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चौथी पारी में असफल होने का क्या चक्कर है

भारतीय टीम पहली पारी में बढ़त लेने के बाद भी क्यों मैच हार रही है

एक बढ़िया लक्ष्य देने के बावजूद भारतीय टीम विदेशी धरती पर लगातार तीन टेस्ट हार चुकी है। पहले उन्होंने साउध अफ़्रीका के दूसरे एवं तीसरे टेस्ट में क्रमश: 240 और 212 का टारगेट दिया, जो पिच के हिसाब से एक मुश्किल लक्ष्य था। इसके बाद इंग्लैंड को भारत ने 378 रनों का लक्ष्य दिया और गेंदबाज़ इस स्कोर की रक्षा करने में असमर्थ नज़र आए। तीनों बार भारतीय गेंदबाज़ सिर्फ़ तीन-तीन विकेट ही झटकने में सफल हो पाए। इस तरह से मिल रही हार से भारतीय टीम चिंतित ज़रूर होगी। आइए देखते हैं कि इस दौरान भारतीय टीम से कहां चूक हो रही है।
क्या इस तरह से बड़े लक्ष्य का पीछा सिर्फ़ भारतीय टीम के ख़िलाफ़ हो रहा है?
साल 2022 में अभी तक कुल छह बार 200 से ज़्यादा के स्कोर को चेज़ किया गया है। अगर एक और बार ऐसा हो जाता है तो यह साल 2008 के सर्वकालिक रिकॉर्ड की बराबरी कर लेगा। जहां सात बार 200 से अधिक के स्कोर का पीछा किया गया था।
अगर टेस्ट क्रिकेट में सभी टीमों की चौथी पारी में औसत को देखा जाए तो 34.27 रन पर एक विकेट गिर रहा है। 2008 के बाद से यह सबसे बेहतरीन औसत है। यही नहीं 2014 से 2021 के बीच चौथी पारी में यह औसत 27.50 का रहा है।
2022 में अकेले इंग्लैंड ने अकेले चार बार ही 200 से ज़्यादा रनों का पीछा किया है। तीन बार न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ और एक बार भारत के ख़िलाफ़ उनकी टीम ने यह कारनामा किया है। इससे पहले कभी भी किसी टीम ने एक साल में टेस्ट क्रिकेट में 200 से ज़्यादा रनों को पीछा लगातार चार बार कभी नहीं किया था। हालांकि एक बात यह भी है कि इंग्लैंड ने जिन पिचों पर यह कारनामा किया वह बल्लेबाज़ी के लिए अच्छी थी।
भारत और न्यूज़ीलैंड की टीम ने 2021 में इंग्लैंड का दौरा किया था। जहां इंग्लैंड की टीम का प्रदर्शन कुछ ख़ास नहीं था। न्यूज़ीलैंड ने उस दौरान 1-0 से इंग्लैंड को हराया था और भारत के ख़िलाफ़ खेली गई पांच मैचों की सीरीज़ में इंग्लैंड 2-1 से पीछे था। हालांकि 2021 की तुलना में इस साल इंग्लैंड में मामला बिल्कुल अलग है। यहां की पिचें अब बल्लेबाज़ी के लिए मददगार है। साथ ही यहां जिन ड्यूक गेंदों का प्रयोग हो रहा है, वह 30 ओवर के बाद बल्लेबाज़ी के लिए काफ़ी आसान हो जाती हैं। इसके अलावा 2022 की इंग्लैंड टीम एक आक्रामक शैली के साथ अपने खेले को आगे बढ़ा रहा है।
क्या भारत को इशांत शर्मा की कमी खल रही थी?
पिछली तीन टेस्ट मैचों में भारत को जिस तरीक़े से हार मिली है। उसमें एक चीज़ काफ़ी कॉमन है- मोहम्मद शमी और बुमराह को दूसरे गेंदबाज़ों से सपोर्ट नहीं मिल रहा है। मोहम्मद सिराज साउथ अफ़्रीका के साथ खेले गए टेस्ट सीरीज़ के दौरान चोटिल हो गए थे। जोहान्सबर्ग में उन्होंने सिर्फ़ छह ओवर की गेंदबाज़ी की थी। केपटाउन में सिराज की जगह पर उमेश यादव को मौक़ा दिया गया था लेकिन उनका प्रदर्शन भी कुछ ख़ास नहीं था। वह चार की इकॉनमी से गेंदबाज़ी कर रहे थे। एजबेस्टन टेस्ट में तो शार्दुल ठाकुर और सिराज दोनों ही लगभग छह की इकॉनमी से गेंदबाज़ी कर रहे थे।
पिछले चार टेस्ट मैचों में शमी और बुमराह ने तेज़ गेंदबाज़ों के द्वारा की गई गेंदबाज़ी का लभभग 60 फ़ीसदी गेंदबाज़ी अकेले की है। इस दौरान सिर्फ़ यह दोनों ऐसे तेज़ गेंदबाज़ भी थे जिनकी इकॉनमी 3.5 से कम की थी।
