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बिहार के छोटे गांव से दिल्ली कैपिटल्स तक

बंगाल के तेज़ गेंदबाज़ मुकेश कुमार के अब तक के सफ़र पर एक नज़र

Mukesh Kumar is chaired off the field after starring in Bengal's win, Bengal v Karnataka, Ranji Trophy 2019-20, semi-final, Kolkata, 4th day, March 3, 2020

2019-20 रणजी ट्रॉफ़ी के सेमीफ़ाइनल में बंगाल की जीत मुकेश के करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ थी  •  PTI

कोची में हुई आईपीएल 2023 की नीलामी के एक दिन बाद भी 29 वर्षीय तेज़ गेंदबाज़ मुकेश कुमार को दिल्ली कैपिटल्स द्वारा 5.5 करोड़ रुपये में ख़रीदे जाने की ख़ुशी को पूरी तरह महसूस करने का समय नहीं मिला है। उन्हें लगातार फ़ोन पर मीडिया से बधाई के कॉल और साक्षात्कार के लिए अनुरोध आ रहे हैं। नीलामी में एक अनकैप्ड खिलाड़ी के लिए दूसरी सबसे बड़ी रक़म पाने वाले मुकेश यह मानने के लिए ख़ुद को चिकोटी काट रहे हैं कि क्या यह सब सच है।
चोट से रिहैब करने के लिए बेंगलुरु में मौजूद मुकेश एक आलीशान होटल के कमरे में बैठे हैं लेकिन उनका दिल और दिमाग़ ग्रामीण बिहार में उनके गृह नगर गोपालगंज में है।
मुकेश कहते हैं, "खेत मेरी ख़ुशहाल जगह है। कोई भी खुली जगह जहां आप ताज़ी हवा में सांस ले सकते हैं। मुझे सबसे ज़्यादा शांति वहीं मिलती है।"
उन्होंने आगे कहा, "मैं 10 दिनों के रिहैब के बाद आज पहली बार गेंदबाज़ी करने जा रहा हूं। यह मुझे ऊर्जा देता है, उस तरह की जिसे समझाना मुश्किल है।"
यह पहला मौक़ा था जब आईपीएल नीलामी में मुकेश पर बोली लगी। यदि उनके मित्र उन्हें लगातार कॉल नहीं करते तो वह शायद इस बड़े क्षण को चूक सकते थे।
मुकेश ने कहा, "मैं नीलामी देख रहा था और जब विदेशी खिलाड़ियों की बारी आई तब मैं भारत-बांग्लादेश टेस्ट देखने लगा। फिर मैं फ़ोन पर अपनी मां से बात कर रहा था और मुझे मिस-कॉल आते जा रहे थे। मेरा दोस्त मुझे कॉल कर रहा था तो मुझे लगा कि कुछ हो रहा है। उसने कहा - तुमने देखा? तुमने देखा?"
उन्होंने आगे कहा, "मैंने नीलामी का चैनल लगाया लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह मेरा नाम है क्योंकि ऐसा पहले भी हो चुका है। मुझे कहा गया है कि मेरा अच्छा मौक़ा है लेकिन मेरा नाम ही नहीं आता था। जब मैंने अपने नाम के बगल में अपनी फ़ोटो देखी तब जाकर मुझे विश्वास हुआ।"
आगे बताते हुए वह कई बार रुकते हैं। वह कहते हैं, "सच कहूं तो यह थोड़ा मीठा और थोड़ा कड़वा पल है। भगवान आपको कुछ देता है लेकिन कुछ और ले लेता है। मैंने नहीं सोचा था कि मैं अपने जीवनकाल में कभी इस तरह का पैसा देख पाऊंगा, लेकिन मेरे जीवन में दो बहुत महत्वपूर्ण लोग - मेरे पिता और चाचा - जिनके साथ मुझे इस पल साझा करना चाहिए, अब मेरे साथ नहीं हैं।"
मुकेश ने दो साल पहले अपने पिता को एक स्ट्रोक के कारण खो दिया था। उनके बड़े पापा, जिन्होंने 2012 में पूर्णकालिक रूप से कोलकाता जाने पर उन्हें आर्थिक रूप से समर्थन दिया, नवंबर में उनकी मृत्यु हो गई।
मुकेश याद करते हुए कहते हैं, "मैंने अपने पिता की आंखों में जो ख़ुशी देखी जब मैंने अपने रणजी डेब्यू के बाद उन्हें अपने दैनिक भत्ते का पैसा दिया, मैं कभी नहीं भूल सकता। काश मैं उन्हें तब कुछ और दे पाता। लेकिन अब, अगर मैं चाहूं भी, तो मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं। इसलिए मैं थोड़ा भावुक हूं। पैसा आपको सब कुछ नहीं दे सकता है।"

