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विराट कोहली की कप्तानी के आस-पास की आभा, ऊर्जा और कैमरे

टीवी स्क्रीन पर विपक्षी प्रशंसकों को होठों पर उंगली रखकर चुप कराना हो या भारतीय फ़ैन्स को अपने कानों की ओर हाथ रखकर उत्साहित करना हो - अब इसे हम ज़रूर मिस करेंगे

पीठ की ऐंठन ने विराट कोहली को जोहैनेसबर्ग टेस्ट से बाहर कर दिया, और उनकी जगह शांत और युवा कप्तान के नेतृत्व भारत को एक अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। इस दौरान कईयों की नज़र में मैदान पर कप्तान की ऊर्जा और आक्रामकता की कमी महसूस की गई। कोहली ने केपटाउन में वापसी की और मैदान पर हर ओर अपनी ऊर्जा और आक्रामकता बिखेर डाली और स्टंप माइक में भी उन्होंने अपनी भड़ास निकाली। हालांकि इसके बावजूद इस टेस्ट में भी भारत को हार ही नसीब हुई।
कप्तानों को जीत के लिए श्रेय तो मिलता है लेकिन हार के लिए उन्हें कहीं ज़्यादा ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है। वे उतने ही अच्छे हैं जितनी उनकी टीमें होती हैं, और सभी प्रारूपों में कोहली के परिणाम किसी भी पूर्णकालिक भारतीय कप्तान से सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि उन्होंने भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम का नेतृत्व किया। ये बेहद सरल है !
कोहली ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 2014-15 में पहली बार टेस्ट की कप्तानी की थी, उस वक़्त तक वह पूर्णकालिक कप्तान नहीं थे, उन्होंने दो निर्णय लिए - और इससे तुरंत पता चला कि उनकी कप्तानी कैसी होगी, और यह पहले की किसी भी चीज़ से कैसे अलग होगी।
उन्होंने आर अश्विन को ड्रॉप कर दिया और उनकी जगह लेग स्पिनर कर्ण शर्मा का डेब्यू कराया , इस विश्वास के साथ कि कलाई की स्पिन ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर उंगलियों की स्पिन की तुलना में बेहतर होगी। फिर, अंतिम दोपहर में, कोहली अपने शॉट्स खेलते रहे और भारत के हर दूसरे मान्यता प्राप्त बल्लेबाज़ को खो देने के बाद भी चौथी पारी के लक्ष्य के पीछे जा रहे थे, यह तब था जब उन्होंने दोनों पारियों में पहले ही शतक बना लिया था और वह चाहते तो पूरी पारी में बल्लेबाज़ी करते हुए मैच को ड्रॉ की ओर ले जा सकते थे।
ऑस्ट्रेलिया ने कर्ण की लेग स्पिन के ख़िलाफ़ अपनी दो पारियों में साढ़े पांच रन प्रति ओवर से रन बनाए, और उन्होंने फिर कभी टेस्ट क्रिकेट नहीं खेला। साथ ही जीत की खोज में हार का जोखिम उठाने की कोहली की इच्छा हार में समाप्त हो गई।
कप्तान के रूप में कोहली के शुरुआती वर्षों के दौरान प्रतीत होता है कि वह आवेग में आकर चयन करते थे और उनकी छवि एक आक्रामक कप्तान के तौर पर मशहूर होने लगी थी। सेंट लूसिया 2016 में भारत ने चेतेश्वर पुजारा और एम विजय को बाहर रखा था और रोहित शर्मा को उनकी आक्रामक शैली के लिए टीम में लाया गया, कोहली को शायद पहले से ही आभास था कि बारिश में महत्वपूर्ण समय बर्बाद हो जाएगा। भारत पूरा दिन धुलने के बावजूद मैच जीता, हालांकि रोहित ने जीत में कोई ख़ास योगदान नहीं दिया था।
