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दीपक हुड्डा के शून्य से शिखर तक के सफ़र में इरफ़ान पठान की भूमिका

एक साल पहले हुड्डा के पास घरेलू क्रिकेट में कोई टीम तक नहीं थी

इस साल घरेलू सीज़न शुरू होने से पहले हुड्डा ने पठान बंधुओं के साथ तैयारी की थी  •  Sam Barnes/Sportsfile/Getty Images

इस साल घरेलू सीज़न शुरू होने से पहले हुड्डा ने पठान बंधुओं के साथ तैयारी की थी  •  Sam Barnes/Sportsfile/Getty Images

जब फ़रवरी 2021 में बड़ौदा कप्तान क्रुणाल पंड्या के साथ कहासुनी के बाद बड़ौदा क्रिकेट संघ (बीसीए) ने दीपक हुड्डा को कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया था तो उन्होंने क्रिकेट छोड़ने की ठान ली थी। उनका आईपीएल जीवन 2015 में एक ज़बरदस्त डेब्यू सीज़न के बाद अपेक्षाकृत ऊंचाइयों को नहीं छू पाया था। कोरोना के चलते भारतीय घरेलू क्रिकेट पर अनिश्चितता का साया मंडरा रहा था। "हरिकेन हुड्डा" जैसी सुर्ख़ियां जैसे इतिहास का हिस्सा बन कर रह गई थीं।
हुड्डा को मदद की ज़रूरत थी। ऐसे में उन्हें पूर्व भारतीय ऑलराउंडर और बड़ौदा के पूर्व कप्तान इरफ़ान पठान का सहारा मिला। बड़ौदा छोड़ने के उनके फ़ैसले पर इरफ़ान ने उन्हें बैक किया और बीसीए के "घिनौने और निराशाजनक" निर्णय पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने हुड्डा से बस इतना कहा, "अपना टाइम आएगा।"
इस साल के फ़रवरी में इरफ़ान कहीं बाहर थे और अच्छी नेटवर्क ढूंढ रहे थे। उन्हें अहमदाबाद में वेस्टइंडीज़ में हुड्डा को अपना इंडिया कैप कोच राहुल द्रविड़ के हाथों मिलते देखना था। अपना टाइम सच में आ गया था।
इरफ़ान कहते हैं, "ऐसा लगा जैसे मैं फिर से डेब्यू कर रहा हूं।" दरअसल जब हुड्डा 15 साल के थे तब उनके पिता जगबीर एयर फ़ोर्स की नौकरी के सिलसिले में बड़ौदा आए थे। 2010 से इरफ़ान युवा हुड्डा के मेंटॉर रहे हैं।
मूलतया हुड्डा हरियाणा से हैं और वहां अंडर-16 क्रिकेट भी खेल चुके हैं। अपने पिता की नौकरी के चलते वह सर्विसेस के लिए भी खेल सकते थे। लेकिन उन्होंने सीनियर घरेलू क्रिकेट के लिए बड़ौदा को ही चुना। अब इसे संयोग कहें या कुछ और, लेकिन उस टीम को छोड़ने के बाद से उनके करियर में उत्थान के अलावा और कुछ नहीं हुआ है।
नई टीम राजस्थान के साथ अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्हें फ़रवरी में भारत के लिए पहली बार खेलने का मौक़ा मिला। इसके बाद उन्होंने लखनऊ सुपर जायंट्स के लिए एक ज़बरदस्त आईपीएल प्रदर्शन दिया, और अपनी टीम में क्रुणाल के साथ बीती बातों को पीछे छोड़ा। उन्होंने 136.66 की स्ट्राइक रेट से 451 रन बनाए। पिछले महीने उन्होंने आयरलैंड के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपना पहला शतक जड़ा। हाल ही में बीसीए ने उनसे बड़ौदा लौटने के बात पर सार्वजानिक तौर पर अपनी इच्छा जताई।
