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भारत के मूक-बधिर क्रिकेट कप्तान वीरेंद्र सिंह का एक दिन रणजी ट्रॉफ़ी खेलने का सपना

भारत ने इस महीने मूक-बधिर क्रिकेट के टी20 चैंपियंस ट्रॉफ़ी में ख़िताबी जीत हासिल की थी

भारतीय मूक-बधिर टीम के कप्तान विरेंद्र सिंह अपने बचपन के दोस्त के साथ  •  Kunal Kishore/ESPNcricinfo

भारतीय मूक-बधिर टीम के कप्तान विरेंद्र सिंह अपने बचपन के दोस्त के साथ  •  Kunal Kishore/ESPNcricinfo

रविवार (9 अक्तूबर) को जहां रांची में भारत, साउथ अफ़्रीका के विरुद्ध श्रेयस अय्यर और इशान किशन के बदौलत दूसरे वनडे में ज़बरदस्त पलटवार करते हुए सीरीज़ को बराबरी पर ला खड़ा कर रहा था, तब कुछ दो हज़ार मील दूर भारत किसी और मैदान में भी साउथ अफ़्रीका को परास्त कर रहा था।
यूएई में मूक-बधिर टी20 चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में भारत ने साउथ अफ़्रीका को हराकर ख़िताब अपने नाम किया। ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश की टीमों के साथ खेले गए इस टूर्नामेंट में भारत अपराजित रहा।
स्वदेश लौटने के बाद गुरुवार को मूक-बधिर भारतीय क्रिकेट टीम के प्रायोजक केएफ़सी ने दिल्ली में टीम की ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने और खिलाड़ियों की इस उपलब्धि की सराहना करने के लिए एक प्रोगाम रखा था। अपनी पूरी टीम और सपोर्ट स्टाफ़ की मौजूदगी में भारत के कप्तान वीरेंद्र सिंह ने अपने राज्य हिमाचल प्रदेश के लिए रणजी ट्रॉफ़ी खेलने की इच्छा जताई।
उन्होंने ईएसपीएनक्रिकइंफ़ो को कहा, "मैं अपने राज्य के लिए रणजी खेलना चाहता हूं और अपने खेल को और अच्छा करना चाहता हूं। जिस तरीक़े से अभी हमने करके दिखाया है मैं चाहता हूं कि हमें पूरा समर्थन मिले और इंटरप्रेटर (भाषांतर) हमेशा हमारे साथ रहें ताकि अगर हमारे कोच बोलने-सुनने वाले हैं और वो अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं तो उनका सर्वश्रेष्ठ प्रयास हम तक पहुंच पाए।"
20 दिसम्बर 2021 को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से संबद्धीकरण मिलने के बाद भारतीय मूक-बधिर क्रिकेट एसोसिएशन (एडीसीए) के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों को एक नई उम्मीद मिली है। लेकिन वीरेंद्र ने बीसीसीआई से पुरज़ोर समर्थन की अपील की।
उन्होंने कहा, "मैं बीसीसीआई को ये बोलना चाहता हूं कि हमारे प्रतिभा की कद्र कीजिए। हमें प्रोत्साहित कीजिए। हमें ग्लैमर नहीं भी मिलता है तो कोई बात नहीं। हम जिस तरह से खेल रहे हैं, हमारा जो कौशल है उसको ही प्रोत्साहन मिल जाएगी वही हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। ऐसे बहुत सारे मूक-बधिर बच्चे हैं जो क्रिकेट खेलना चाहते हैं लेकिन उनको कोचिंग नहीं मिल पाती है। देखिए कोच के द्वारा जो हमें समझाया जाता है उसमें समझने में दिक़्क़त आ जाती है। अगर हर जगह इंटरप्रेटर को रखा जाएगा और उनके द्वारा समझाया जाएगा तो वे आगे बढ़ पाएंगे और अच्छा करेंगे।"
