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अत्याधुनिक और अद्भुत ऐंड्रयू साइमंड्स

यदि आईपीएल का इजात 10 साल पहले हो जाता तो वह कितने सफल होते?

Andrew Symonds biffs a straight six, Surrey v Kent, Friends Provident t20, The Oval, June 18, 2010

एक सड़क दुर्घटना में साइमंड्स का देहांत हो गया  •  PA Photos/Getty Images

ऐंड्रयू साइमंड्स एक बहुत ही अलग तरह के फ़ील्डर थे। अंदरूनी दायरे में वह शिकारी से कम नहीं थे। कवर में फ़ील्डिंग करते हुए उनकी असाधारण शक्ति और चपलता उन्हें एक अलग ही दर्जे पर रखती थी।
अपने करियर के आख़िर में एक बार वह माइक लगाकर फ़ील्डिंग कर रहे थे। उनकी बातों से उनके दिमाग़ के अंदर चल रही बातों का पता चला था। इससे पता चला था कि उनका मन, शरीर और जीतने की चाह मिलाकर कैसे उन्हें दायरे के अंदर सर्वश्रेष्ठ फ़ील्डर बनाती थी।
उनका मन उन्हें हमेशा कहता था कि अगर गेंद उनके पास आएगी तो वह हर वक़्त गेम में बने रहेंगे। अगर आप उनके तकनीकी और शारीरिक शक्ति के साथ तुलना करें तो शायद यह बात उनके बारे में सबसे भिन्न थी। कुछ खिलाड़ियों को अच्छा नहीं लगता अगर गेंद उनके पास आती रहे, लेकिन साइमंड्स के लिए ऐसा होना ज़रूरी था।
उनकी शारीरिक शक्ति और चपलता के तो क्या कहने। साइमंड्स अपने बड़ी शरीर के बावजूद बहुत तेज़ी से दिशा बदल सकते थे। ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका के प्रसिद्द बेसबॉल कोच माइक यंग को फ़ील्डिंग विशेषज्ञ के पद पर नियुक्त किया और उन्होंने साइमंड्स को अपनी फ़ील्डिंग को एक अलग स्तर पर ले जाने में मदद की।
फिर एक और पहलू था साइमंड्स का दिमाग़। वह अक्सर बल्ले का मुंह, बल्लेबाज़ के पसंदीदा एरिया और अपने अंतर्ज्ञान की बात करते थे। साइमंड्स गेंदबाज़ और बल्लेबाज़ का मन पढ़ते थे और तेज़ी से रन रोकते थे।
यह बस एक तरीक़ा है जिसके ज़रिए साइमंड्स हमेशा गेम और मैच की स्थिति से आगे रहते थे।
उन्होंने अपनी बल्लेबाज़ी में एक बड़ा बदलाव किया था और वह था हर गेंद पर तेज़ प्रहार ना करना। उनकी हिटिंग इतनी नैसर्गिक थी कि अगर वह अपनी तीन-चौथाई ताक़त का इस्तेमाल भी करते तो आसानी से सीमा रेखा पार कर सकते थे।
साइमंड्स के वनडे करियर के दौरान औसतन स्ट्राइक रेट 74 का था और हर 109 गेंदों पर एक छक्का लगता था। जबकि वह 92.5 के स्ट्राइक रेट से खेलते थे और हर 53 गेंद में एक छक्का लगाते थे। वनडे क्रिकेट में तेज़ परिवर्तन से पहले संन्यास लेने के बावजूद 5000 से ज़्यादा रन बनाने वालों की सूची में उनका स्ट्राइक रेट 11वे स्थान पर है।
सोच कर मज़ा आता है कि अगर ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें और आज़ादी से बल्लेबाज़ी करने दी होती तो क्या होता? साइमंड्स से तुलना करने लायक सिर्फ़ तीन ऐसे नाम हैं जिन्होंने 100 से अधिक के स्ट्राइक रेट से रन बनाए और वह थे शाहिद अफ़रीदी, वीरेंद्र सहवाग और एबी डीविलियर्स। साइमंड्स ने ख़ुद को 92 के स्ट्राइक रेट और 40 के औसत तक सीमित रखते हुए इस तिकड़ी से दो गुना ज़्यादा विश्व कप जीते और एक चैंपियंस ट्रॉफ़ी भी। दो विश्व कप और दो चैंपियंस ट्रॉफ़ी में उन्होंने 76 के औसत और 95 के स्ट्राइक रेट से रन बटोरे। सोचिए अगर ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें स्वछंद रूप से खेलने को कहा होता।
क्रिकेट का खेल तब अलग था। फ़्रैंचाइज़ी क्रिकेट तब तक इतनी बड़ी चीज़ नहीं बनी थी और इसलिए उन्हें ऑस्ट्रेलिया प्रबंधन की बात माननी पड़ी। फिर भी सायमंड्स को बांधना मुश्किल था क्योंकि उनकी सोच ही अलग थी। यही बात उनकी गेंदबाज़ी पर भी लागू होती थी। वह अपने मूड और टीम की ज़रूरत के हिसाब से दो तरह की गेंदबाज़ी कर लेते थे।