वेस्टइंडीज़ और संभवत: ज़िम्बाब्वे के दौरों पर सीनियर खिलाड़ियों की ग़ैरमौजूदगी में हुड्डा टी20 विश्व कप में अपनी जगह पक्की करने के लिए एक बड़ा दावा पेश कर सकते हैं। वह एक ऐसे बल्लेबाज़ हैं जो तीन से छह में कहीं भी उपयोगी साबित होंगे और साथ ही अपने कप्तान को ऑफ़ स्पिन का विकल्प भी देते हैं।
आईपीएल में हुड्डा के जज़्बे को लखनऊ मेंटॉर गौतम गंभीर ने पहचाना। सहायक कोच विजय दहिया कहते हैं, "गौती ने उनसे कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए वह सारे मैच खेलेंगे। दीपक को आश्चर्य सा हुआ क्योंकि आईपीएल में उन्हें ऐसा समर्थन कभी नहीं मिला था।" हुड्डा 2015 से नियमित आईपीएल का हिस्सा थे लेकिन उन्हें एक सीज़न में 100 से अधिक गेंद खेलने का मौक़ा केवल एक बार ही मिला था। ऐसे में राजस्थान के लिए खेलने का फ़ैसला एक तरह से असहायता का प्रतीक था। राजस्थान क्रिकेट संघ (आरसीए) में ख़ुद विवादों की कमी नहीं थी। यह वह दौर था जब दो गुट राज्य में क्रिकेट संचालन को लेकर लड़ रहे थे।
आरसीए सचिव महेंद्र शर्मा ने कहा, "उनको क्रिकेट खेलने का मौक़ा चाहिए था और हम एक बैटिंग ऑलराउंडर खोज रहे थे। उन्हें ज़्यादा पैसे भी नहीं चाहिए थे और उन्होंने दूसरे पेशेवर खिलाड़ियों की भांति भारी रक़म भी नहीं मांगी। उन्होंने बस यह चाहा कि आपस में हम एक दूसरे को फ़ायदा दिला सकें। हम बहुत ख़ुश थे क्योंकि वह हमारे युवा खिलाड़ियों के साथ अपना अनुभव साझा कर सकते थे।"
मैंने देखा था कि वह बेहतर खेलने के लिए उत्तेजित होने लगे थे। ऐसे में किसी खिलाड़ी के माता-पिता को बहुत बुरा लगता है क्योंकि हम कुछ नहीं कर पाते। मैं इरफ़ान और यूसुफ़ का हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगा।
दीपक हुड्डा के पिता
घरेलू सीज़न शुरू होने से पहले हुड्डा ने पठान बंधुओं के साथ तैयारी की। इरफ़ान कहते हैं, "हम उनके माइंडसेट को ठीक करना चाहते थे। यूसुफ़ एक ऐसे व्यक्ति हैं जो सबसे निराशाजनक स्थिति में भी सकारात्मक सोच रखते हैं। हम दोनों में एक हमेशा उनके साथ रहता था। अगर मैं मीडिया के काम से दूर रहता था तो मैं फ़ोन पर रोज़ बात करता था। तब यूसुफ़ उनके साथ ट्रेनिंग में रहते थे।" इरफ़ान दूर होने पर भी उनके अभ्यास के विडियो देख कर अपनी टिप्पणी देते रहे।
इरफ़ान कहते हैं, "मैंने उन्हें यह समझाया कि फल की चिंता करते हुए अभ्यास करना व्यर्थ है। आप को अपने मन को ऐसे ट्रेन करना है कि आप आगे की सोचे बिना मेहनत करते रहें। अगर इससे आपको कुछ मिलता है तो अच्छा।"
लगातार दो महीनों के लिए हुड्डा सुबह सात बजे अभ्यास के लिए तैयार रहते थे। दो घंटे की कंडीशनिंग के बाद कई कठोर बल्लेबाज़ी के सत्र होते। काली मिट्टी के अभ्यास के लिए वह पुलिस के मैदान पर खेलते थे और लाल मिट्टी के अभ्यास के लिए उन्हें मोती बाग़ के मैदान पर जाना पड़ता था। इरफ़ान ने एक थ्रोडाउन विशेषज्ञ को भी अभ्यास के लिए रखा था।
पिता जगबीर का कहना है, "उनका अभ्यास इतना कठिन था कि उन्हें भविष्य के बारे में चिंता करने का समय ही नहीं मिलता था। मैंने देखा था कि वह बेहतर खेलने के लिए उत्तेजित होने लगे थे। ऐसे में किसी खिलाड़ी के माता-पिता को बहुत बुरा लगता है क्योंकि हम कुछ नहीं कर पाते। मैं इरफ़ान और यूसुफ़ का हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगा।"