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तीन साल तक मुकेश ने केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) और बिहार पुलिस के लिए प्रवेश परीक्षा की तैयारी की। उन्होंने आख़िरकार 2012 में लिखित परीक्षा पास की लेकिन फ़िटनेस के आधार पर उन्हें बाहर कर दिया गया। इसी समय के आसपास उन्होंने गंभीरता से क्रिकेट में स्विच करने का फ़ैसला किया।
बिहार भारत की प्रमुख घरेलू प्रतियोगिताओं में शामिल होने के योग्य नहीं था, जिसका अर्थ था कि मुकेश के पास अपने घरेलू राज्य में कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने एक मनोरंजक टेनिस-बॉल क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में अपना जीवन यापन किया, जिसकी पुरस्कार राशि से उन्हें अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए पर्याप्त पैसा मिला। लेकिन जब बिहार में ऐसे ही एक टूर्नामेंट के दौरान उनकी बाइक दुर्घटना हो गई, तो उनके पिता, जिन्होंने 2003 से कोलकाता में एक टैक्सी सेवा चलाई थी, ने फ़ैसला किया कि यह उन्हें कोलकाता ले जाने का सही समय था।
मुकेश कहते हैं, ''उन्होंने मुझसे सख़्ती से कहा, अब तुम जो भी करो, चाहे वह क्रिकेट हो या कुछ और, वह सिर्फ़ कोलकाता में होगा, कहीं और नहीं। वह मुझ पर नज़र रखना चाहते थे। मैंने दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से ग्रेजुएशन के लिए दाखिला लिया, हालांकि मैं इसके बारे में बहुत गंभीर नहीं था। मैं केवल अपने पिता को दिखाना चाहता था कि मैं पढ़ रहा था।"
उन्होंने आगे कहा, "मेरे पिता ने सोचा, 'ठीक है, यह लड़का क्रिकेट खेलेगा, महसूस करेगा कि कोलकाता में आगे बढ़ना कितना मुश्किल हो सकता है और हार मान लेगा। और एक बार जब वह अपना ग्रेजुएशन पूरा कर लेगा, तो मैं उसे कहीं नौकरी दिलाने की कोशिश कर सकता हूं।' मुझे लगता है कि वह गलत थे क्योंकि लाल गेंद क्रिकेट में मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी।"
मुकेश सबसे पहले प्रतिष्ठित कालीघाट क्लब गए, लेकिन उन्हें वापस लौटा दिया गया। क्लब के एक अधिकारी ने उनसे कहा कि उन्हें मौक़ा मिलने से पहले कम से कम दो साल तक ड्रिंक्स चलानी होगी क्योंकि केवल 'बड़े खिलाड़ी ही यहां खेलते हैं'। इसके बाद मुकेश बानी निकेतन स्पोर्ट्स क्लब गए, जहां उनकी मुलाक़ात बीरेंद्र सिंह से हुई, जिनके तहत उन्होंने प्रशिक्षण लिया और जो उनके गुरु बने।
याद करते हुए मुकेश कहते हैं, "[बानी निकेतन के लिए] डेब्यू पर मैंने दूसरे डिवीज़न लीग मैच में छह विकेट लिए। फिर अगले साल मैं प्रथम डिवीज़न की टीम में चला गया। लेकिन क्योंकि मेरे पिताजी का स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था, मैं नियमित रूप से नहीं खेल सका। वह मुझे नौकरी दिलाने और अधिक स्थिर होने पर तुले हुए थे। मैंने उनसे कहा, 'मुझे एक और साल दे दो' और खेलना जारी रखा।"
2014 इसी दौरान बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के तत्कालीन सचिव सौरव गांगुली ने बंगाल को घरेलू क्रिकेट में ताक़तवर टीम बनाने में मदद करने के लिए प्रतिभाशाली क्रिकेटरों का चयन करने के लिए अपने विज़न 2020 कार्यक्रम की घोषणा की। कार्यक्रम के लिए वक़ार यूनुस, मुथैया मुरलीधरन और वीवीएस लक्ष्मण को शामिल किया गया, ताकि स्थानीय कोचों को खिलाड़ियों के एक समूह को शॉर्टलिस्ट करने में मदद मिल सके, जिन्हें समय के साथ तैयार किया जा सके। बीरेंद्र की सिफ़ारिश पर, मुकेश को ट्रायल्स में प्रवेश करने की अनुमति दी गई, जहां उन्होंने ख़ुद को 300 से अधिक उम्मीदवारों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए पाया।
