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लोग मेरी चोट के प्रति असंवेदनशील थे: अश्विन

अश्विन ने अपनी तकनीक, चोट और बल्लेबाज़ों को धराशाई करने की रणनीति करने के बारे में बात की

R Ashwin smiles, Manchester, September 5, 2021

मेरे चोट के प्रति लोगों की असंवेदनशीलता ने मुझे और गहरा जख़्म दिया : अश्विन  •  Glyn Kirk/AFP/Getty Images

रविचंद्रन अश्विन के बारे में सबसे अच्छी बात है कि वह हर सीरीज़ से पहले बल्लेबाज़ों को लेकर रणनीति बनाते हैं। वह कहते हैं कि उन्हें इसकी ज़रूरत हैं। वह मानते हैं कि उनका शरीर टीम के अन्य खिलाड़ियों की तरह तेज़ तर्रार नहीं है। साथ ही उनके करियर में उन्हे कई बार चोट का सामना करना पड़ा है। इसी कारणवश वह यह भी मानते हैं कि अगर क्रिकेट में उन्हें आगे बढ़ते रहना है तो मैदान पर उन्हें भाग्य के थोड़े अधिक सहारे की ज़रूरत है।
क्रिकेट मंथली के लिए इस साक्षात्कार का दिन तय करने में तकरीबन एक वर्ष का समय लगा था। जब अश्विन को न्यूज़ीलैंड सीरीज़ और साउथ अफ़्रीका दौरे के बीच कुछ दिन मिले, तो हम इस साक्षात्कार के लिए कुछ समय निकालने में क़ामयाब रहे, ताकि हम यह बात कर सकें कि वह किसी भी प्रतियोगिता के लिए कैसे तैयारी करते हैं। इस बातचीत के बाद कई ऐसी जानकारियां सामने आई जिससे हमें पता चला कि वह कैसे अपनी तकनीक पर काम करते हैं। साथ ही शीर्ष स्तर पर खेलने में सक्षम होने के लिए उन्हें अपने शरीर पर कितना काम करना पड़ता है।
जब शारीरिक तैयारी की बात आती है, तो 2017 और 2019 के बीच मैं पहली बार पेटेलर टेंडोनाइटिस नामक चोट की चपेट में आया था। ऐसा नहीं है कि आप इसके साथ नहीं खेल सकते हैं, लेकिन चोट की ख़ूबसूरती यह है कि आपके घुटने गर्म नहीं होंगे या कहें कि खेलने के लिए तैयार नहीं होंगे। सुबह के समय पैदल चलना भी बेहद दर्दनाक हो सकता है।
अश्विन अपनी इंजरी पर
मैं इस बात पर ध्यान देना चाहता हूं कि आप बड़ी सीरीज़ के लिए कैसे तैयारी करते हैं, क्योंकि मेरा मानना ​​है कि आप दुनिया के उन खिलाड़ियों में से हैं जो किसी भी सीरीज़ या मैच से पहले सबसे बेहतरीन और सटीक तैयारी करते हैं। मुझे याद है कि आपने एक बार कहा था कि स्वाभाविक रूप से चपल रवींद्र जाडेजा जैसे खिलाड़ी के लिए, एक दिन में 30 ओवर फेंकना और लंबे समय तक गेंदबाज़ी करना आसान होता है जबकि आप जैसे किसी खिलाड़ी को अपने शरीर से लड़ना पड़ता है। एक सीरीज़ के लिए आपकी तैयारी कब शुरू होती है?