जोहान्सबर्ग, केपटाउन और बर्मिंघम में, बुमराह और शमी के स्पेल के बाद भारत की गेंदबाजी में अक्सर शक्ति और नियंत्रण दोनों का अभाव दिखा। इस समय वे इशांत शर्मा की गेंदबाज़ी को याद कर रहे होंगे, जिन्होंने बुमराह और शमी के साथ खेले गए 14 टेस्ट मैचों में 20.46 के शानदार औसत और 2.56 की इकॉनमी से गेंदबाज़ी की। पिछले साल लॉर्ड्स टेस्ट में इशांत ने बढ़िया गेंदबाज़ी की थी लेकिन लीड्स में उनकी गति और सटीकता, दोनों में कमी आई थी।
इस बात का पता नहीं कि इशांत को लेकर भारतीय टीम क्या सोच रही है लेकिन यह ज़रूर पता है कि भारतीय टीम को उन्हें इशांत जैसे ही एक गेंदबाज़ की ज़रूरत है। उनके स्थान पर या तो सिराज को मौक़ा दिया जा सकता है या फिर प्रसिद्ध कृष्णा को भी आज़माया जा सकता है।
क्या तेज़ गेंदबाज़ों ने थोड़ा ज़्यादा आक्रमण कर दिया?
एजबेस्टन टेस्ट में इंग्लैंड की टीम ने ठीक उसी तरह से बल्लेबाज़ी की जैसा वह पिछले साल ओवल में कर रही थी। हालांकि दोनों मैचों का परिणाम बिल्कुल अलग था। दोनों मैचों में सलामी बल्लेबाज़ों ने शतकीय साझेदारी की। इसके बाद भारतीय टीम ने गुच्छों में विकेट लिया।
हालांकि ओवल में रॉरी बर्न्स और हसीब हमीद को 100 रन बनाने में 40.4 ओवर लगे थे और एजबेस्टन में ऐलेक्स लीस और ज़ैक क्रॉली ने 21.4 ओवर में 107 रन बना लिए थे। हालांकि एक बात यह भी है कि इंग्लैंड एजबेस्टन में एक नई बल्लेबाज़ी शैली के साथ खेल रही थी और पिच भी बल्लेबाज़ी के लिए मददगार थी। इसके अलावा भारतीय टीम की गेंदबाज़ी क्रम भी काफ़ी बदल चुका था।
ईएसपीएनक्रिकइंफ़ो के गेंद दर गेंद आंकड़ों के अनुसार द ओवल में पहले 30 ओवरों में भारत के तेज़ गेंदबाज़ ज़्यादातर गुडलेंथ( 63%) गेंद फेंक रहे थे। हालांकि एजबेस्टन में पहले 30 ओवरों में केवल 39 फ़ीसदी गेंद गुडलेंथ पर डाला। वह यहां लगातार अपनी लेंथ में बदलाव कर रहे थे, जिसमें शॉर्ट पिच से लेकर यॉर्कर तक शामिल था।
हालांकि एक बात यह भी है कि जब पिच पर गेंदबाज़ों के लिए मदद हो तो गुड लेंथ गेंदें डालना काफ़ी आसान है लेकिन जब पिच पर गेंदबाज़ों के लिए कुछ ख़ास नहीं हो तो उन्हें बदलाव करना पड़ता है। ओवल में बर्न्स और हमीद गुड लेंथ गेंदों के ख़िलाफ़ 1.61 की रन गति से रन बना रहे थे। वहीं एजबेस्टन में गुडलेंथ गेंदों पर इंग्लैंड के दोनों सलामी बल्लेबाज़ लगभग चार की रन गति से रन बना रहे थे।
क्या भारतीय बल्लेबाज़ों ने अपना काम पूरा किया?
कैपटाउन में ऋषभ पंत के शानदार शतक की बदौलत भारत ने बढ़त हासिल कर लिया था लेकिन तीसरी पारी में उनकी बल्लेबाज़ी पूरी तरह से धराशाई हो गई थी। उस दौरान भारतीय टीम चार विकेट के नुकसान पर 152 रन बना कर खेल रही थी इसके बाद 170 के स्कोर पर उन्होंने सात विकेट गंवा दिए।
एजबेस्टन में भी भारतीय टीम के साथ यही हुआ। पहली पारी में बढ़त लेने के बाद तीसरी पारी में भारतीय टीम तीन विकेट के नुकसान पर 153 बनाकर खेल रही थी और फिर 92 रनों के भीतर उसने अपने सात विकेट गंवा दिए।
कैपटाउन टेस्ट और एजबेस्टन टेस्ट की तीसरी में बस एक ही फर्क था। वहां ज़्यादातर बल्लेबाज़ शरीर से दूर गेंद को ड्राइव करने में आउट हो रहे थे और एजबेस्टन में ज़्यादातर बल्लेबाज़ शॉर्ट पिच गेंद के जाल में फंस रहे थे।
भारत के पास दोनों मौक़ों पर अपने विपक्षी टीम को मैच से बाहर करने का मौक़ा था लेकिन वह ऐसा करने में सफल नहीं हो पाए।

कार्तिक कृष्णास्वामी ESPNcricinfo सीनियर सब एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर राजन राज ने किया है।