टीम को अपने मार्गदर्शन में ख़िताब दिलाने वाले कोच एम पी सिंह ने कहा, "मैं इनके साथ दस सालों से हूं और कोई शुल्क नहीं लेता। सिर्फ़ इसलिए कि इनकी टीम बने, कुछ नाम करें, तो इनको नौकरी मिले। ये काफ़ी ग़रीब घर के बच्चे हैं। ये बहुत अच्छे क्रिकेटर हैं। मेरे अनुसार राज्य क्रिकेट संघों को भी नियमित क्रिकेट में इनको खिलाना चाहिए। अगर सुनने में दिक़्क़त आएगी तो ये लिप सिंक से चीज़ों को समझ सकते हैं।"
आगे सिंह ने कहा, "टीम जीत के आई है तो पुरस्कार के तौर पर इनको भी बोर्ड की तरफ़ से कुछ न कुछ मिलना चाहिए। जैसे इनको एक-एक लाख रुपया प्लेयर को दे दें, तो ये बहुत ख़ुश होंगे और टीम में आने के लिए प्रतियोगिता बढ़ेगी। ये रक़म तो एक रणजी ट्रॉफ़ी के मैच फ़ीस के बराबर है।"
कभी अपने ख़र्चे पर अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलने जाने पर मजबूर मूक-बधिर खिलाड़ियों ने कोरोना के महामारी के समय काफ़ी कठिन दिनों का सामना किया। आर्थिक कमज़ोरी और बिना किसी समाजिक सुरक्षा के खिलाड़ी अपनी विकलांगता पेंशन पर ही गुज़ारा कर रहे थे। वीरेंद्र बताते हैं, "उस समय ख़र्च उठाने का सिर्फ़ पेंशन ही एकमात्र ज़रिया था और काफ़ी समय तक हम अभ्यास नहीं कर पाए थे। अभी भी चीज़ें उतनी नहीं बदली हैं और हम किसी तरह से ख़र्चे संभाल रहे हैं और घर का ही खाना खाते हैं।
"पहले हम अपने ख़र्चे पर [अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलने] जाते थे। बीसीसीआई से संबद्धिकरण के बाद अब हमें ख़र्च नहीं उठाना पड़ रहा है। बीसीआई और आईडीसीए ही खर्चों को [इस प्रतियोगिता में] देख रहे थे।
यूएई में पहली बार किसी मूक-बधिर टूर्नामेंट का लाइव प्रसारण हुआ था और इस पर कप्तान ने ख़ुशी जताई। हालांकि वह इस बात से थोड़े उदास थे कि जैसी समर्थन प्रमुख भारतीय टीमों को मिलती है उसके दसवें हिस्से में दर्शक मैच देखने नहीं आते। उन्होंने कहा, "हमारे मूक-बधिर दोस्त ही मैच देखने आते थे। एक-दूसरे की जान पहचान से आए हुए थे लेकिन संख्या उतनी बड़ी नहीं थी।
"पहले हमारा मैच लाइव नहीं आता था। लेकिन इस बार मैचों का लाइव प्रसारण किया गया तो पूरी दुनिया के हमारे मूक-बधिर दोस्तों ने देखा-समझा और बहुत सराहना की। हमें सोशल मीडिया पर भी ख़ूब बधाईयां मिली।"
वीरेंद्र ने आगे कहा, "बोर्ड को भी पता है कि हमने भारत का नाम रोशन किया है। हम भी उसी स्तर पर खेलते हैं जहां भारतीय क्रिकेट टीम खेलती है। हम चाहते हैं कि जिस तरह से उन लोगों को सम्मान और प्रोत्साहन दिया जाता है वैसा हमें दिया जाए ताकि हमारे जो पीछे आने वाले छोटे बच्चे हैं, जो बोल-सुन नहीं सकते हैं, जो पढ़ाई में पीछे हैं, वो स्पोर्ट्स में अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाएं और आगे बढ़ पाएं।"

कुणाल किशोर ESPNcricinfo हिंदी के एडिटोरियल फ़्रीलांसर हैं।