वह पहले हरफ़नमौला नहीं थे जो तेज़ गेंदबाज़ी और स्पिन दोनों कर लेते थे लेकिन उनकी गेंदबाज़ी में रणनीति अधिक स्पष्ट थी। उनकी ऑफ़ स्पिन की ताक़त थी उनकी सटीक दिशा और लंबाई और वह बल्लेबाज़ को बड़े शॉट लगाने से रोकने की सोचते थे। उनकी मध्यम तेज़ गेंद गति की गेंदें हल्के से लहराती थी और कभी-कभी सपाट पिच पर औरों से अधिक उछाल लेती थी। क्रिकेट जगत में 'मैच अप' शब्द लोकप्रिय होने से पहले ही यह उनकी गेंदबाज़ी पर लागू होता था। वह ऑस्ट्रेलिया के लिए संपूर्ण पांचवे गेंदबाज़ कभी भी नहीं बने लेकिन फिर भी 37 के औसत से 133 विकेट ले गए।
2016 तक टी20 क्रिकेट काफ़ी बदल चुका था और कोच 'ऑलराउंडर' शब्द की जगह बेसबॉल से प्रेरित होकर खिलाड़ियों को दो या तीन औज़ार वाले खिलाड़ी कहने लगे थे। साइमंड्स इतने अत्याधुनिक खिलाड़ी थे कि उनके पास चार औज़ार थे - बल्लेबाज़ी, ऑफ़स्पिन, मध्यम तेज़ गति की गेंदबाज़ी और फ़ील्डिंग।
शायद हम उनके सर्वश्रेष्ठ प्रारूप का सबसे कम मज़ा उठा पाए। 2003 में केंट के लिए उन्होंने पांच टी20 मैचों में 75 गेंदों पर 170 रन ठोके। अपने करियर के शिखर पर उन्होंने एक बार 16 मैचों में 260 गेंदों पर 44 के औसत से 529 रन बनाए। आईपीएल ऐसे वक़्त आया जब उनका वह शिखर समाप्त हो चुका था लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पहले सीज़न में शतक जड़ा और पहले दो साल 150 के स्ट्राइक रेट और 45.5 के औसत से रन बनाए।
उन्हें दो और सीज़न मिले और 2011 में उन्होंने 11 मैचों में 97 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए। उनकी बल्लेबाज़ी ढलने लगी थी लेकिन ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी को कोई कैसे ड्रॉप करता। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में इस प्रारूप में 32 के औसत और 147 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए। अगर टी20 क्रिकेट 2008 की जगह 1998 में सफल होता तो सोचिए साइमंड्स क्या प्रभाव डालते। वह टी20 क्रिकेट के अविष्कार से पहले ही टी20 खिलाड़ी थे। उन्होंने वह राह दिखाई जिस पर और नाम चलकर सफल हुए।
महान सफ़ेद गेंद खिलाड़ियों में एक धारावाहिकता नज़र आता है। जावेद मियांदाद से डीन जोंस को प्रेरणा मिली और वहां से रिकी पोंटिंग और विराट कोहली आए। एमएस धोनी में आप माइकल बेवन की परछाई देखेंगे और विव रिचर्ड्स का प्रतिरूप आपको डीविलियर्स में दिखेगा। उस लिहाज़ से साइमंड्स की छवि आपको कायरन पोलार्ड में दिखेगी।
साइमंड्स केवल एक सफ़ेद गेंद के सूरमा नहीं थे। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के लिए 26 टेस्ट एक ऐसे समय में खेले जब ऑस्ट्रेलियाई टीम में घुसना बहुत आसान नहीं था। इन मैचों में उन्होंने अक्सर शेन वॉटसन को बाहर रखते हुए 40.5 के औसत से रन बनाए और लगभग एक विकेट प्रति गेम भी लिया। उन्होंने 14 साल की प्रथम श्रेणी करियर में 40 सैंकड़े बनाए।
एक ग़लत धारणा है कि साइमंड्स सिर्फ़ एक स्लॉगेर थे। वह एक रोमांचक, अद्भुत, शक्तिशाली खिलाड़ी थे। वह एक अत्याधुनिक खिलाड़ी थे और ऐसे समय में खेले जब हमें मिडिल ओवर्स में सिंगल लेने वाले बल्लेबाज़ों और गेंद पर रिऐक्ट करने वाले गेंदबाज़ों और फ़ील्डरों को देखने की आदत थी।
उनको बल्लेबाज़ी करते देखना एक मिला जुला अनुभव था। उनकी प्रतिभा और उनका आक्रामकता आपको आंदोलित करता था लेकिन किसी भी वक़्त आउट होने का डर भी सताता था। यह बात हमेशा मन में रहता था कि जो हो रहा है बढ़िया है लेकिन यह वक़्त से पहले थम जाएगा। आज भी वही भावना मन में आई है लेकिन इसका खेद कहीं ज़्यादा है।

जैरड किंबर ESPNcricinfo में क्रिकेट लेखक हैं, अनुवाद ईएसपीएनक्रिकइंफ़ो हिंदी के प्रमुख देबायन सेन ने किया है