मेरे अनुसार तैयारी के दो पहलू हैं। एक शारीरिक और दूसरा मानसिक एवं रणनीतिक। मुझे नहीं लगता कि लोग रणनीतिक चीज़ों पर पर्याप्त ज़ोर देते हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि रणनीतिक तैयारी अनिवार्य है, क्योंकि मैंने उस माहौल में भी क्रिकेट खेला है जहां लोग रणनीति पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपनी क्षमताओं और अपनी ताक़त पर भरोसा करना चाहते हैं।
जब शारीरिक तैयारी की बात आती है, तो 2017 और 2019 के बीच मैं पहली बार पेटेलर टेंडोनाइटिस नामक चोट की चपेट में आया था। ऐसा नहीं है कि आप इसके साथ नहीं खेल सकते हैं, लेकिन चोट की ख़ूबसूरती यह है कि आपके घुटने गर्म नहीं होंगे या कहें कि खेलने के लिए तैयार नहीं होंगे। सुबह के समय पैदल चलना भी बेहद दर्दनाक हो सकता है। दिन ढलते आपके घुटने ठीक से काम तो करेंगे, लेकिन आप हल्की दौड़ भी नहीं कर सकते। यह दर्द हमेशा आपके साथ रहता है।
यह सबसे पहले मेरे दाहिने पैर में हुआ। यह तब हुआ जब मुझे अपने रन-अप के आख़िरी समय में गेंद फेंकने के लिए छलांग लगानी पड़ती है। इस वक़्त आपको कुछ समय के लिए गेंद फेंकने से पहले एक पैर पर रहना होता है। इसी कारणवश यह और भी ज़्यादा दर्दनाक और चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यहां तक ​​कि अभ्यास करना भी मेरे लिए एक चुनौती के समान था। और अंततः अतिरिक्त भार के कारण मेरा बायां पैर भी प्रभावित हो गया।
इसके बाद मुझे एथलेटिक प्यूबल्जिया हुआ, जो मुझे लगता है कि पहली चोट के विस्तार के रूप में आया था। अब मेरे घुटने का बोझ पूरे शरीर को उठाना पड़ रहा था। इसके बाद मैने अलग-अलग एक्शन के साथ गेंदबाज़ी करना शुरू किया। एथलेटिक प्यूबल्जिया के कारण, हर बार साइड-ऑन स्थिति में आना कठिन होता था। फिर लगभग 10 ओवर के स्पेल के बाद, शरीर में कोई ऊर्जा नहीं बच रही थी। उसके बाद मुझे पेट में और जांघ में चोट लगी। एक के बाद एक चोट का सिलसिला जारी रहा। इन चोटों ने मेरे प्रदर्शन पर कई निशान छोड़े। भारत के क्रिकेट समुदाय में, चोटों के प्रति समझ और लोगों का इसके प्रति जो व्यवहार है, वह काफ़ी ख़राब है। स्पष्ट रूप से मेरी चोट के पीछे एक कारण था लेकिन लोगों को इसका पता लगाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हम सिर्फ़ यह दोहराते रहते हैं कि समस्या तो समस्या है, लेकिन इससे मुझे उस चोट का समाधान खोजने में मदद नहीं मिली।
मेरे बहुत सारे साथियों को चोट लगी लेकिन जब मैं चोटिल हुआ तो मामला थोड़ा अलग था। यह सिर्फ़ चोट मात्र नहीं था। मेरे चोट के प्रति असंवेदनशीलता थी जिसने मुझे और गहरा जख़्म दिया। मैं काउंटी क्रिकेट में यह सोचकर गया था, "मैं पूरा दिन मैदान पर टिक जाऊं और ख़ुद को चोट पहुंचाए बिना 25 ओवर गेंदबाजी करूं। क्योंकि अगर मैं काउंटी क्रिकेट में चोटिल होता हूं तो सवाल उठने शुरू हो जाएंगे।
कई बयान दिए गए थे कि मैं खेलना नहीं चाहता था या मैं किसी प्रतियोगिता से पीछे हट गया। यह ऐसी बात है जो हमेशा के लिए मुझे आहत करेगी। आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं, मुझे टीम से बाहर निकाल सकते हैं लेकिन मेरे इरादे या मेरे संघर्ष पर संदेह करना, इससे मुझे बहुत दुख हुआ।
किसी भी सीरीज़ में आने से पहले, मैं चार सप्ताह के प्रशिक्षण में जाता हूं। सुबह में मैं पूरी तरह से अपनी गतिशीलता और अपने चोटग्रस्त क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता हूं। फिर दो घंटे बाद, नाश्ता करने के पश्चात, मैं अपनी मांसपेशियों को मज़बूत करने पर काम करता हूं। शाम को मैं एक दिन दौड़ता हूं और दूसरे दिन अपने कौशल पर काम करता हूं।
इन चोटों के कारण मैं अलग-अलग एक्शन के साथ गेंदबाज़ी करने लगा। मैं इन सभी एक्शन में यह जांचने की कोशिश करता हूं कि मेरा शरीर उन सब में कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है। उदाहरण के लिए, यदि मैं लेग ब्रेक गेंदबाज़ी करता हूं, तो मेरे कंधे में एक तरफ़ से दर्द शुरू हो जाएगा क्योंकि दूसरा छोर का अधिक इस्तेमाल किया गया है। मैं इन सभी एक्शन में गेंदबाज़ी करता था ताकि मैं दर्द के बारे में पता लगा सकूं।
वैसे तो आदर्श तैयारी का समय छह सप्ताह है। अगर आपके पास छह हफ़्ते हैं, तो आप अपना ध्यान रखते हुए चार-पांच टेस्ट मैचों की सीरीज़ खेल सकते हैं। पिछले दो साल से मैं यह सुनिश्चित कर रहा हूं कि मैं हर सीरीज़ में एक निश्चित वज़न के साथ मैदान पर उतरूं और इसे बरक़रार रखूं।
कई बयान दिए गए थे कि मैं खेलना नहीं चाहता था या मैं किसी प्रतियोगिता से पीछे हट गया। यह ऐसी बात है जो हमेशा के लिए मुझे आहत करेगी। आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं, मुझे टीम से बाहर निकाल सकते हैं लेकिन मेरे इरादे या मेरे संघर्ष पर संदेह करना, इससे मुझे बहुत दुख हुआ।
आर अश्विन
क्या आप यह सब अपने निजी प्रशिक्षक की देखरेख में करते हैं?