घरेलू सीज़न के शुरुआत तक इरफ़ान ने हुड्डा के खेल के कई पहलुओं में सुधार देखा। इरफ़ान कहते हैं, "उनका पास सारे शॉट थे लेकिन हमारा काम था क्रीज़ पर उनके समय को यथोचित बढ़ाना। उनकी ऑफ़ साइड में बल्लेबाज़ी थोड़ी सीमित थी क्योंकि वह गेंद पर जैब सा करते थे। जब वह ज़्यादा हल्के हाथों से खेलने लगे तो वह मैदान के अधिक स्थानों में शॉट लगाने लगे। हमने प्रारूप के हिसाब से अपने स्टांस को भी बदलने पर काम किया। मैदान पर अलग जगहों में शॉट मारने के लिए क्रीज़ का उपयोग करना और गेंद को गैप में मारने का भी सिमुलेशन किया गया।"
हुड्डा ने सीज़न की शुरुआत में सैयद मुश्ताक़ अली ट्रॉफ़ी टी20 में सर्वाधिक स्कोरर की सूची में दूसरा स्थान प्राप्त किया। उन्होंने छह पारियों में 168 के स्ट्राइक रेट से 294 रन बनाए और राजस्थान को क्वार्टरफ़ाइनल तक भेजा। विजय हज़ारे वनडे प्रतियोगिता में वह वैसा फ़ॉर्म नहीं दोहरा सके लेकिन उन्होंने प्रीक्वार्टरफ़ाइनल में शक्तिशाली कर्नाटका के विरुद्ध शानदार 109 रनों की पारी खेली।
दो साल पहले हुड्डा यह सोच रहे थे कि क्या उनकी क़िस्मत में भारत का कैप लिखा भी है या नहीं। और आज वह एक ज़बरदस्त मिसाल है उन लोगों के लिए जो अपनी कमियों पर मशक्कत करने को तैयार हैं
इरफ़ान पठान
उस गेम में कई आईपीएल स्काउट भी मौजूद थे। ऐसे में कोई अचरज की बात नहीं थी कि नीलामी के दिन छह टीमों ने हुड्डा के लिए बोली लगाई और आख़िर में लखनऊ ने उन्हें पौने छह करोड़ रुपए देकर अपनी टीम में शामिल किया। दहिया कहते हैं, "वह गेम को हर वक़्त पढ़ने की कोशिश करते हैं। उनमें सीखने की भूख भी है। उनके अभ्यास में भी तीव्रता रहती है। हालांकि ऐसे लोग कभी कभी ख़ुद को छोटी ग़लतियों पर बहुत कठोरता से पेश आते हैं। क्रिकेट के छोटे प्रारूप बहुत गहन होते हैं और हमने उन्हें समझाया कि इसमें अति तीव्रता भी अच्छी बात नहीं होती। ऐसे मानसिकता में क्या होता है कि सफलता के वक़्त सब सही लगता है लेकिन आप नाकाम होते हैं तो मुश्किल पैदा होती। लेकिन वह यह सीखेंगे और यह उनके विकास का एक हिस्सा रहेगा।"
हुड्डा की हालिया सफलता से इरफ़ान को कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। वह कहते हैं, "दो साल पहले हुड्डा यह सोच रहे थे कि क्या उनकी क़िस्मत में भारत का कैप लिखा भी है या नहीं। और आज वह एक ज़बरदस्त मिसाल है उन लोगों के लिए जो अपनी कमियों पर मशक्कत करने को तैयार हैं। वह केवल 27 साल के हैं और मैं बहुत उत्साहित हूं कि वह भारतीय टीम के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते। अगर वह छह-सात साल भी भारत के लिए खेलें तो बहुत कुछ हासिल करेंगे।"

शशांक किशोर ESPNcricinfo के सीनियर सब एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी में सीनियर सहायक एडिटर और स्थानीय भाषा लीड देबायन सेन ने किया है।