मुकेश ने कहा, "ट्रायल के अंत में, केवल चार या पांच गेंदबाज़ शेष थे, लेकिन मेरी बदक़िस्मती से, मेरा नाम तब पुकारा गया जब मैंने एक त्वरित शौचालय ब्रेक लिया। क्योंकि कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, मेरा नाम हटा दिया गया था। मुझे सचमुच रोनो दा [रणदेब बोस, बंगाल के पूर्व तेज़ गेंदबाज़, जो ट्रायल चलाने में शामिल थे] से मुझे एक मौक़ा देने के लिए विनती करनी पड़ी।"
उन्होंने आगे कहा, "मुझे पता था कि मेरे पास फ़र्क़ पैदा करने के लिए सिर्फ़ चार या पांच गेंदें थीं। मुझे बाद में शाम को पता चला कि मुझे शॉर्टलिस्ट किया गया था। इसलिए पूरे दिन धूप में खड़े रहने का प्रयास सौभाग्य से रंग लाया।"
बात यह थी कि बोस ने वक़ार से मुकेश की सिफ़ारिश की थी।
बोस कहते हैं, "जब मैंने उसे गेंदबाज़ी करते देखा, तो मुझे लगा कि [उसमें] कुछ [बात] है। वक़ार 100% आश्वस्त नहीं थे लेकिन मैंने उनसे अनुरोध किया - 'भाई, रख लो'। उन्होंने पूछा, 'क्या आप निश्चित हैं?' और मैंने कहा, 'मेरे को अच्छा लग रहा है।' उन्होंने कहा, 'ठीक है।'"
बोस ने आगे कहा, "एक लंबे दिन के अंत में शायद मैं उसे देखने से चूक जाता। लेकिन हुआ यूं कि मैं चाय पीने के लिए नेट्स के पीछे चला गया। मैं बल्लेबाज़ के पीछे से उसे देख पा रहा था और वह प्रभावशाली लग रहा था।"
अगर ट्रायल्स को पास करना एक क़दम था, तो फ़िटनेस मानकों को पूरा करना कठिन साबित हुआ। इसी दौरान पता चला कि मुकेश के घुटनों में बोन एडिमा (फ़्लूइड जमा होने की समस्या) है और वह एनीमिक है। इसका मतलब था कि अस्पतालों और रिहैब केंद्रों में अधिक समय बिताना और हर एक मैच खेलने पर तीन मैच बाहर बैठना।
मुकेश ने कहा, "सीएबी ने इस अवधि के दौरान बहुत मदद की, मेरा एमआरआई करवाना, मेरे मेडिकल बिलों का ध्यान रखना, यहां तक ​​कि मुझे उनके आवास में रहने की अनुमति भी दी। उनकी मदद के बिना, मुझे नहीं लगता कि मैं बच पाता। आठ महीनों के लिए, 2014 और 2015 के बीच, मैंने केवल रिहैब किया। यह बहुत कठिन था। कभी-कभी मैंने सोचा कि गांव वापस जाना सबसे अच्छा हो सकता है। लेकिन मैं कोशिश करना चाहता था। अगर यह काम नहीं करता, तो ना सही। कम से कम मैं कोशिश कर सकता था।"
2015 में, फ़िटनेस प्राप्त करने और क्लब टूर्नामेंट में प्रभावित करने के बाद, मुकेश ने लाहली में हरियाणा के ख़िलाफ़ रणजी ट्रॉफ़ी करियर की शुरुआत की।
मैच से पहले, बंगाल के ख़ेमे में असंतोष पनप रहा था - कैसे एक चोटिल खिलाड़ी, एक "बाहरी व्यक्ति" को राज्य के कई नियमित खिलाड़ियों से ऊपर चुना जा रहा था। बोस, जो गेंदबाज़ी कोच थे, को मुकेश के समर्थन में लक्ष्मण और मुख्य कोच साईराज बहुतुले का सहयोग प्राप्त था।
मुकेश ने सलामी बल्लेबाज़ राहुल दीवान और फिर वीरेंद्र सहवाग को आउट किया और मैच में पांच विकेट लिए। बोस कहते हैं, "उसने मेरी नौकरी बचाई।"