जब मैं चोटों से जूझ रहा था, मैं जवाब तलाश रहा था कि मैं घायल क्यों हो रहा हूं। इसके बाद मैंने खु़द इस विषय का अध्ययन करना शुरू कर दिया क्योंकि चोट मेरे करियर और मेरे मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर भारी पड़ रही थी।
मैंने 2009 में बुनियादी स्तर पर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शुरू की थी। 2012 में राजमणि [एटी राजमणि प्रभु] मेरे घर आए और मुझसे कहा, "मैं आपका प्रशिक्षक बनना चाहता हूं और इससे आपको काफ़ी फ़र्क पड़ेगा।" 2012 से 2015 या 2016 तक वह टीम ट्रेनर सुदर्शन के साथ तालमेल बैठाकर मेरे लिए सब कुछ करते थे। फिर जब शंकर बसु भारत के प्रशिक्षक बने, उनकी तकनीक बिल्कुल अलग थी। और जब आपके पास भारतीय टीम का ट्रेनर है जो कुछ अलग चीज़ें कर रहा है, तो बेहतर है कि आप उन नियमों का पालन करें। यह सभी के लिए आसान है।
हालांकि आख़िरकार मैं राजमणि के पास वापस चला आया। मैंने उसके साथ दो साल तक प्रशिक्षण नहीं किया था। उस दौरान उन्होंने भी एक बेहतर ट्रेनर बनने के लिए पढ़ाई की। उन्होंने मूल रूप से बसु की कुछ कार्यप्रणाली को पकड़ लिया था। मुझे उससे कहना पड़ा, "मैं नहीं चाहता कि तुम वही करो जो बसु मेरे लिए करते हैं। जो तुम मेरे लिए करते हो वही करो।" इस तरह मैं वापस सही रास्ते पर आया। मैं राजमणि और बसु का बहुत आभारी हूं।
क्या आपको कभी ऐसा लगा, "मैं लंबे समय तक क्रिकेट नहीं खेल सकता"?
2018 और 2020 के बीच कई बार मेरे मन में ख़्याल आया है कि अब मुझे इस खेल को त्याग देना चाहिए। मुझे लगता था कि मैं अपनी तरफ़ से कोशिश तो भरपूर कर रहा हूं लेकिन इसका फल मुझे नहीं मिल रहा है। विशेष रूप से एथलेटिक प्यूबल्जिया और पेटेलर टेंडोनाइटिस के साथ - मैं छह गेंदें फेंकने के बाद हांफने लगता था। इसके बाद मेरा पूरा शरीर मानो दर्द से टूटने लगता था। जब घुटने का दर्द तेज़ होता, तो अगली गेंद पर मेरी जंप (कूदना) भी कम हो जाता था। जब मैं कम कूदता था, तो कंधों और पीठ के ज़रिए मुझे ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ता था। और फिर ऐसा करने से मैं और भी तकलीफ़ में ख़ुद को डाल देता था। यही वह समय था जब लगता था कि अब मुझे इस खेल से ब्रेक ले लेना चाहिए।"
मैंने कई कारणों से खेल छोड़ देने के बारे में सोचा। मुझे लगा कि लोग मेरी चोटों के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं थे। मुझे लगा कि बहुत सारे लोगों का समर्थन किया गया है लेकिन मेरा नहीं। ऐसा नहीं है कि मैंने टीम के लिए कम योगदान दिया है। मैंने टीम के लिए बहुत सारे मैच जीते हैं और मुझे ऐसा लगा कि मुझे उस तरह का समर्थन नहीं मिल रहा है। मैं आमतौर पर किसी से भी मदद की अभिलाषा नहीं रखता। मुझे लगा कि मैं उत्कृष्ट नहीं हो पा रहा था और मुझे लगा कि मुझे सहारे की ज़रूरत है। मैंने सोचा कि शायद मुझे कुछ और करना चाहिए।
ऐसा कब हुआ था?