यह पहली या आख़िरी बार नहीं था जब पुजारा ने ख़राब फ़ॉर्म के कारण ख़ुद को एकादश से बाहर पाया। अजिंक्य रहाणे 2017-18 के साउथ अफ़्रीका दौरे के दौरान भी इसका अनुभव कर चुके हैं। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कोहली की कप्तानी के अंतिम वर्ष में पुजारा और रहाणे में एक अटूट विश्वास दिखाया जाएगा, हालांकि दोनों का फ़ॉर्म और ज़्यादा गिरता गया।
यह संभवतः कोहली की शुरुआती आवेगशीलता की एक झलक दिखाती है। या यह शायद उनके दो मध्यक्रम के साथियों में एक अधिक विश्वास को दर्शाता है, जब वे दोनों कठिन परिस्थितियों में कई बार अपनी क्षमता साबित कर चुके थे।
कोहली ने अपने एडिलेड कप्तानी पदार्पण में जो अन्य गुणवत्ता दिखाई, वह कभी नहीं बदली, और वह हमेशा टेस्ट जीत की खोज में हार का जोखिम उठाने के लिए तैयार रहे। यही गुण उनकी कप्तानी को परिभाषित करता है।
यह उनके द्वारा पांच गेंदबाज़ों के संयोजन के लगातार उपयोग से अधिक स्पष्ट कहीं नहीं था। उनके पूर्ववर्ती एमएस धोनी भी इसके लिए उत्सुक थे, लेकिन पांचवां गेंदबाज आमतौर पर स्टुअर्ट बिन्नी या रवींद्र जाडेजा के तौर पर होता था, जिन्हें अपने टेस्ट करियर के शुरुआती दौर में एक बल्लेबाज़ी ऑलराउंडर के रूप में देखा जाता था।
इसके विपरीत, कोहली ने 2014-15 के ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद अपने पहले दो टेस्ट मैचों में पांच विशेषज्ञ गेंदबाजों को खिलाया, ये वह दौर था जब धोनी के बाद का युग पूरी तरह से शुरू हो चुका था। फ़तुल्लाह में उन्होंने तीन तेज़ गेंदबाज़ों - इशांत शर्मा, वरुण ऐरन और उमेश यादव - और दो स्पिनरों - अश्विन और हरभजन सिंह को चुना। इसके बाद भारत के अगले टेस्ट में दो तेज़ गेंदबाज़ - इशांत और आरोन - और तीन स्पिनर - अश्विन, हरभजन और अमित मिश्रा गॉल टेस्ट में श्रीलंका के ख़िलाफ़ नज़र आए। सभी पांच पहले गेंदबाज़ थे, और अश्विन ने उन दो टेस्ट मैचों से पहले कभी भी नंबर-8 से ऊपर बल्लेबाज़ी नहीं की थी। और धोनी के अब टीम में नहीं होने के कारण, पांच गेंदबाज़ ऋद्धिमान साहा के नीचे बल्लेबाज़ी कर रहे थे, जिनकी बल्लेबाज़ी क्षमता उस समय काफ़ी हद तक अप्रमाणित थी।
हालांकि गॉल में ये भारत के ख़िलाफ़ ही गया - जहां दिनेश चांदीमल की एक लाजवाब पारी ने एक हार को जीत में तब्दील कर दिया। लेकिन कोहली ने भारत की 20 विकेट लेने की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए बल्लेबाज़ी की गहराई का त्याग करने की इच्छा दिखाई थी, और यह उनकी कप्तानी की विशेषता बनी रहेगी। इस बार विदेशी पिचों पर भारत के विशेषज्ञ ऑलराउंडर के तौर पर अपनी जगह बना चुके जाडेजा साउथ अफ़्रीकी दौरे पर चोटिल होने की वजह से टीम का हिस्सा नहीं थे। लेकिन इसके बाद भी कोहली ने अपनी कप्तानी में पांच विशेषज्ञ गेंदबाज़ों के साथ ही जाने का फ़ैसला किया था, जहां अश्विन और शार्दुल ठाकुर ने नंबर-7 और नंबर-8 पर बल्लेबाज़ी की कमान संभाली।
अब बात ऑस्ट्रेलिया दौरे की करते हैं, जहां एडिलेड में भारत के 36 रन पर ऑलआउट होने के बाद मेलबर्न में कप्तानी की ज़िम्मेदारी रहाणे के कंधों पर थी। उन्होंने भी कोहली की जगह किसी विशेषज्ञ बल्लेबाज़ को लाने की जगह रवींद्र जाडेजा को एकादश में शामिल किया।
कोहली, शास्त्री, कुंबले, रहाणे और यहां तक कि राहुल द्रविड़, सभी एक ही दृष्टि साझा करते हैं और वह है पांच गेंदबाज़ों के साथ जाना।