मुकेश ने उस सीज़न में चार मैच खेले। 2016-17 में चोटिल होने से पहले उन्होंने केवल दो मैच खेले। जब वह फ़िट थे, तो उन्होंने फ़ॉर्म खो दिया, जिससे क्लब क्रिकेट में वापस जाने का निर्णय लिया गया। अगले सीज़न में उन्होंने केवल एक मैच खेला। वह फ़िट थे लेकिन बंगाल के पास मोहम्मद शमी और अशोक डिंडा थे और तेज़ गेंदबाज़ के रूप में टीम में जगह बनाना मुश्किल था। 2018-19 में उन्हें पांच मैच मिले, जिसमें उन्होंने 22 विकेट लिए। क्लब क्रिकेट में मज़बूत प्रदर्शन के दम पर अगले सीज़न में उन्हें 10 मैच मिले और वह एक सशक्त तेज़ गेंदबाज़ी क्रम का हिस्सा बने। टीम प्रबंधन के साथ झगड़े के बाद डिंडा के टीम छोड़कर जाने के बाद एक पद खाली हो गया और इससे उन्हें मदद मिली। मुकेश ने 32 विकेटों के साथ प्रभावित किया और उनके नियंत्रण और गेंद को विभिन्न सतहों पर हरकत करवाने की क्षमता को राष्ट्रीय चयनकर्ताओं ने नोट किया।
सेमीफ़ाइनल में के एल राहुल, मनीष पांडे, देवदत्त पड़िक्कल और करुण नायर सहित कर्नाटका के मज़बूत क्रम के ख़िलाफ़, मुकेश ने दूसरी पारी में 61 रन देते हुए छह विकेट लेकर बंगाल को ख़िताबी मुक़ाबले में पहुंचाया
मुकेश ने कहा, "वह सीज़न एक महत्वपूर्ण मोड़ था, लेकिन दो सप्ताह के भीतर, जब मुझे चयनकर्ताओं द्वारा बताया गया था कि मुझे दलीप ट्रॉफ़ी और ईरानी कप में चुना जाएगा, तो कोविड आ गया। और सब कुछ फिर से शून्य पर आ गया।"
उन्होंने उस लागू डाउनटाइम में सहनशीलता प्रशिक्षण पर काम किया और अपनी फ़िटनेस में सुधार के लिए क्रॉस-कंट्री दौड़ लगाई। वे कहते हैं, "मैंने बेन स्टोक्स और स्टीवन स्मिथ को चैरिटी रन करते देखने के बाद दो घंटे में 20 किमी की दौड़ भी पूरी की। पांच साल पहले भी, मैं शायद ऐसा नहीं कर पाता। आज मेरी फ़िटनेस बहुत बेहतर है।"
इस साल की शुरुआत में, मुकेश को न्यूज़ीलैंड ए के ख़िलाफ़ घरेलू सीरीज़ के लिए इंडिया ए टीम में शामिल किया गया था। इस महीने की शुरुआत में वह बांग्लादेश में भी इंडिया ए टीम का हिस्सा थे, जहां उन्होंने दूसरे अनाधिकृत टेस्ट में 40 रन देकर छह विकेट लिए थे। इन दो सीरीज़ के बीच उन्हें साउथ अफ़्रीका के विरुद्ध सीरीज़ के लिए पहली बार भारतीय वनडे टीम से बुलावा आया था। वह सीरीज़ में खेले नहीं, लेकिन आईपीएल में न खेलने के बावजूद उन्होंने उस तरह की छाप छोड़ी, जो उनकी यात्रा को और भी ख़ास बनाती है।
केवल लाल गेंद क्रिकेट के विशेषज्ञ से ख़ुद का विकास पिछले तीन वर्षों में मुकेश का सबसे बड़ा सुधार रहा है। वह आईपीएल में इस पर और काम करना चाहते हैं। लेकिन इससे पहले कि वह वहां पहुंचे, वह अपनी मां से मिलने के लिए घर जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
वह कहते हैं, "मैं उन्हें देश भर में घुमाना चाहता हूं। हाल ही में, हम शिरडी गए थे। मैं उन्हें मंदिर के दर्शन के लिए ले गया। इससे उन्हें ख़ुशी मिलती है और उन्हें ले जाने से मुझे ख़ुशी होगी।"
कई लोगों ने मुकेश से सवाल किया है कि वह इतने पैसों का क्या करेंगे। इस पर वह कहते हैं, "देखिए, मेरे पास कोई फ़िज़ूलख़र्ची के सपने नहीं हैं। मुझे खेतों में जीवन, फ़सल उगाना, खेती करना पसंद है। मैं उस तरह का व्यक्ति हूं जिसे फ़र्श पर बैठना और परिवार के साथ भोजन का आनंद लेना पसंद है। जब मैं मैदान पर नहीं होता हूं तो इससे मुझे बहुत ख़ुशी मिलती है। यह एक साधारण जीवन है।"
मुकेश ने आगे कहा, "क्रिकेट के बाद, अगर मैं अपने गांव में खेती करना चाहता हूं, तो पैसा शायद उस दिशा में निवेश करके मेरे सपने को साकार करने में मदद करेगा। लेकिन यह सब बाद के लिए है। अब मैं सिर्फ़ फ़िट रहना चाहता हूं और मेरे रास्ते में आने वाले सभी क्रिकेट खेलना चाहता हूं।"

शशांक किशोर ESPNcricinfo में सीनियर सब एडिटर हैं। अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के सब एडिटर अफ़्ज़ल जिवानी ने किया है।