"2018 में इंग्लैंड श्रृंखला के ठीक बाद और फिर उसी साल ऑस्ट्रेलिया में सिडनी टेस्ट से पहले और एडिलेड टेस्ट के बाद मेरे मन में संन्यास की बात आई। मैं जिस एकमात्र व्यक्ति से बात कर रहा था वह मेरी पत्नी थी। लेकिन मेरे पिता को मुझपर काफ़ी भरोसा था, वह यही कहते थे कि तुम सीमित ओवर क्रिकेट में फिर वापसी करोगे। उनकी इन बातों ने मुझे प्रेरित किया और मैंने अपना इरादा बदल दिया।"
लोग विदेशी सीरीज़ में आपके चोटिल होने के बारे में काफ़ी बात करते थे
लोग शायद अन्य क्रिकेटरों के साथ ऐसी मिसालों के बारे में जानते हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि मुझे निशाना बनाया गया। शायद उन्हें विश्वास था कि वे ऐसा करने में सही थे। मुझे इससे कोई दिक़्क़त नहीं है। लेकिन चोटें लोगों को लगती हैं। इसमें कुछ विशेष नहीं है। उन्हें तब बुरा लगता है जब उनके पास लोगों की सहानुभूति नहीं होती है। मुझे लगता है कि एक क्रिकेट समुदाय के रूप में भारतीय क्रिकेट में सहानुभूति की इसकी कमी है।
आपने राजमणि के साथ ट्रेनिंग करने के बारे में फिर से कब सोंचा
वह मैंने 2019 में ऑस्ट्रेलियाई श्रृंखला के अंत में सोचा था। मैं साउथ अफ़्रीका की घरेलू सीरीज़ से पहले काउंटी क्रिकेट खेलने गया था। राजमणि और मैंने उससे पहले लगभग आठ से 10 सप्ताह तक बड़े पैमाने पर काम किया। वह अपने कार्य में बहुत ही निपुण हैं। उन्होंने 2019 आईपीएल के दौरान मेरे साथ यात्रा की थी। शारीरिक रूप से खु़द को तैयार करने के लिए यह एक अंतिम प्रयास था। मेरा मानना ​​था कि अगर मैं शारीरिक रूप से ठीक हूं तो मुझे कोई नहीं रोक सकता। अन्यथा कम से कम मैं पीछे मुड़कर देखते हुए ख़ुद को यह कह सकता हूं, "जानते हैं, मैंने इस खेल को सब कुछ दिया है।" और इसलिए मेरा मानना ​​है कि एक अंतिम बार प्रयास करना महत्वपूर्ण था।
अगर मुझे आकर उसकी ख़ुशी और टीम की सफलता में शामिल होना था , तो मुझे ऐसा महसूस होना चाहिए कि मैं उनका हिस्सा हूं। अगर मुझे लगता है कि मुझे नीचे गिराया जा रहा है, तो मैं कैसे उठकर टीम या टीम के साथी की सफलता का आनंद लेने के लिए पार्टी में जाता? और फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। इसके बाद मैंने सहज महसूस किया और टीम की सफलता का पूरी तरह से आनंद लिया।
आर अश्विन
जब कुलदीप यादव ने सिडनी में पांच विकेट लिए, रवि शास्त्री ने कहा था कि वह विदेश में भारत के नंबर 1 स्पिनर हैं। उस दौरान उन्होंने कहा : "हर किसी के लिए एक समय होता है।" मुझे ऐसा लगा कि उनका कहना था कि किसी और का समय आ कर चला गया था। इसका आप पर कोई प्रभाव पड़ा?