एक मायने में, कोहली भाग्यशाली थे कि उन्होंने तब कप्तानी संभाली, जब उनके पास ख़ासतौर से गेंदबाज़ों का एक ऐसा समूह शामिल था जो टेस्ट में परिपक्व थे। अश्विन, जाडेजा, इशांत, उमेश और मोहम्मद शमी।
हालांकि, आप तर्क दे सकते हैं कि कोहली और शास्त्री ने उन फ़िटनेस मानकों को निर्धारित किया जिसने उन गेंदबाज़ों को ख़ुद का सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए प्रेरित किया। अपने कार्यकाल के दौरान, तेज़ गेंदबाज़ एक दिन के खेल के दौरान उच्च तीव्रता का एक स्पेल देने में सक्षम रहे। हालांकि इसके लिए बहुत हद तक श्रेय गेंदबाज़ी कोच भारत अरुण को भी देना चाहिए।
इशांत ने इस दौरान बेहतरीन उदाहरण पेश किया। 2014 के अंत तक इशांत ने 61 टेस्ट में 37.30 की औसत से विकेट झटके थे, जबकि 2015 की शुरुआत के बाद से - जब कोहली पूर्णकालिक कप्तान बने - उनकी औसत 44 टेस्ट में 25.01 की हो गई।
और जैसे-जैसे गेंदबाज़ अधिक ख़तरनाक बनते गए, नए खिलाड़ी ऐसे दिखने लगे जैसे वे पहले ही 20 टेस्ट खेल चुके हों। उनमें से एक जसप्रीत बुमराह हैं, जिन्हें 2013 में राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) में एक संभावना के रूप में पहचाना गया था। इसी तरह एक और गेंदबाज़ हैं मोहम्मद सिराज, एक सुचारु रूप से प्रशस्त प्रतिभा मार्ग का एक और भी स्पष्ट उदाहरण, जिन्होंने टेस्ट डेब्यू से पहले ही भारत ए के लिए शानदार प्रदर्शन किए थे।
बाक़ी सब चीज़ों की तरह, कोहली की उन दो गेंदबाज़ों के उत्थान में सीमित भूमिका हो सकती है। लेकिन यह सिर्फ़ उनकी कप्तानी की वजह से ही नहीं है। बल्कि ये दिखाता है कि एक टीम की सफलता कई कुशल निर्णय निर्माताओं द्वारा देखी जाने वाली कई प्रक्रियाओं की परिणति है, जिनमें से कप्तान केवल एक है।
कोहली की कप्तानी का माहौल, वास्तव में, उनकी भूमिका के दायरे से बहुत बड़ा था, और यह केवल इस बात का प्रतिबिंब था कि व्यक्तित्व से प्रेरित क्रिकेट की मार्केटिंग और पैकेजिंग कितनी आक्रामक हो गई है। यहां तक कि सचिन तेंदुलकर के पास भी उनके हर मूवमेंट पर नज़र रखने के लिए एक समर्पित कैमरा नहीं था। मैदान पर जैसे ही कैमरा कोहली की तरफ़ जाता, कोहली भी उसका शानदार तरीक़े से फ़ायदा उठाते थे, फिर चाहे वह विपक्ष के प्रशंसकों को शांत करने के लिए होंठों पर उंगलियां रखना हो, या भारत के प्रशंसकों के शोर की मात्रा बढ़ाने के लिए हाथों को कानों की ओर रखना।
भले ही उस ऑन-फ़ील्ड व्यक्तित्व का भारत के परिणामों में योगदान नगण्य था, यह उनकी कप्तानी का हिस्सा है जिसे सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा। यह संभव है कि जब वह कप्तान नहीं रहेंगे तो भी वह उतने ही आक्रामक और ऊर्जा के भंडार रहेंगे। लेकिन यह तय है कि कोहली-कैम अब हमारे जीवन में एक छोटी भूमिका निभाएगा, जो आपको उत्सुकता से मिश्रित भावनाओं के साथ छोड़ देगा। यहां तक कि अगर आप कोहली-कैम को एक टीम गेम का सबसे प्रबल उदाहरण मानते हैं, जिसे एक शख़्सियत में बदल दिया गया है, तो आप अब इसे मिस करेंगे।

कार्तिक कृष्णास्वामी ESPNcricinfo में सीनियर सब-एडिटर हैं, अनुवाद ESPNcricinfo हिंदी के मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट सैयद हुसैन ने किया है।