगा। वे चाहते थे कि चलकर आएं और लेग स्टंप के बाहर गेंद कर ऑफ़ स्टंप की गिल्लियां बिखेर दें। हर टीम में एक लेग स्पिनर होता था। यहां तक ​​कि तेज़ गेंदबाज़ी करने वाले भी रात्रि अभ्यास के दौरान लेग स्पिन पर हाथ आजमाया करते। वॉर्न ने क्रिकेट की सबसे कठिन कला को सबसे बढ़िया बनाया।
और ऑस्ट्रेलियाई बच्चों के लिए जो ख़ास था, वह उनमें से एक थे। मेलबर्न के खाड़ी के उपनगरों का एक बच्चा जो रॉकस्टार बनना चाहता था, एक लेग स्पिनर गेंदबाज़ बन गया। जिस समय उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में नाइकी के साथ साइन किया वह एक और समताप मंडल में प्रवेश कर गए। ऑस्ट्रेलिया में हर बच्चा चाहता था कि वॉर्न की नाइकी क्रिकेट के जूते, उनका ट्रेडमार्क "स्वोश" स्टड इयररिंग और नंबर 23 की जर्सी पहनें। इसने वॉर्न को अन्य क्रिकेटरों से अलग खड़ा कर दिया। वह अब दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ब्रांडों में से एक के साथ थे, माइकल जॉर्डन और टाइगर वुड्स के साथ एक कॉमनवेल्थ खेल में वॉर्न नाइकी के मार्की मैन के रूप में बैठे थे।
क्रिकेटरों ने पहले इस खेल का व्यवसायीकरण किया था, लेकिन वॉर्न एक अलग स्तर पर ले गए। बच्चे उन्हें दिन में देखते थे और रात में उनका वीडियो गेम शेन वॉर्न क्रिकेट '99' खेलते थे।
जैसे-जैसे वॉर्न का ऑफ़-फ़ील्ड अनैतिक आचरण बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे ऑन-फ़ील्ड लेजेंड बनते गए और उनके लिए लोगों का प्यार बढ़ता गया।
कंधे की चोट से संघर्ष करने के एक साल बाद उन्होंने 1999 विश्व कप में फिर से अपना जादू बिखेरना शुरू किया और सेमीफ़ाइनल में साउथ अफ़्रीका के ख़िलाफ़ ऑस्ट्रेलिया को मुश्किल परिस्थितियों से निकाला। फिर फ़ाइनल में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। 2001 में वाका में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ उनके 99वें टेस्ट में प्रशंसकों ने हर्ष, उत्साह, वेदना और आनंद की अनुभूति की।
यहां तक ​​​​कि प्रतिबंधित दवा का मामला जिसने उन्हें एक साल के लिए खेल से बाहर रखा और जो ऑस्ट्रेलिया को 2003 में विश्व कप ख़िताब की रक्षा करने में नाकाम कर सकता था, उनके प्रशंसकों ने इसके लिए उन्हें तिरस्कृत किया।
प्रतिबंध के बाद का पुनर्जागरण, वॉर्न को देखने का सबसे अच्छा दौर हो सकता है। 1990 और 2000 के दशक में बड़े हुए ऑस्ट्रेलियाई प्रशंसकों के बीच एक मजाक चलता है कि स्टीव वॉ-रिकी पोंटिंग के प्रभुत्व का युग एक गर्म कंबल की तरह था जो सुरक्षा और आराम की भावना प्रदान करता था।
वास्तविकता यह थी कि वे अजेयता की भावना प्रदान करते थे। उनकी मौजूदगी, उनका ओरा, उनके स्वैग को देखकर प्रशंसक भी ख़ुद को ऊंचा महसूस करते थे और मानते थे कि वे भी अजेय हैं। अगर वॉर्न के पास गेंद होती तो वे हार नहीं सकते थे। यहां तक ​​​​कि जब वे 2005 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ख़राब खेले, तब भी वॉर्न ने यह भावना दी कि वह कहीं से भी जीत सकते हैं। ट्रेंट ब्रिज में यह देखने को मिला जब वॉर्न ने लगभग अकेले दम पर 129 रन के लक्ष्य का बचाव किया। 15 महीने बाद एडिलेड में उन्होंने अद्भुत किया था, जहां वॉर्न ने झांसा, बहादुरी, अतुलनीय कौशल और अटल विश्वास से एक आश्चर्यजनक जीत के लिए प्रेरित किया।
2006 बॉक्सिंग डे पर एमसीजी में उन्होंने अपना 700वां टेस्ट विकेट लिया तो पूरा स्टेडियम उनका नाम लेकर चिल्ला रहा था। उसके बाद उन्होंने पंजा भी खोला जिसने 'किंग' के उत्सव का अनुभव कराया। वॉर्न ने एक टेस्ट बाद ही रॉक स्टार की तरह, करियर की ऊंचाई पर, अपनी सामर्थ्य के चरम पर प्रशंसकों को और अधिक चाहने के लिए छोड़ दिया।
ऐसा अभी एक पीढ़ी को लगता है, जैसे उन्होंने समय से पहले ही संन्यास ले लिया हो। रिटायरमेंट के बाद वे एक किंग की तरह जीवन व्यतीत कर रहे थे। ऑस्ट्रेलियाई लोग दूसरे की सफलताओं और उपलब्धियों को अपने से नीचा दिखाने की बुरी आदत से पीड़ित हैं , लेकिन जब वॉर्नी की बात आई तो किसी ने भी उनके साथ ऐसा नहीं किया। वे वैसे ही वॉर्न से जुड़े रहे।
वह किंग थे। कई आस्ट्रेलियाई लोगों के लिए शेन वॉर्न हमेशा 'द किंग' रहेंगे।

ऐलेक्‍स मैल्‍कम ESPNcricinfo में एसोसिएट एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी में कुणाल किशोर ने किया है।