मैं रवि भाई का बहुत सम्मान करता हूं। हम सब करते हैं। उस पल में, हालांकि, मैने बहुत हताश हुआ। हम सभी इस बारे में बात करते हैं कि अपने साथियों की सफलता का आनंद लेना कितना महत्वपूर्ण है। और मैं कुलदीप के लिए ख़ुश था। मैं कभी ऑस्ट्रेलिया में एक पारी में पांच विकेट हासिल नहीं कर पाया लेकिन उसने यह कर दिखाया था। मुझे पता है कि यह कितना बड़ा पल है। यहां तक ​​​​कि जब मैंने [अन्य समय] अच्छी गेंदबाज़ी की है, तब भी मैं पांच विकेट नहीं ले सका। इसलिए मैं उसके लिए ख़ुश था। और ऑस्ट्रेलिया में जीत हासिल करना बेहद खु़शी का मौक़ा था।
लेकिन अगर मुझे आकर उसकी ख़ुशी और टीम की सफलता में शामिल होना था , तो मुझे ऐसा महसूस होना चाहिए कि मैं उनका हिस्सा हूं। अगर मुझे लगता है कि मुझे नीचे गिराया जा रहा है, तो मैं कैसे उठकर टीम या टीम के साथी की सफलता का आनंद लेने के लिए पार्टी में जाता? और फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। इसके बाद मैंने सहज महसूस किया और टीम की सफलता का पूरी तरह से आनंद लिया।
हालांकि आपने पहला टेस्ट जीतने में एक अहम भूमिका निभाई थी।
पहला टेस्ट तब तक दूर की याद जैसा लग रहा था। सस्ते में आउट होने के बाद मैंने पहली पारी में पहले चार में से तीन विकेट लिए थे, और फिर जब अंतिम पारी में पिच सपाट हो गई थी, तो मैंने 50 से अधिक ओवर किए और तीन विकेट लिए। इसके बाद मुझे पेट में काफ़ी दर्द हुआ। मेरे दिमाग में यह था कि मैंने असहनीय दर्द में टीम के लिए कुछ अच्छा किया था, लेकिन मैंने बस इतना ही सुना, "नेथन लायन ने छह विकेट लिए और अश्विन ने तीन।" वैसे भी, जब मैं अच्छी गेंदबाज़ी फ़ॉर्म में था तब मैं अपने शरीर से निराश था। ये तुलनाएं और आक्षेप मुझे नहीं चाहिए था। उस प्रतिक्रिया और सिडनी के बीच, ऐसा लगा कि मैंने कोई भूमिका निभाई ही नहीं है।
सिडनी के बाद उन टिप्पणियों के बारे में, वह कह सकते हैं, "ओह, यह उसे प्रेरित करने का तरीक़ा था।" हमने ऋषभ पंत के साथ ऐसा देखा है।
प्रेरणा उन लोगों के लिए है जिन्हें इसकी आवश्यकता है। लेकिन जब कोई जीवन के कठिन दौर से गुज़र रहा होता है और उसे अपने कंधे पर एक हाथ की ज़रूरत होती है... वह मेरे जीवन का एक कठिन दौर था।
मैंने कई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में हिस्सा लिया है जहां चोटिल खिलाड़ियों का बचाव किया गया। उस ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला में, प्रत्येक मैच से पहले यह घोषणा करने के लिए एक बिंदु बनाया गया था कि आर अश्विन एक और फ़िटनेस टेस्ट में विफल हो गए। जो भारतीय क्रिकेट के लिए काफ़ी अजीब था। अगली बार आपने साउथ अफ़्रीका के ख़िलाफ़ घर पर टीम इंडिया का प्रतिनिधित्व किया। आप जरूर घबरा गए होंगे।
क़रीब आठ-दस महीने तक मैं बहुत घबराया हुआ था। एथलेटिक प्यूबल्जिया एक ऐसी चीज़ है जिसे आप हर समय महसूस करते हैं, जैसे पेट के आसपास या शरीर के किसी और हिस्से के पास। मैं सोचता था कि "क्या यह चला गया है? क्या मुझे इसका किसी और तरीक़े से इलाज करवाना चाहिए? क्या मुझे इसके लिए पेट में पट्टे का प्रयोग करना चाहिए?"
