क्या आर अश्विन को ना खिलाना एक साहसी और समझदारी वाला निर्णय था?

मेज़बान टीम के कप्तान द्वारा टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने के फ़ैसले के बाद मैदान पर मौजूद लोगों को यह एक सवाल खाए जा रहा था। अश्विन अपने करियर के सबसे बढ़िया दौर से गुज़र रहे हैं। साथ ही जून में विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (डब्ल्यूटीसी) फ़ाइनल मैच के बाद सरे के लिए खेलते हुए उन्होंने एक काउंटी मैच भी खेला। उस मैच की दूसरी पारी में उन्होंने 6 विकेट अपने नाम किए थे।

डब्ल्यूटीसी फ़ाइनल में अश्विन तीन तेज़ गेंदबाज़ और रवींद्र जाडेजा के साथ पांच सदस्यीय गेंदबाज़ी समूह का हिस्सा थे। साउथैंप्टन में तेज़ गेंदबाज़ी के लिए अनुकूल परिस्थितियों में दो स्पिनरों को खिलाना अपने आप में एक संदिग्ध कदम था। भारत का मानना था कि अश्विन और जाडेजा बल्लेबाज़ी करने में सक्षम है जो उन्हें अपने सर्वश्रेष्ठ टीम संतुलन के साथ जाने की अनुमति देता है। कई लोग इस बात से असहमत थे।

उस समय यह सवाल उठाया गया था कि क्या शार्दुल ठाकुर न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ दो स्पिनरों में से किसी एक के बजाय एक बेहतर विकल्प हो सकते थे? उन्होंने जनवरी में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ ब्रिस्बेन की शानदार जीत में बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी से सबको प्रभावित किया था। उस सवाल का जवाब पहले टेस्ट मैच के पहले दिन दिया गया जब भारत ने अश्विन को बाहर बैठाकर उनकी जगह ठाकुर को टीम में शामिल किया। रवींद्र जाडेजा इस टीम में एकमात्र स्पिनर है।

ट्रेंट ब्रिज लंबे समय से तेज़ गेंदबाज़ों के लिए मददगार रहा है। यह देखते हुए भारत टीम द्वारा यह एक साहसी कदम था। एक और कारण यह भी हो सकता है कि पहले टेस्ट मैच के दौरान बारिश आने की संभावना है। अब सवाल यह था कि क्या यह चार तेज़ गेंदबाज़ अपनी योजनाओं को अंजाम दे सकते हैं?

पहले ओवर से ही गेंदबाज़ अपने काम पर लग गए। जसप्रीत बुमराह की पहली चार गेंदों रोरी बर्न्स को छोड़ती हुई बाहर निकली। हर गेंद के साथ बुमराह बर्न्स के करीब आ रहे थे। वह चाहते थे कि बर्न्स ज़्यादा से ज़्यादा गेंदों को खेले। उसके बाद पांचवीं गेंद को गुड लेंथ से अंदर की ओर स्विंग करवाकर बुमराह ने बर्न्स को विकेटों के सामने फंसाया और एलबीडब्ल्यू आउट किया। हवा में अपनी एक मुक्का मारते हुए बुमराह ने एक ज़ोरदार चीख निकाली जिसने भारतीय खिलाड़ियों के लिए खेल की गति और मूड सेट कर दिया।

अगले ओवर में शमी की पहली गेंद चौथे स्टंप पर पड़ी, कांटा बदला और बाहर निकली। भले ही सिबली ने उस गेंद से कोई छेड़छाड़ नहीं की, पहले विकेट के बाद भारतीय फ़ील्डरों में इतनी ऊर्जा बढ़ गई थी कि कोई चुप नहीं बैठ रहा था। सब अपने गेंदबाज़ को प्रोत्साहन दे रहे थे। सीधी सीम के साथ गुड लेंथ से गेंदों को दोनों तरफ सीम करवाकर बल्ले के बाहरे किनारे की लगातार पर परीक्षा लेना - यह हालिया वर्षों में शमी के काम करने का तरीक़ा है। कल भी हमे यही सब देखने मिला, सिवाय इसके कि उन्हें अपनी लाइन और लेंथ ठीक करने में थोड़ा समय लगा।

ईएसपीएनक्रिकइंफ़ो के गेंद-दर-गेंद आंकड़ों के अनुसार, लंच से पहले सात ओवर के पहले स्पेल में, शमी की 71% गेंदें गुड या फ़ुल लेंथ पर हुई थी। भोजन के बाद यह आकंड़ा 77% तक बढ़ गया। फ़ुल लेंथ की गेंदों में भी 11% की बढ़ोतरी हुई। शमी की इस रणनीति ने तुरंत असर दिखाना शुरू किया और भारत को तीन विकेट दिलाए।

एक टप्पे पर लगातार सटीक गेंदबाज़ी करने की कला बुमराह का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने लगातार स्टंप्स पर हमला किया और बल्लेबाज़ों को गेंद खेलने पर मजबूर किया। अपनी आउटस्विंग, इनस्विंग और तेज़ यॉर्कर से उन्होंने लगातार बल्लेबाज़ों को परेशान किया। जॉस बटलर को बुमराह की गेंदों को समझने में इतनी मुश्किल हो रही थी कि अंततः शरीर से दूर जाती गेंदों पर वह ड्राइव करने लगे। दूसरे छोर पर जो रूट भाग्यशाली रहे कि उन्होंने बुमराह को अपना विकेट तोहफ़े में नहीं दिया।