मुझे लगता है कि मेरी आत्म-जागरूकता बहुत अधिक है। और मैं बहुत सोचता हूं। तो यह मेरे लिए और भी कठिन था। यदि आप घायल हो जाते हैं, और आप वापस ठीक हो रहे हैं, तब भी यह आपके दिमाग में रहेगा। लेकिन अगर आप घायल हो जाते हैं और उस तरह के मानसिक आघात से गुज़रते हैं, तो यह और भी मुश्किल है। हालांकि मैं जीवन की प्रतिकूलताओं का सामना करने के लिए बहुत अच्छी तरह से तैयार हूं।
यह एक मनोवैज्ञानिक बात बन गई थी। मैं अपने जीवन में कभी भी असफलता से नहीं डरा हूं। इसलिए मैदान पर उतरना और प्रदर्शन के मामले में असफल होना ठीक है। जैसा कि एमएस धोनी ने हमेशा कहा, यह प्रक्रिया बनाम परिणाम है। मुझे विश्वास है कि मैंने निश्चित रूप से इस प्रक्रिया का तोड़ निकाल लिया है। और मुझे लाखों या अरबों लोगों के सामने असफल होने का डर नहीं है। कम से कम मुझे वहां (मैदान पर) जाने और सफल या असफल होने का [अवसर] मिला है, जो अधिकत्तर लोगों को नहीं मिलता है।
आपने इस मानसिक आघात का सामना कैसे किया?
मुझे एक गुरु मिला है जिसका मैं ऋणी हूं।
जब आप इस चीज़ से गुज़रते हैं तो सबसे पहले आप खु़द को पीड़ित महसूस करते हैं। यह सबसे आसान, सबसे मानवीय चीज़ है जो आप कर सकते हैं। एक बार जब आप उस तरह की भावना से गुज़रते हैं, तो आपको बहुत स्पष्टता मिलती है। ऐसे कई लोग हैं जिन्हें आप दोष दे सकते हैं। लेकिन अगर आप के अंदर काम करते रहने की दृढ़ता और इच्छाशक्ति है, तो आप लोगों की बाधाओं से अपने आप पार हो जाएंगे।
मैं अपने जीवन में कभी भी असफलता से नहीं डरा हूं। इसलिए मैदान पर उतरना और प्रदर्शन के मामले में असफल होना ठीक है। जैसा कि एमएस धोनी ने हमेशा कहा, यह प्रक्रिया बनाम परिणाम है। मुझे विश्वास है कि मैंने निश्चित रूप से इस प्रक्रिया का तोड़ निकाल लिया है।
आर अश्विन
तो जैसे रवि भाई के मामले में हुआ था, मुझे पता है कि इस तरह के अनुभव वाले बहुत से लोग उस तरीक़े के बयान को या किसी भी घटना को जीवन भर कोसेंगे या अपने ख़िलाफ़ समझेंगे, लेकिन मैं उनमें से नहीं हूं। मैं मेज पर बैठकर इसके बारे में बातचीत करने में प्रसन्न हूं। क्योंकि ग़लती कोई भी कर सकता है। इसलिए मैंने चीज़ों को लोगों से परे देखना शुरू कर दिया है। लोग अपनी राय बदल सकते हैं। लोग आज बुरे तो कल अच्छे भी हो सकते हैं। जब तक आप लोगों को देख सकते हैं कि वे क्या हैं, कैसे हैं और साथ उन्हें संदेह और सहानुभूति का लाभ दे सकते हैं, तब तक आप ठीक रहेंगे।
यह कोई आध्यात्मिक या मानसिक शब्दजाल नहीं है जो मैं दे रहा हूं। मैं सच में ऐसा ही हूं।
आप यह नियंत्रित नहीं कर सकते कि लोग आपके साथ क्या करते हैं, हालांकि लोगों के प्रति आप अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित ज़रूर कर सकते हैं।
बिल्कुल। देखिए, जब आप गिराए जाते हैं, तो क्या यह आपके वश में होता है? नहीं, यह किसी और की पसंद है। तो क्या मैं इसे उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ रखूंगा जिसने मुझे ड्रॉप किया या मेरा साथ नहीं दिया है? आप सभी जानते हैं कि वह व्यक्ति टीम के हित में ही फ़ैसला लेता है। और मैं इसे व्यक्तिगत बनाना नहीं चाहता हूं।
हां। उनका काम भी भारत की जीत पर निर्भर करता है। इसलिए वह वही करेंगे जो उन्हें भारतीय टीम के लिए सही लगता है।
वह जो कुछ भी मानते हैं, चाहे वह सही हो या ग़लत, मुझे इस विषय पर चर्चा करने में खु़शी होती है क्योंकि मुझे विश्वास है कि मैं भी भारत को मैच जीता सकता हूं। लेकिन जब आप बातचीत करेंगे तभी मुझे पता चलेगा कि मैं किस छोर पर खड़ा हूं। जैसे अगर मुझे टीम से बाहर करने के पीछे कोई वास्तविक कारण है, और निर्णय लेने वालों और खिलाड़ी के बीच संवाद और बातचीत है, तो यह व्यक्तिगत नहीं है, यह निर्णय का सवाल है। लेकिन जब संवाद नहीं हो रहा है, तो मेरे दिमाग में कई प्रश्न उठेंगे।
हमने पिछले डेढ़ साल में एक शांत अश्विन को देखा है। क्या आपने महामारी के दौरान इस तरीक़े के व्यवहार को विकसित किया है?
इसकी शुरुआत काफ़ी पहले हुई थी। मैंने एक मानसिक कंडीशनिंग कोच के साथ चार से छह महीने तक काम किया। उसने मानसिक रूप से मेरी मदद की, वह थोड़ी देर के लिए मेरे लिए एक दर्पण था।
जब भी आप किसी से बात करते हैं या जब आप एक अशांत समय से गुज़र रहे होते हैं, तो अधिकत्तर लोग आपको बताएंगे कि आप कैसे बेहतर हो सकते हैं, ग़लती आपकी तरफ़ से कैसे हो सकती है, बजाय इसके कि किसी और ने क्या ग़लत किया है, इसके बारे में बताया जाए।
अब ये दोनों दृष्टिकोण ग़लत हैं। यही है जो मुझे महसूस होता है। जब कोई आपके पास मदद के लिए आए, तो उन्हें मत बताना कि वे ग़लत हैं, उन्हें यह मत बताना कि दूसरा व्यक्ति ग़लत है। आपको बस उनकी बात सुनने और उन्हें एक अलग दिशा में ले जाने की ज़रूरत है। उस कोच ने यही किया। मैंने उनसे पहली बातचीत की, मैंने कहा, "बॉस, अगर आप भी यह कहने जा रहे हैं कि मैं ही दोषी हूं, तो मैं ऐसा नहीं करना चाहता। क्योंकि मैंने इसे जीवन भर सुना है और इसके लिए मेरे पास समय नहीं है।" उसने कहा, "ठीक है, ठीक है, चिंता मत करो, मैं तुम्हें एक प्रश्नावली भेजूंगा, बस उसे भर दो।" तो उसने इसे एक अलग दिशा में ले लिया। और हां, यह कारगर रहा।
तो वह समाधान-उन्मुख था? जैसे, आप यहां से कैसे आगे सकते हैं?
बिल्कुल। हमें यही तो चाहिए, है ना? हर किसी को समस्या होती है, और हर कोई आप पर समस्याएं फेंकता है। बहुत कम लोग होते हैं जो समाधान तलाशते हैं। और भी कम लोग हैं जो आपको समाधान देंगे।
वह कह रहा है, क्या हुआ, क्या ग़लत हुआ, इसके बारे में सोचने के बजाय, आइए सोचें कि जो बचा है उसे हम कैसे ठीक कर सकते हैं?
उन्होंने स्पष्ट रूप से ऐसा कभी नहीं कहा। लेकिन अब मुझे लगता है कि वह चाहता था कि मैं ऐसा ही सोचूं। चिकित्सा के माध्यम से उन्होंने कभी नहीं कहा, "यह आदमी ग़लत है और तुम सही हो" या "तुम ग़लत हो और वह सही है।" उसने एक अलग रोशनी डाली। उसने सुना और मुझे एहसास दिलाया कि आप सभी के साथ समान स्तर पर संवाद नहीं कर सकते हैं।
पहले मैं जो कुछ भी महसूस करता था, मैं बस कह देता था और आगे बढ़ जाता था क्योंकि इससे मेरा दिल हल्का हो जाता था। लेकिन मेरे बोलने के तरीक़े से कोई और आहत भी हो रहा था।
नोट - यह साक्षात्कार का पहला भाग है। दूसरा भाग भी जल्द प्रकाशित किया जाएगा।

सिद्धार्थ मोंगा ESPNcricinfo के अस्सिटेंट एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर राजन राज ने किया है।