बटलर ने फरवरी में भारत दौरे के दूसरे टेस्ट के बाद कोई प्रथम श्रेणी मैच नहीं खेला था। वह द हंड्रेड के कुछ मैच खेलकर आ रहे थे। उनकी मानसिकता करो या मरो की थी। 18 गेंदों में अपना खाता खोले बिना वह ऋषभ पंत को एक आसान कैच थमाकर वापस पवेलियन लौट गए।

रूट को छोड़कर इंग्लैंड के सभी बल्लेबाज़ों को बुमराह और शमी के ख़िलाफ़ परेशानी हुई। बुमराह की गेंदबाज़ी पर इंग्लैंड के बल्लेबाज़ केवल 66.7% प्रतिशत नियंत्रण में थे और शमी की गेंदों पर 72.7%। पहले दिन के खेल के बाद प्रेस से बातचीत के दौरान जब शमी से पूछा गया कि सब कुछ करने के बावजूद उन्हें इंग्लैंड में विकेट क्यों नहीं मिल रहे हैं, तो वह हंस पड़े। साल 2014 और पहले दिन लंच के बीच इंग्लैंड में शमी और बुमराह ने प्रति विकेट क्रमशः 18.96 और 18.87 गलत शॉट खेलने पर मजबूर किया। इस अवधि में विदेशी गेंदबाज़ों की सूची में वह दोनों सबसे ऊपर है। लंच के बाद दोनों ने बल्लेबाज़ों को परेशान करना जारी रखा और तीत-तीन विकेट झटके।

कुल मिलाकर भारत ने इंग्लैंड बल्लेबाज़ों को 390 में से 115 गेंदें खेलने पर मजबूर किया। भारतीय गेंदबाज़ी कोच भरत अरुण सिराज और ठाकुर के प्रदर्शन के ख़ुश होंगे, जो पहली बार इंग्लैंड में टेस्ट मैच खेलते हुए ड्यूक गेंद के साथ गेंदबाज़ी कर रहे थे। स्टंप्स पर स्काई स्पोर्ट्स से बात करते हुए ठाकुर ने कहा कि दिन भर बदलती परिस्थितियों में ख़ुद को ढ़ालना मुश्किल था क्योंकि सूरज बादलों के साथ आंख मिचौली खेल रहा था। इस दौरान अपनी लाइन और लेंथ को सटीक रखना और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। शमी ने बताया कि गेंद कई बार सतह को पकड़ रही थी और धीमी गति से जा रही थी।

ठाकुर के पास गति नहीं है लेकिन वह गेंद को हवा में आसानी से बाहर निकाल सकते हैं। उन्होंने लगातार ऐसा किया ताकि वह बल्लेबाज़ों को शॉट लगाने के लिए लुभा सकें क्योंकि विराट कोहली ने एक्स्ट्रा कवर क्षेत्र को खाली छोड़ा था। बाद में वह स्टंप्स में गेंदबाज़ी करने लगे जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने एक फ़ुल गेंद पर जो रूट को विकेटों से सामने फंसाया।

सिराज ने भी लंच से पहले ठीक ऐसा ही किया था। एक ही ओवर में उन्होंने गेंद को अंदर लाकर दो बार ज़ैक क्रॉली के डिफ़ेंस को भेदा - दोनों बार कप्तान कोहली ने रिव्यू लिया और दूसरी बार कामयाब भी रहे।

भारतीय टीम प्रबंधन को अतीत में विदेशी दौरों पर खराब टीम चयन का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है - लॉर्ड्स 2018, साउथ अफ़्रीका में 2017-18 के पहले दो टेस्ट जब उन्होंने अजिंक्य रहाणे को टीम से बाहर रखा था और डब्ल्यूटीसी फ़ाइनल भी। बशर्तें आज पिच और परिस्थितियों का उनका आकलन सही रहा और तेज़ गेंदबाज़ों की चौकड़ी इंग्लैंड पर हावी रही।

भारत ने विदेशों में लंबे समय से चली आ रही एक और समस्या पर भी ध्यान दिया - विशेषज्ञ बल्लेबाज़ों के ख़िलाफ़ कड़ी मेहनत करने के बाद निचले क्रम को जल्दी से समेटना। यह एक महत्वपूर्ण कारण था कि भारत 2018 में सीरीज़ जीतने में विफ़ल रहा था जब इंग्लैंड के निचले क्रम ने एजबेस्टन के पहले टेस्ट में और फिर ऐजेस बोल के चौथे टेस्ट में टीम को वापसी करवाई थी।

पहले दिन भारत के चार तेज़ गेंदबाज़ इंग्लैंड को राहत की सांस लेने का मौका देने के मूड में नहीं थे। वह लगातार बल्लेबाज़ों को मुश्किल में डालकर सफलताएं अर्जित कर रहे थे।

आंकड़े एस राजेश द्वारा। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर अफ़्ज़ल जिवानी ने किया है।